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सोमवार, 30 जून 2014

चिट्ठियाँ हैं और बहुत हो गई हैं

चिट्ठियाँ
इस जमाने की
बड़ी अजीब
सी हो गई हैं

आदत
रही नहीं
पड़े पड़े
पता ही
नहीं चला
एक दो
करते
बहुत बड़ा
एक कूड़े
का ढेर
हो गई हैं

कितना
लिखा
क्या क्या
लिखा
सोच समझ
कर लिखा
तौल परख
कर लिखा

किया
क्या जाये
अगर
पढ़ने वाले
को ही
समझ में
नहीं आ पाये
कि
उसी के
लिये ही
लिखी गई हैं
लिखने वाले
की भी
क्या गलती
उससे
उसकी नहीं
बस
अपनी अपनी
ही अगर
कही गई है

ऐसा भी
नहीं है कि
पढ़ने वाले
से पढ़ी
ही नहीं
गई हैं

आखों से
पढ़ी हैं
मन में
गड़ी हैं
कुछ
नहीं मिला
समझने
को तो
पानी में
भिगो कर
निचोड़ी
तक गई हैं

उसके
अपने लिये
कुछ नहीं
मिलने के
कारण कोई
टिप्पणी भी
नहीं करी
गई है

अपनी अपनी
कहने की
अब एक
आदत ही
हो गई है

चिट्ठियाँ हैं
घर पर
पड़ी हैं
बहुत
हो गई हैं

भेजने की
सोचे भी
कोई कैसे
ऐसे में
किसी को

अब तो
बस उनके
साथ ही
रहने की
आदत सी
हो गई है ।

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