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रविवार, 29 जुलाई 2012

एक चाँद बिना दाग

एक चाँद
बिना दाग का
कब से मेरी
सोच में यूँ ही
पता नहीं क्यों
चला आता है
मुझ से किसी से
इसके बारे में
कुछ भी नहीं
 कहा जाता है
चाँद का बिना
 किसी दाग के
होना क्या एक
अजूबा सा नहीं
 हो जाता है
वैसे भी अगर
चाँद की बातें
हो रही हों
तो दाग की
बात करना
किसको पसंद 
आता है
हर कोई देखने
आता है तो
बस चाँद को
देखने आता है
आज तक किसी
ने भी कहा क्या
वो  एक दाग को
 देखने के लिये
किसी चाँद को
देखने आता है
आईने के सामने
खड़ा होकर देखने
की कोशिश कर
भी लो तब भी
हर किसी को
कोई एक दाग
कहीं ना कहीं
नजर आता है
अब ये किस्मत की
बात ही होती है
कोई चाँद की
आड़ लेकर दाग
छुपा ले जाता  है
किस्मत का मारा
हो कोई बेचारा चाँद
अपने दाग को
छुपाने में ही
मारा जाता है
उस समय मेरी
समझ में कुछ
नहीं आता है
जब एक चाँद
बिना दाग का
मेरी सोच में
यूँ ही चला
आता है ।

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