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शुक्रवार, 22 मई 2015

समय समय के साथ किताबों के जिल्द बदलता रहा

गुरु लोगों ने
कोशिश की
और सिखाया भी
किताबों में
लिखा हुआ काला
चौक से काले
श्यामपट पर
श्वेत चमकते
अक्षरों को उकेरते
हुऐ धैर्य के साथ
कच्चा दिमाग भी
उतारता चला गया
समय के साथ
शब्द दर शब्द
चलचित्र की भांति
मन के कोमल
परदे पर सभी कुछ
कुछ भरा कुछ छलका
जैसे अमृत क्षीरसागर
में लेता हुआ हिलोरें
देखता हुआ विष्णु
की नागशैय्या पर
होले होले डोलती काया
ये शुरुआत थी
कालचक्र घूमा और
सीखने वाला खुद
गुरु हो चला
श्यामपट बदल कर
श्वेत हो चले
अक्षर रंगीन
इंद्रधनुषी सतरंगी
हवा में तरंगों में
जैसे तैरते उतराते
तस्वीरों में बैठ
उड़ उड़ कर आते
समझाने सिखाने का
सामान बदल गया
विष्णु क्षीरसागर
अमृत सब अपनी
जगह पर सब
उसी तरह से रहा
कुछ कहीं नहीं गया
सीखने वाला भी
पता नहीं कितना कुछ
सीखता चला गया
उम्र गुजरी समझ में
जो आना शुरु हुआ
वो कहीं भी कभी भी
किसी ने नहीं कहा
‘उलूक’ खून चूसने
वाले कीड़े की दोस्ती
दूध देने वाली एक
गाय के बीच
साथ  रहते रहते
एक ही बर्तन में
हरी घास खाने
खिलाने का सपना
सोच में पता नहीं
कब कहाँ और
कैसे घुस गया
लफड़ा हो गया
सुलझने के बजाय
उलझता ही रहा
प्रात: स्कूल भी
उसी प्रकार खुला
स्कूल की घंटी
सुबह बजी और
शाम को छुट्टी
के बाद स्कूल बंद
भी रोज की भांति
उसी तरह से ही
आज के दिन
भी होता रहा ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

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