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बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

शव का इंतजार नहीं शमशान का खुला रहना जरूरी होता है

हाँ भाई हाँ
होने होने की
बात होती है
कभी पहले सुबह
और उसके बाद
रात होती है
कभी रात पहले
और सुबह उसके
बाद होती है
फर्क किसी को
नहीं पड़ता है
होने को जमीन से
आसमान की ओर
भी अगर कभी
बरसात होती है
होता है और कई
बार होता है
दुकान का शटर
ऊपर उठा होता है
दुकानदार अपने
पूरे जत्थे के साथ
छुट्टी पर गया होता है
छुट्टी लेना सभी का
अपना अपना
अधिकार होता है
खाली पड़ी दुकानों
से भी बाजार होता है
ग्राहक का भी अपना
एक प्रकार होता है
एक खाली बाजार
देखने के लिये
आता जाता है
एक बस खाली
खरीददार होता है
होना ना होना
होता है नहीं
भी होता है
खाली दुकान को
खोलना ज्यादा
जरूरी होता है
कभी दुकान
खुली होती है और
बेचने के लिये कुछ
भी नहीं होता है
दुकानदार कहीं
दूसरी ओर कुछ
अपने लिये कुछ
और खरीदने
गया होता है
बहुत कुछ होता है
यहाँ होता है या
वहाँ होता है
गन्दी आदत है
बेशरम ‘उलूक’ की
नहीं दिखता है
दिन में उसे
फिर भी देखा और
सुना कह रहा होता है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

बुधवार, 22 जुलाई 2015

पागल एक होगा सारा निकाय कैसे पागल हो जायेगा (दुनियाँ के किसी भी कोने मे मरे लोगों के लिये श्रद्धांजलि इस क्षमा के साथ कि ब्लाग जगत में आज भी छुट्टी नहीं की गई )

पंजीकृत पागल
होने के लिये
क्या करना चाहिये
कौन बतायेगा
एक पागल
एक ही होता है
अपनी तरह
का होता है
कोई दूसरा पागल
उसकी सहायता
के लिये आखिरकार
क्यों आगे आयेगा
अब सभी लोग
पागल तो हो
नहीं सकते हैं
इसलिये जो ऐसा
सोचने लग जाये
वही तो सबसे
बड़ा पागल
कहलायेगा
कुछ हो जाये
कहीं दुनियाँ के
किसी कोने में
उसके लिये
खुद के घर में
इतना बड़ा रोना
शुरु हो जायेगा
समझ में नहीं
आती हैं कभी
इस तरह की
हरकतें विज्ञान
के हिसाब से
या मनोविज्ञान
के हिसाब से
कौन किस से
क्या कहे जब
घर ही पागलों
से भर जायेगा
अब क्या सोचना
क्या कुछ समझना
कैलीफोर्नियाँ में
मर गये शेर के लिये
जब करेगा शोक
तेरे घर का शेर
पाठक
तब तेरे समझ में
शायद कुछ आयेगा
एक दिन खाना
क्यों नहीं बना
किस से पूछने जायेगा
बात एक पागल
और सारे पागलों
की हो रही होगी
जहाँ कहीं भी
‘उलूक’ जैसे किसी
एक पागल को
पागल है
कह दिया जायेगा ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली की हार्दिक शुभकामनाऐं कहना मजबूरी हो गया है छुट्टी खुद लेकर अपने घर जा कर अपना त्योहार खुद ही मनायें कहना जरूरी हो गया है

इस बार
ही हुआ है
पहली बार
हुआ है

होली में होता
था हर साल
मेरे घर में
बहुत कुछ

इस बार कुछ
भी नहीं हुआ है
पोंगा पंडित
लगता है
कहीं गया हुआ है

पूजा पाठ होने
की खबर इस बार
हवा में नहीं
छोड़ गया है

दंगा होने के
भय का अंदेशा
भी नहीं हुआ है

खुले रहे हैं
रात भर घर
के दरवाजे
चोर और थानेदार
दोनों ने मिलकर
भाँग घोट कर
साथ मिल बाँट
कर पिया है

छुटियों का
अपना खाता
सबने खुद ही
प्रयोग कर लिया है
दुकान के खुलने
बंद होने के
दिनों को कागज ने
पूरा कर दिया है

