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रविवार, 15 जुलाई 2012

कविता कमाल या बबाल

अखबार में छपी
मेरी एक कविता
कुछ ने देख कर
कर दी अनदेखी
कुछ ने डाली
सरसरी नजर
कुछ ने की
कोशिश समझने की
और दी प्रतिक्रिया
जैसे कहीं पर
कुछ हो गया
किसी का जवान
लड़का कहीं खो गया
हर किसी के भाव
चेहरे पर नजर
आ जा रहे थे
कुछ बता रहे थे
कुछ बस खाली
मूँछों के पीछे
मुस्कुरा रहे थे
कुछ आ आ कर
फुसफुसा रहे थे
फंला फंला क्या
कह रहा था
बता के भी
मुझे जा रहे थे
ऎसा जता रहे थे
जैसे मुझे मेरा कोई
चुपचाप किया हुआ
गुनाह दिखा रहे थे
श्रीमती जी को मिले
मोहल्ले के एक बुजुर्ग
अरे रुको सुनो तो जरा
क्या तुम्हारा वो
नौकरी वौकरी
छोड़ आया है
अच्छा खासा मास्टर
लगा तो था
किसी स्कूल में
अब क्या किसी
छापेखाने में काम
पर लगवाया है
ऎसे ही आज
जब अखबार में
उसका नाम छपा
हुआ मैने देखा
तुम मिल गयी
रास्ते में तो पूछा
ना खबर थी वो
ना कोई विज्ञापन था
कुछ उल्टा सुल्टा
सा लिखा था
पता नहीं वो क्या था
अंत में उसका
नाम छपा था
मित्र मिल गये
बहुत पुराने
घूमते हुवे उसी दिन
शाम को बाजार में
लपक कर आये
हाथ मिलाये और बोले
पता है अवकाश पर
आ गये हो
आते ही अखबार
में छा गये हो
अच्छा किया
कुछ छप छपा
भी जाया करेगा
जेब खर्चे के लिये
कुछ पैसा भी हाथ
में आया करेगा
घर वापस पहुंचा
तो पड़ोसी की
गुड़िया आवाज
लगा रही थी
जोर जोर से
चिल्ला रही थी
अंकल आप की
कविता आज के
अखबार में आई है
मेरी मम्मी मुझे
आज सुबह दिखाई है
बिल्कुल वैसी ही थी
जैसी मेरी हिन्दी की
किताब में होती है
टीचर कितनी भी
बार समझाये लेकिन
समझ से बाहर होती है
मैं उसे देखते ही
समझ गयी थी कि ये
जरूर कोई कविता है
बहुत ही ज्यादा लिखा है
और उसका मतलब भी
कुछ नहीं निकलता है।

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