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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

कभी एक रोमानी खबर क्यों नहीं तू लाता है

सब कुछ तो
वैसा 
नहीं
होता है जैसा 

रोज का रोज
आकर तू यहां
कह देता है

माना कि
अन्दर से
ज्यादातर
वही सब कुछ
निकलता है
जैसा कि
अपने आस
पास में
चलता है

पर
सब कुछ
तुझे ही
कैसे
और क्यों
समझ में
आता है

तेरे वहाँ तो
एक से
बढ़कर एक
चिंतकों का
आना जाना
हमेशा से ही
देखा जाता है

पर
तेरी जैसी
अजीब अजीब
सी
परिकल्पनाऎं
लेकर कोई
ना तो कहीं
आता है ना ही
कहीं पर
जाकर बताता है

दूसरी
ओर देख
बहुत
सी चीजें
जो होती
ही नहीं है

कहीं पर भी
दिखती नहीं हैं

उन विषयों
पर भी आज
जब विद्वानो
द्वारा बहुत
कुछ लिखा
हुआ सामने
आता है

शब्दों के
चयन का
बहुत ही
ध्यान रखा
जाता है

भाषा
अलंकृत
होती है

ऊल जलूल
कुछ भी
नहीं कहा
जाता है

तब तू भी
ऎसा कुछ
कालजयी
लिखने की
कला सीखने
के लिये
किसी को
अपना गुरू
क्यों नहीं
बनाता है

वैसे भी
रोज का रोज
सारी की सारी
बातों को
कहना
कौन सा
इतना जरूरी
हो जाता है

जहाँ तेरे
चारों ओर
के हजारों
लोगों को
अपने सामने
गिरते हुऎ
एक मकान
को देखकर
कुछ भी नहीं
हुआ जाता है

तू बेकार में
एक छोटी सी
बात को
रेल में
बदलकर
हमारे सामने
रोज क्यों
ले आता है

अपना समय
तो करता ही
है बरबाद
हमारा दिमाग
भी साथ
में खाता है ।

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