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शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

लिखे पर चेहरा और चेहरे पर लिखा हुआ दिखता

कभी किसी दिन
चेहरे लिखता तो
कहीं कुछ दिखता
बिना चेहरे के लिखा
भी क्या लिखा
गर्दन से कटा
बचा कुचा बाकी
शरीर के नीचे का
बेकार सा हिस्सा
चेहरा लिखने का
मतलब चेहरा
और बस चेहरा
आईने में देखी
हुई शक्ल नहीं
छोटे कान नहीं
ना ही बहुत लम्बी
नाक ना पतली गर्दन
ना काली आँख
ना वैसा ना
वैसे जैसा कुछ
कुछ नहीं तो
पैमाना लिखता
कहीं नपता
पैमाना सुनता
मदहोश होता
कुछ कभी कहीं
किसी के लिये
क्या पता अगर
मयखाना लिखता
लिखना और नहीं
लिखना बारीक
सी रेखा बीच में
लिखने वालों और
नहीं लिखने वालों
के बीच की
लिखे के बीच में से
झाँकना शुरु होता
हुआ चेहरा लिखता
चेहरे के दिखते
पीछे का धुँधलाना
शुरु होता लिखा
और लिखाया दिखता
अच्छा होता पहाड़ी नदी
से उठता हुआ सुबह
सवेरे का कोहरा लिखता
स्याही से शब्द लिखते
लिखते छोड़ देता लकीर
उसके ऊपर लिख कर
देखता चेहरे बस चेहरे
चेहरे पर चेहरे लिखता
देखता लिखा हुआ
किसे दिखता और
किसे नहीं दिखता ।

शुक्रवार, 30 मई 2014

चेहरे का चेहरा

एक खुश
चेहरे को
देख कर
एक चेहरे
का बुझ
जाना
एक बुझे
चेहरे का
एक बुझे
चेहरे पर
खुशी
ले आना
एक चेहरे
का बदल
लेना चेहरा
चेहरे के
साथ
बता देता है
चेहरा मौन
नहीं होता है
चेहरा भी
कर लेता
है बात
चेहरे दर
चेहरे
चेहरों से
गुजरते
हुऐ चेहरे
माहिर हो
जाते हैं
समय के
साथ कोशिश
कोई चेहरा
नहीं करता है
जरूरत भी
नहीं होती है
चेहरा कोई
नहीं पढ़ता है
कोई किताब
जो क्या
होती है
चेहरे काले
भी होते हैं
चेहरे सफेद
भी होते हैं
बहुत बहुत
लम्बे समय
तक साथ
साथ भी
रहते हैं
चेहरे कब
चेहरे बदल
लेते हैं
चेहरे चेहरे
से बस
यही तो
कभी नहीं
कहते हैं
चेहरे चेहरों
के कभी
नहीं होते हैं ।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

क्या करे कोई गालिब खयाल वो नहीं हैं अब

होते होंगे कुछ कहीं
इस तरह के खयाल
तेरे पास जरूर गालिब
दिल बहल जाता होगा
बहुत ही आसानी से
उन दिनो तेरे जमाने में
अब ना वो दिल
कहीं नजर आता है
ना ही कोई खयाल
सोच में उतरता है कभी
ना ही किसी गालिब की
बात कहीं दूर बहुत दूर
तक सुनाई देती है
ठंडे खून के दौरों से
कहाँ महसूस हो पाती है
कोई गरमाहट
किसी तरह की
चेहरे चेहरे में पुती
हुई नजदीकियां
उथले पानी की गहराई
सी दिखती है जगह जगह
मिलने जुलने उठने बैठने
के तरीकों की नहीं है
कोई कमी कहीं पर भी
वो होती ही नहीं है
कहीं पर भी बस
बहुत दूर से आई
हुई ही दिखती है
जब भी होता है कुछ
लिख देना सोच कर कुछ
तेरे लफ्जों में उतर कर
बारिश ही बारिश होती है
बस आँख ही से नमी
कुछ दूर हो आई सी
लगती है अजनबी सी
कैसे सम्भाले कोई
दिल को अपने
खयाल बहलाने के
नहीं होते हों जहाँ
जब भी सोचो तो
बाढ़ आई हुई सी
लगती है गालिब ।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

