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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

जिसके लिये लिखा हो उस तक संदेश जरूर पहुँच जाता है !

पता नहीं क्या क्या और
कितना कितना बदला है
कितना और बदलेगा
और क्या फिर हो जायेगा
सुना था कभी राम थे
सीता जी थी
और रावण भी था
बंदर तब भी
हुआ करते थे
आज भी हैं
ऐसी बहुत से
वाकयों से
वाकिफ होते होते
कहां से कहां आ गये
बस कुछ ही
दिन हुऐ हों जैसे
छोटे शहर में
छोटी सी बाजार
चाय की
दुकानों में जुटना
और बांट लेना बहुत कुछ
यूं ही बातों ही बातों में
आज जैसे
वही सब कुछ
एक पर्दे पर आ गया हो
बहुत कुछ है
कहीं किसी के
पास आग है
किसी के
पास पानी है
कोई
आँसुओं के सैलाब में
भी मुस्कुरा रहा है
कोई
जादू दिखा रहा है
कहीं
झगड़ा है
कहीं
समझौता है
दर्द खुशी
प्यार इजहार
क्या नहीं है
दिखाना बहुत
आसान होता है
इच्छा होनी चाहिये
कुछ ना कुछ
लिखा ही जाता है
अब चाय की वो दुकान
शायद यहाँ आ गयी है
हर एक पात्र
किसी ना किसी में
कहीं ना कहीं
नजर आता है
हर पात्र के पास
है कुछ ना कुछ
कहीं कम
कहीं कहीं तो बहुत कुछ
चाय तो अब
कभी नहीं दिखती
पर सूत्रधार
जरूर दिख जाता है
कहानी कविता
यात्रा घटना दुर्घटना
और पता नहीं क्या क्या
सब कुछ
ऐसे बटोर के ले आता है
जैसे महीन
झाड़ू से एक सुनार
अपने छटके हुऐ
सोने के चूरे को
जमा कर ले जाता है
एक बात को लिखना जहां
बहुत मुश्किल हो जाता है
धन्य हैं आप
कैसे इतना कुछ
आपसे इतनी
आसानी से हो जाता है
आप ही के
लिये हैं ये उदगार
मुझे पता है
आप को सब कुछ
यहां पता चल जाता है ।

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