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गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

उधर ना जाने की कसम खाने से क्या हो वो जब इधर को ही अब आने में लगे हैं

जंगल के
सियार तेंदुऐ
जब से
शहर की तरफ
अपने पेट की भूख
मिटाने के लिये
भाग आने लगे हैं

किसी बहुत दूर के शहर के शेर का
मुखौटा लगा
मेरे शहर के
कुत्ते दहाड़ने का टेप बजाने लगे हैं

सारे बिना पूँछ
के कुत्ते अब
एक ही जगह
पर खेलते नजर
आने लगे हैं

पूँछ वाले
पूँछ वालों
के लिये ही
बस अब
पूँछ हिलाने
डुलाने लगे हैं

चलने लगे हैं
जब से कुछ
इस तरीके के
अजब गजब
से रिवाज

जरा सी बात
पर अपने ही
अपनों से दूरी
बनाने लगे हैं

कहाँ से चल
कर मिले थे
कई सालों
में कुछ
हम खयाल

कारवाँ बनने
से पहले ही
रास्ते बदल
बिखर
जाने लगे हैं
आँखो में आँखे
डाल कर बात
करने की हिम्मत नहीं पैदा कर सके आज तक भी

चश्मे के ऊपर
एक और चश्मा लगा
दिन ही नहीं रात में तक आने लगे हैं

अपने ही घर को आबाद करने की
सोच पैदा क्यों नहीं कर
पा रहे हो 'उलूक'

कुछ आबाद
खुद की ही
बगिया के
फूलों को रौँदने
के तरीके
अपनो को ही
सिखाने लगे हैं !

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