होली पढ़ने पढा‌ने
की बस बात है
पढ़ने वाला अब
समझदार हो गया है

ऊँचाईयों को
छूने के लिये
जमीन से पाँव
उठाना बहुत
जरूरी हो गया है

होली में होता था
हर साल मेरे घर
में बहुत कुछ
इस बार कुछ भी
नहीं हुआ है
किसी से नहीं
कहना है
बुरा ना मानो होली है
‘उलूक’ ने ऐसा वैसा
हमेशा का जैसा ही
कुछ कह दिया है ।

चित्र साभार: www.imagesbuddy.com

बुधवार, 5 नवंबर 2014

हद हो गई बेशर्मी की देखिये तो जरा ‘उलूक’ को रविवार के दिन भी बेवकूफ की तरह मुस्कुराता हुआ दुकान खोलने चला आयेगा

कुछ दिन के लिये
छुट्टी पर चला जा
इधर उधर घूम
घाम कर आ जा
कुछ देख दाख
कर आयेगा
शायद उसके बाद
तुझसे कुछ अच्छा सा
कुछ लिख लिया जायेगा
सब के लिखने को
नहीं देखता है
हर एक लिखने
वाले की एक
सोच होती है
जब भी कुछ
लिखना होता है
कुछ ना कुछ
सोच कर ही
लिखता है
किसी सोच पर
लिखता है
तेरे से लगता है
कुछ कभी नहीं
हो पायेगा
तेरा लिखना
इसी तरह
हर जगह
कूड़ा करेगा
फैलता ही
चला जायेगा
झाड़ू सारे
व्यस्त हैं
पूरे देश के
तू अपनी
आदत से बाज
नहीं आयेगा
बिना किसी सोच के
बिना सोचे समझे
इसी तरह लेखन को
दो मिनट की मैगी
बना ले जायेगा
एक दिन
खायेगा आदमी
दो दिन खायेगा
आखिर हो ही
जायेगी बदहजमी
एक ना एक दिन
तेरे लिखे लिखाये
को देख कर ही
कुछ इधर को और
कुछ उधर को
भाग निकलने
के लिये हर कोई
कसमसायेगा
किसी डाक्टर ने
नहीं कहा है
रोज ही कुछ
लिखना है
बहुत जरूरी
नहीं तो बीमार
सीमार पढ़ जायेगा
अपनी ही अपनी
सोचने की सोच से
थोड़ा बाहर
निकल कर देख
यहाँ आने जाने
वाला बहुत
मुस्कुरायेगा
अगर सफेद पन्ने
के ऊपर सफेदी ही सफेदी
कुछ दिनों के लिये तू
यूँ ही छोड़ जायेगा
बहुत ही अच्छा होगा
‘उलूक’ सच में अगर
तू कुछ दिनों के लिये
यहाँ आने के बजाय
कहीं और को चला जायेगा ।

चित्र साभार: http://www.bandhymns.com

रविवार, 28 सितंबर 2014

इसकी उसकी करने का आज यहाँ मौसम नहीं हो रहा है

किसी छुट्टी के दिन
सोचने की भी छुट्टी
कर लेने की सोच
लेने में क्या बुरा है
सोच के मौन
हो जाने का सपना
देख लेने से
किसी को कौन
कहाँ रोक रहा है
अपने अंदर की बात
अपने अंदर ही
दफन कर लेने से
कफन की बचत
भी हो जाती है
दिल अपनी जगह से
चेहरा अपनी जगह से
अपने अपने हिसाब का
हिसाब किताब खुद ही
अगर कर ले रहा है
रोज ही मर जाती हैं
कई बातें सोच की
भगदड़ में दब दबा कर
बच बचा कर बाहर
भी आ जाने से भी
कौन सा उनके लिये
कहीं जलसा स्वागत
का कोई हो रहा है
कई बार पढ़ दी गई
किताबों के कपड़े
ढीले होना शुरु
हो ही जाते हैं
दिखता है बिना पढ़े
सँभाल के रख दी गई
एक किताब का
एक एक पन्ना
चिपके हुऐ एक
दूसरे को बहुत
प्यार से छू रहा है
जलने क्यों नहीं देता
किसी दिन दिल को
कुछ देर के लिये
यूँ ही ‘उलूक’
भरोसा रखकर
तो देख किसी दिन
राख हमेशा नहीं
बनती हर चीज
सोचने में
क्या जाता है
जलता हुआ
दिल है और
पानी बहुत जोर
से कहीं से चू रहा है
सोचने की छुट्टी
किसी एक
छुट्टी के दिन
सोच लेने से
कौन सा क्या
इसका उसका
कहीं हो रहा है ।

