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गुरुवार, 10 सितंबर 2015

छोड़ भी दे देख कर लिखना सब कुछ और कुछ लिख कर देख बिना देखे भी कुछ तो जरूर लिखा जायेगा

रात को सोया कर
कुछ सपने वपने
हसीन देखा कर
सुबह सूर्य को जल
चढ़ाने के बाद ही
कुछ लिखने और
लिखाने की कभी
कभी सोचा कर
देखेगा सारा बबाल
ही चला जायेगा
दिन भर के कूड़े
कबाड़ की कहानियाँ
बीन कर जमा करने
की आदत से भी
बाज आ जायेगा
छोड़ देगा सोचना
बकरी कब गाय
की जगह लेगी कब
मुर्गे को राम की
जगह पर रख
दिया जायेगा
कब दिया जायेगा
राम को फिर वनवास
कब उसे लौट कर
आने के लिये मजबूर
कर दिया जायेगा
ऐसा देखना भी क्या
ऐसे देखे पर कुछ
लिखना भी क्या
राजा के अपने
गिनती के बर्तनों के
साथ अराजक हो
जाने पर अराजकता
का राज होकर भी
ना दिखे किसी भी
अंधे बहरे को
इससे अच्छा मौसम
लगता नहीं ‘उलूक’
तेरी जिंदगी में
फिर कहीं आगे
किसी साल में
दुबारा आयेगा
छोड़ भी दे देख
कर लिखना सब कुछ
और कुछ लिख कर
देख बिना देखे भी
कुछ तो जरूर
लिखा जायेगा ।

चित्र साभार: altamashrafiq.blogspot.com

सोमवार, 9 मार्च 2015

नहीं लिखा जाता है तो क्यों लिखने चला आता है

छोड़ता कोई
किसी को है
डाँठ कोई
और खाता है
इस देश में
होने लगा है
बहुत कुछ
अजीब गरीब
किसी की करनी
का फल किसी
और की झोली
में चला जाता है
फैसला घर वालों
का घर में ही
लिया जाता है
घर से निकल
कर कैसे जनता
में चला जाता है
चीर फाड़ होना
शुरु होती है
कोई छुरा तो
कोई कुल्हाड़ी
लिये नजर आता है
बकरी खेत में खुली
घूम रही होती है
फोटो खींचने वाला
रस्सी की फोटो
खींच लाता है
‘उलूक’ बैठा
अपने टी वी
के सामने
रोज दो में से
चार घटाता है
कौन किसके
साथ है
कौन किसके
साथ नहीं है
पहले भी कभी
समझ में
नहीं आ पाया
अब इस उम्र
में आकर जो
क्या आ पाता है
लिखने के लिये
रोज ही मिलता
है कुछ मसाला
पकाते पकाते
कुछ कच्चा
कुछ पक्का
हो जाता है
खाने को भी
किसने आना है
किसी के लिये
नमक कम
किसी के लिये
मसाला ज्यादा
हो जाता है
घर संभलता नहीं है
जिस किसी से
वो देश को संभालने
के लिये चला जाता है ।

चित्र साभार: galleryhip.com

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