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गुरुवार, 18 जून 2015

लेखक अलादीन अगर बन जाता है जिन्न को किस काम पर लगाता है

सुना है
अलादीन
भी आजकल
कुछ कुछ
लिख रहा है
चिराग को
घिसना भी
जरूरी है
उसकी सबसे
बड़ी मजबूरी है
लिखता है
लिखने में
उसे पता है
कुछ भी तो
नहीं लगता है
विद्वानों का 
लिखा जैसा
नहीं भी

हो पाता है
कथा कहानी
कविता शायरी
नहीं भी उसे
कहा जाता है
लोग देखते हैं
समझने की कुछ
कोशिश
करते हैं
अलादीन के पास
चिराग भी होता है
चिराग के अंदर ही
सिकुड़ कर उसका
जिन्न भी सोता है
चिराग घिसते ही
जिन्न बाहर
आ जाता है
बाहर निकल कर
विशालकाय
हो जाता है
जो भी उससे
माँगा जाता है
चुटकी में सामने
से ले आता है
फिर अलादीन
जो भी देख सुन
कर आता है
जिन्न को क्यों
नहीं बताता है
खुद ही लिखने
क्यों बैठ जाता है
अलादीन विद्वान
नहीं भी होता है
समाज में तो आंखिर
यहीं के रहता है
रहते रहते बहुत कुछ
सीख जाता है
रोज लिखता है
वो सब जो उसे
साफ साफ या
कुछ धुँधला भी
कहीं दिख जाता है
लिखने के बाद
चिराग घिसना
शुरु हो जाता है
जिन्न के निकलते
ही बाहर उसे
कुछ पढ़ने वालों को
ढूंढने के लिये
भिजवाता है
लिखते लिखाते
दिन गुजर जाता है
दूसरे दिन का
लिखना लिखाना
भी शुरु हो जाता है
जिन्न तब तक भी
मगर लौट कर
नहीं आ पाता है ।

चित्र साभार:
dlb-network.com

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बीमार था आदतन भरे पेट रोटियों पर झपट रहा था

कई सालों से जिसे
एक चिराग मान कर
उसके कुछ फैलाने को
रोशनी समझ रहा था
पता नहीं क्या क्या था
और क्या क्या नहीं था
किस को क्या और
किस को क्या कोई
क्यों समझ रहा था
चिराग है वो एक
उसने ही कहा था
सभी से और मुझ से भी
एक बड़े झूठ को
उसके कहने पर जैसे
सच मुच का सच
मैं समझ रहा था
रुई की लम्बी बाती
बस एक ही नहीं थी
और बहुत सारी
अगल और बगल
में भी रख रहा था
सिरा उसके पास
ही था सभी का और
पूँछ से जिनकी कई
और चिरागों से
कुछ ना कुछ
चख रहा था
अपने तेल के स्तर
को बराबर उसी
स्तर पर बनाये
भी रख रहा था
भूखे चिरागों के
लड़ने की ताकत
को उनके तेल के
स्तर के घटने से
परख रहा था
रोशनी की बातों को
रोशनी में बहुत जोर
दे दे कर सामने से
जनता के रख रहा था
एक खोखला चिराग
रोशन चिराग का
पता अपनी छाती
पर चिपकाये
पता नहीं कब से
कितनों को
ठग रहा था
अंधा ‘उलूक’
अंधेरे में बैठा
दोनों आँख मूँदे
ना जाने कब से
रोशनी ही रोशनी
बस बक रहा था ।


चित्र साभर: http://www.shutterstock.com/

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