चेहरे को खुद ही बदलना आखिर क्यों नहीं आ पाता है

घर के चेहरे
की बात करना 
फालतू
हो जाता है
रोज देखने की
आदत जो
पड़ जाती है
याद जैसा
कुछ कुछ
हो ही जाता है
किस समय
बदला हुआ है
थोड़ा सा भी
साफ नजर में
आ जाता है
मोहल्ले से
होते हुऐ
एक चेहरा
शहर की
ओर चला
जाता है
भीड़ के
चेहरों में
कहीं जा
कर खो
भी अगर
जाता है
फिर भी
कभी दिख
जाये कहीं
जोर डालने
से याद
आ जाता है
चेहरे भी
चेहरे
दर चेहरे
होते हुऐ
कहीं से
कहीं तक
चले जाते हैं

कुछ टी वी
कुछ अखबार
कुछ समाचार
हो जाते हैं
उम्र का
असर
भी हो
तब भी
कुछ कुछ
पहचान ही
लिये जाते हैं
समय के
साथ
कुछ चेहरे
बहुत कुछ
नया भी
करना
सीख ही
ले जाते हैं
पहचान
बनाने
के लिये
हर चौराहे
पर
चेहरा अपना
एक टांक
कर आते हैं
कुछ चेहरों
को
चेहरे बदलने
में महारथ
होती है
एक चेहरे
पर
कई कई
चेहरे
तक लगा
ले जाते हैं
'उलूक'
देखता है
रोज ऐसे
कई चेहरे
अपने
आस पास
सीखना
चाहता है
चेहरा
बदलना
कई बार
रोज
बदलता है
इसी क्रम में
घर के
साबुन
बार बार
रगड़ते
रगड़ते
भी कुछ
नहीं हो
पाता है

सालों साल
ढोना एक
ही चेहरे को
वाकई
कई बार
बहुत बहुत
मुश्किल सा
हो जाता है !

रविवार, 29 सितंबर 2013

मुड़ मुड़ के देखना एक उम्र तक बुरा नहीं समझा जाता है

समय के साथ बहुत सी
आदतें आदमी की
बदलती चली जाती हैं
सड़क पर चलते चलते
किसी जमाने में
गर्दन पीछे को
बहुत बार अपने आप
मुड़ जाती है
कभी कभी दोपहिये पर
बैठे हुऐ के साथ
दुर्घटनाऐं तक ऐसे
में हो जाती हैं
जब तक अकेले होता है
पीछे मुड़ने में जरा सा
भी नहीं हिचकिचाता है
उम्र बढ़ने के साथ
पीछे मुड़ना कम
जरूर हो जाता है
सामने से आ रहे
जोड़े में से बस
एक को ही
देखा जाता है
आदमी आदमी को
नहीं देखता है
महिला को भी
आदमी नजर
नहीं आता है
अब आँखें होती हैं
तो कुछ ना कुछ
तो देखा ही जाता है
चेहरे चेहरे पर
अलग अलग भाव
नजर आता है
कोई मुस्कुराता है
कोई उदास हो जाता है
पर कौन क्या देख रहा है
किसी को कभी भी
कुछ नहीं बताता है
सब से समझदार
जो होता है वो
दिन हो या शाम
एक काला चश्मा
जरूर लगाता है ।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

