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मंगलवार, 18 नवंबर 2014

कहने को कुछ नहीं है ऐसे हालातों में कैसे कोई कुछ कहेगा

दिख तो रहा है
अब मत कह देना
नहीं दिख रहा है
क्यों दिख रहा है
दिखना तो
नहीं चाहिये था
क्या हुआ ऐसा
दिखाई दे गया
और जो दिखा
वही सच है
ऐसे कई सच
हर जगह
सीँच रहे हैं
खून से
जिंदा लाशों को
और बेशरम लाशें
खुश हैं व्यस्त हैं
बंद आँखों से
मरोड़ते हुऐ
सपने अपने भी
और सपनों के भी
ये दिखना दिखेगा
कोई कुछ कहेगा
कोई कुछ कहेगा
मकान चार खंभों पे
टिका ही रहेगा
खंभा खंभे
को नोचेगा
एक गिरेगा
तीन पर हिलेगा
दो गिरेंगे
दो पर चलेगा
लंगड़ायेगा
कोई नहीं देखेगा
लंगड़ा होकर भी
गिरा हुआ खंभा
मरेगा नहीं
खड़ा हो जायेगा
फिर से मकान
की खातिर नहीं
खंभे की खातिरदारी
के लिये
ऐसे ही चलेगा
कल मकान में
जलसा मिलेगा
दावत होगी
लाशें होंगी
मरी हुई नहीं
जिंदा होंगी
तालियाँ बजेंगी
एक लाल गुलाब
कहीं खिलेगा
आँसू रंगहीन
नहीं होंगे
हर जगह रंग
लाल ही होगा
पर लाली नहीं होगी
खून पीला हो चुकेगा
कोई नहीं कुछ कहेगा
कुछ दिन चलेगा
फिर कहीं कोई
किसी और रंग का
झंडा लिये खड़ा
झंडे की जगह ले लेगा
खंबा हिलेगा
हिलते खंबे को देख
खंबा हिलेगा
मकान में जलसा
फिर भी चलेगा।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

दो और दो पाँच

दो और दो
होता है चार

किताबों से
पढ़ा जाता है
ब्लैक बोर्ड में
लिखा जाता है

कोई पूछता है
तो समझाया
भी उसे जाता है
कि दो और दो
हमेशा ही चार
हो जाता है

असलियत में
दो और दो
होता है पाँच

खुद समझा
ऎसे ही
जाता है
किया भी
ऎसा ही
जाता है

मौका ज्यादा
अच्छा मिल
रहा हो
अगर तो
आठ भी
कर लिया
जाता है

किताब में
कुछ भी
लिख देने से
थोड़ा कुछ
हो जाता है

जमाने की
नब्ज भी तो
कोई चीज
हुआ करती है
उसे भी कुछ
समझा जाता है

उसके साथ
चला जाये
अगर तो
रास्ता आसान
हो जाता है

तू भी
दो और दो
को चार पढ़
पर जब
करता है
तो पाँच कर

सामने वाला
भी वही कर
रहा होता है
उसको प्यार से
नमस्कार कर

चार को दिखा
दिया कर
एक को
बचा लिया कर

सामने वाला
समझदार
होता है
उसको
दो और दो
चार समझ में
आ जायेगा
और
पाँचवा
तेरे लिये
बच जायेगा
किसी को
कुछ पता
भी नहीं
चल पायेगा ।

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