चित्र साभार: http://www.gograph.com

रविवार, 22 सितंबर 2013

छुट्टी पर जा कुछ लिख पढ़ के आ

लम्बे अर्से के बाद
मिले एक मित्र से
पूछ बैठा यूं ही
क्या बात है
बहुत दिनों के बाद
नजर आ रहे हो
आजकल काम पर
क्या किसी दूसरे
रास्ते से जा रहे हो
जवाब मिला कुछ ऐसा
काम के दिनों में
ज्यादातर छुट्टी पर
चला जाता हूं
कभी आप भी
चलिये ना मेरे साथ
चलकर आपको भी
किसी दिन वो
जगह दिखाता हूं
जहां चैन से बैठ कर
कुछ लिख पढ़
ले जाता हूं
काम का क्या है
बहुत से पागल होते हैं
काम के दीवाने
उनको थोड़ा थोड़ा
बांट के आता हूं
कागज कलम लेकर
लिखने में अब वो
मजा कहां रह गया
अखबार में लिखने पर
पता चला कि सब को
कहां हूं मैं का कुछ
पता चल गया
इसी लिये यहां
पर लिखता हूं
कौन हूं बस ये बात
किसी को नहीं बताता हूं
अंदर की बातें अपने
अंदर ही रखकर एक
छद्मरुप हो जाता हूं
बहुत सुकून मिलता है
उधर अपने किये हुऐ
इधर उधर का प्रायश्चित
इधर लिख लिख कर
पा जाता हूं
बस यही कारण है
काम के बोझ को
कम करने के लिये
लिखने पढ़ने को
कहीं को भी कभी भी
चला जाता हूं ।

रविवार, 12 मई 2013

अच्छी सोच छुट्टी के दिन की सोच

अखबार आज
नहीं पढ़ पाया
हौकर शायद
पड़ौसी को
दे आया
टी वी भी
नहीं चल पाया
बिजली का
तार बंदर ने
तोड़ गिराया
सबसे अच्छा
ये हुआ कि
मै काम पर
नहीं जा पाया
आज रविवार है
बडी़ देर में
जाकर याद आया
तभी कहूँ आज
सुबह से अच्छी
बातें क्यों सोची
जा रही हैं
थोड़ा सा रूमानी
हो जाना चाहिये
दिल की धड़कन
बता रही है
बहुत कुछ अच्छा
सा लिखते हैं
कुछ लोग
कैसे लिखते होंगे
अब समझ में
आ रहा है
मेरा लेखन
इसीलिये शायद
कूड़ा कूड़ा हुआ
जा रहा है
अखबार हो
टी वी हो
या तेरा समाज हो
तेरे को जो कुछ
दिखा रहा है
तू खुद वैसा
होता जा रहा है
कुछ अच्छी सोच
से अगर अच्छा
लिखना चाह रहा है
अखबार पढ़ना छोड़
और टी वी बेच कर
जंगल को क्यों
नहीं चले
जा रहा है ?

रविवार, 22 अप्रैल 2012

आज छुट्टी है

रोज कुछ कहने को
जरूरी नहीं बनायेगा
भौंपू आज बिल्कुल
नहीं बजाया जायेगा
किसी पर भी उंगली
आज नहीं उठायेगा
'उलूक' आज कोई
गाना नहीं सुनायेगा
आँख बंद रखेगा
और सीटियां बजायेगा
रविवार है मौन रखेगा
शांति से छुट्टी मनायेगा
'चर्चामंच' वालो से
निवेदन किया जायेगा
कोई इस बात की चर्चा
भी वहां नहीं करायेगा
'रविकर' को भी पता नहीं
चलने दिया जायेगा
देखते हैं आज कैसे
दिल्लगी कर पायेगा
सोमवार से शनिवार
पता रहता है कोई
यहां देखने नहीं आयेगा
रविवार को कम से कम
बेवकूफ नहीं बन पायेगा
'ऊँ शाँति ऊँ शाँति
शाँति शाँति ऊँ'
वाला कैसेट बजा के
सबको सुनाया जायेगा
एक दिन के लिये ब्लाग
'उलूक टाइम्स' में
ताला 'हैरीसन' का
लगाया ही जायेगा।

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