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सोमवार, 7 सितंबर 2015

खबर है खबर रहे प्रश्न ना बने ऐसा कि कोई हल करने के लिये भी कहे

क्या है ये एक डेढ़
पन्ने के अखबार
के लिये रोज एक
तुड़ी मुड़ी सिलवटें
पड़ी हुई खबर
उसे भी खींच तान
कर लम्बा कर जैसे
नंगे के खुद अपनी
खुली टाँगों के
ना ढक पाने की
जद्दोजहद में
खींचते खींचते
उधड़ती हुई बनियाँन
के लटके हुऐ चीथड़े
आगे पीछे ऊपर नीचे
और इन सब के बीच में
खबरची भी जैसे
लटका हुआ कहीं
क्या किया जा सकता है
रोज का रोज रोज की
एक चिट्ठी बिना पते की
एक सफेद सादे पन्ने
के साथ उत्तर की
अभिलाषा में बिना टिकट
लैटर बाक्स में डाल कर
आने का अपना मजा है
पोस्टमैन कौन सा
गिनती करता है
किसी दिन एक कम
किसी दिन दो ज्यादा
खबर ताजा हो या बासी
खबर दिमाग लगाने
के लिये नहीं पढ़ने सुनने
सुनाने भर के लिये होती है
कागज में छपी हो तो
उसका भी लिफाफा
बना दिया जाता है कभी
चिट्ठी में घूमती तो रहती है
कई कई दिनों तक
वैसे भी बिना पते के
लिफाफे को किसने
खोलना है किसने पढ़ना है
पढ़ भी लिया तो कौन सा
किसी खबर का जवाब
देना जरूरी होता है
कहाँ किसी किताब में
लिखा हुआ होता है
लगा रह ‘उलूक’
तुझे भी कौन सा
अखबार बेचना है
खबर देख और
ला कर रख दे
रोज एक कम से कम
एक नहीं तो कभी
आधी ही सही
कहो कैसी कही ?

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

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