चेहरे पर भी लिखा होता है

चेहरे पर भी
तो कुछ कुछ
लिखा होता है
ना कहे कुछ
भी अगर कोई
तब भी थोड़ा
थोड़ा सा तो
पता होता है
अपना चेहरा
सुबह सुबह ही
धुला होता है
साफ होता है
कुछ भी कहीं
नहीं कहता है
चेहरा चेहरे
के लिये एक
आईना होता है
अपना चेहरा
देखकर कुछ
कहाँ होता है
बहुत कम
जगहों पर
ही  एक आईना
लगा होता है
अंदर बहुत
कुछ चल
रहा होता है
चेहरा कुछ
और ही तब
उगल रहा
होता है
दूसरे चेहरे
के आते ही
चेहरा रंग
अपना बदल
रहा होता है
चेहरे पर
कुछ लिखा
होता है
ऎसा बस
ऎसे समय
में ही तो
पता चल
रहा होता है ।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

मत परेशां हुआ कर

मत परेशां हुआ कर
क्या कुछ हुआ है कहीं
कुछ भी तो नहीं
कहीं भी तो नहीं
देख क्या ये परेशां है
देख क्या वो परेशां है
जब नहीं कोई परेशां है
तो तू क्यों परेशां है
सबके चेहरे खिले जाते हैं
तेरे माथे पे क्यों
रेशे नजर आते हैं
तेरी इस आदत से
तो सब परेशां है
वाकई परेशां है
तुझे देख कर ही तो
सबके चेहरे इसी
लिये उतर जाते हैं
कुछ कहीं कहाँ होता है
जो होता है सब की
सहमति से होता है
सही होता होगा
इसी लिये होता है
एक तू परेशां है
क्यों परेशां है
अपनी आदत को बदल
जैसे सब चलते हैं
तू भी कभी तो चल
कविता देखना तेरी
तब जायेगी कुछ बदल
सब फूल देखते हैं
सुंदरता के गीत
गाते हैं सुनाते हैं
तेरी तरह हर बात पर
रोते हैं ना रुलाते हैं
उम्रदराज भी हों अगर
लड़कियों की
तरफ देख कर
कुछ तो मुस्कुराते हैं
मत परेशां हुआ कर
परेशां होने वाले
कभी भी लोगों
में नहीं गिने जाते हैं
जो परेशांनियों
को अन्देखा कर
काम कर ले जाते हैं
कामयाब कहलाते हैं
परेशानी को अन्देखा कर
जो हो रहा है
होने दिया कर
देख कर आता है
कविता मत लिखा कर
ना तू परेशां होगा
ना वो परेशां होगा
होने दिया कर
जो कर रहे हैं कुछ
करने दिया कर
मत परेशां हुआ कर ।

गुरुवार, 22 मार्च 2012

चेहरे

चेहरे दर चेहरे
कुछ लाल होते हैं
कुछ होते हैं हरे
कुछ बदलते हैं
मौसम के साथ
बारिश में
होते हैं गीले
धूप में हो
जाते हैं पीले
चेहरे चेहरे
देखते हैं
छिपते हुवे
चेहरे
पिटते हुवे
चेहरे
चेहरों को
कोई फर्क
पढ़ना मुझे
नजर नहीं
आता है
मेरा चेहरा
वैसे भी
चेहरों को
नहीं भाता है
चेहरा शीशा
हो जाता है
चेहरा चेहरे को
देखता तो है
चेहरे में चेहरा
दिखाई दे जाता है
चेहरे को चेहरा
नजर नहीं आता है
चेहरा अपना
चेहरा देख कर
ही मुस्कुराता है
खुश हो जाता है
सबके अपने
अपने चेहरे
हो जाते हैं
चेहरे किसी
के चेहरे को
देखना ही
कहाँ चाहते हैं
चेहरे बदल
रहे हैं रंग
किसी को
दिखाई नहीं देते
चेहरे चेहरे को
देखते जा रहे हैं
चेहरे अपनी
घुटन मिटा रहे हैं
चेहरे चेहरे को
नहीं देख पा रहे हैं
चेहरे पकड़े
नहीं जा रहे हैं
चेहरे चेहरे
को भुना रहे हैं
चेहरे दर चेहरे
कुछ लाल होते हैं
कुछ होते हैं हरे
कुछ बदलते हैं
मौसम के साथ
बारिश में
होते हैं गीले
धूप में हो
जाते हैं पीले।

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