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मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

बहुत हैं माचिस के डब्बे चिंता की बात नहीं आग पक्का लगेगी

माचिस का एक
नया डिब्बा
कल गलती से
छूट गया
बाहर आँगन
की दीवार पर
और आज
उसका रंग
उतरा हुआ मिला
शायद ओस ने
या दिन की
तेज धूप ने
हो कुछ कह दिया
तीलियां उसी तरह
तरतीब से लगी हुई
महसूस हुआ
जो भी है आग है
कहीं ना कहीं
इस डब्बे में भी
और शायद
कुछ अंदर
भी कहीं
एक बहुत शाँत  
तीलियों से चिपकी
अनुशाशित
और
एक बिना धुऐं
और चिगारी के
आग होने की सोच
का ढोंग ओढ़े हुऐ
जहाँ बहुत से पागल
लगे हुऐ हैं
पागल बनाने में
जिनके पास
दिखाई देती है
मशाल बनाने
के लिये लकड़ी
पुराना कपड़ा
थोड़ा कैरोसिन
पानी मिला हुआ
और माचिस
ओस से भीग कर
तेज धूप में सुखाई हुई
सुलगने का एक
अहसास ही सही
तीलियाँ आग को
अपने में लपेटे हुऐ
कुछ भीगी कुछ सीली
पर आग तो आग है
कुछ ही दिन की
बस अब बात है
लगने वाली है आग
और उस आग में
सब भस्म हो जायेगा
आग की देवी या देवता
जो भी है कहीं सुना है
कोशिश कर रहा है
गीली तीलियों के
मसाले को सुखा कर
कुछ कुरकुरा बनाने
के जुगाड़ का 

उलूक तुझे कुछ 
नहीं करना है
तीली को रगड़ने
के लिये अगर कोई
माचिस का खाली
डब्बा माँगने  
आ जाये भूले भटके
धूप में सुखा के रखना है
बस एक माचिस का डब्बा ।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

चिंता

एक मित्र को चिंता है
अच्छी रचना कोई
क्यों नहीं सुनता है

किस्म किस्म के
लोग जब एक
साँथ हो जाते है
एक ही बाजार में
कुछ खरीदने जाते हैं
अपनी अपनी पसंद का
माल ही तो उठाते हैं
मित्र आप भी तो अपनी
पसंद की साड़ी खरीद
कर ही ले जाती हैं
पतिदेव की
कलर चौईस
पर कभी कभी
मुँह बनाती हैं
यहाँ तो लोग
सूँई से हाथी
बना कर
लगा रहे हैं
हम कौन सा
खरीदते जा रहे हैं
मेरे बहुत से
मित्रों के मित्र
बड़े बड़े नेता हैं
पर हमको पार्टी
वाला कहाँ कुछ
कभी देता है
काँग्रेस भाजपा
सपा बसपा
हर तरह की
पार्टियां लगीं थी
पर हमें तो
बस अपने देश
की पतली होती
हालत की
ही पड़ी थी
हम कब से
भुनभुना रहे थे
हमारे हजार
फेसबुक मित्रों में
से बीस पच्चीस
ही तो हमारे साँथ
ताली बजा रहे थे
सबसे बड़ी बात
आपकी समझ में
भी अब तक
आ जानी चाहिये
कोई क्या सोचता
है कहता है
इस रास्ते पर गाड़ी
नहीं दौड़ानी चाहिये
लगे रहिये आप
भी हमारी तरह
मसाले छौंक के सांथ
दाल पकानी चाहिये
कोई खाये तो खाये
नहीं खाता है
तो उसके लिये
बिरयानी नहीं
पकानी चाहिये।

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