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मंगलवार, 7 मई 2013

जरूरत नहीं है ये बस ऎसे ही है

कल
मिला वो
मुस्कुराया
फिर हाथ
मिलाया

बोला
लिखते हो
बहुत
लिखते हो
रोज
लिखते हो
मैं भी
पढ़ता हूँ
रोज
पढ़ता हूँ

कोशिश
करता हूँ
बहुत
करता हूँ
एक छोर
पकड़ता हूँ
दूसरा खो
जाता है
दूसरे तक
पहुँचने का
मौका ही
नहीं आता है

क्यों
लिखते हो
क्या
लिखते हो
क्या कोई
और भी
इस बात
को समझ
ले जाता है
मेरी समझ
में ये भी
कभी नहीं
आ पाता है

शरम
आती है
बहुत आती है

उसकी
मासूमियत
पर मुझे
भी थोड़ी
सी हंसी आयी

मैने भी
उसे
ये बात
यूँ बताई

भाई
ज्यादा
दिमाग
ना मैं
लिखने
में लगाता हूँ
बस वो
ही बात
बताता हूँ
जो घर में
सड़क में
शहर में
और
सबसे ज्यादा
अपने बहुत
बडे़ से
स्कूल में
देख सुन
कर आता हूँ

ज्यादातर
बातों में
गांधी जी
का एक
बंदर बन
जाता हूँ
कभी आँख
कभी कान
कभी मुँह
पर ताला
लगाता हूँ

जब
बहुत चिढ़
लग जाती है
तो कूड़े के
डब्बे को
यहाँ लाकर
उल्टा कर
ले जाता हूँ

कितनो के
समझ में
आयी ये बात
उस पर
ज्यादा दिमाग
नहीं लगाता हूँ

लोग
वैसे ही
चटे चटाये
लगते हैं
आजकल
व्यवस्था की
बात करने पर

मैं
अपनी
धुन में
जिस बात
को कोई
वहाँ नहीं
सुनता
यहाँ आकर
पकाता हूँ

यहाँ
बहुत 
बडे़ बडे़
शेर हैं
मैदान में
जो
दहाड़ते हैं
मेरी तरह
आ कर रोज

मैं
गधा भी
कुछ ऎसे ही
तीसमारखाँओं
के बीच में
रेंकते रेंकते
थोड़ी कुछ
आवाज
कर ही
ले जाता हूँ

परेशान
मत हुआ
करिये जनाब
मत
पढ़ा करिये

इस कूडे़
के ढेर में
मैं भी
आकर
रोज
कुछ कूड़ा
अपने
घर का
भी फेंक
जाता हूँ ।

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