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मंगलवार, 27 मई 2014

बस थोड़ी सी मुट्ठी भर स्पेस अपने लिये

बचने के लिये
इधर उधर
रोज देख लेना

और कुछ
कह देना
कुछ पर
आसान है

अचानक
सामने
टपक पड़े
खुद पर
उठे सवाल का
जवाब देना
आसान नहीं है

जरूरी भी
नहीं है
प्रश्न कहीं हो
उसका उत्तर
कहीं ना कहीं
होना ही हो

एक नहीं
ढेर सारे
अनुत्तरित प्रश्न
जिनका
सामना
नहीं किया
जाता है

नहीं झेला
जाता है
किनारे को
कर दिया
जाता है
कूड़ा कूड़ेदान
में फेंक
दिया जाता है

कूड़ेदान
के ढक्कन
को फिर
कौन उठा कर
उसमें झाँकना
दुबारा चाहता है

जितनी
जल्दी हो सके
कहीं किसी
खाली जगह
में फेंक देना
ही बेहतर विकल्प
समझा जाता है

सड़ांध से बचने
का एकमात्र तरीका
कहाँ फेंका जाये

निर्भर करता है
किस खाली जगह
का उपयोग ऐसे में
कर लिया जाये

बस यही खाली
जगह या स्पेस
ही होता है एक
बहुत मुश्किल प्रश्न

खुद के लिये
जानबूझ कर
अनदेखा
किया हुआ

पर हमेशा
नहीं होता

उधड़
ही जाती है
जिंदगी रास्ते में
कभी यूँ ही
और
खड़ा हो जाता है
यही प्रश्न बन कर

एक बहुत
बड़ी मुश्किल
बहुत बड़ी मुसीबत
कहीं कुछ
खाली जगह
अपने आप के लिये

सोच लेना
शुरु किया
नहीं की

दिखना
शुरु हो जाती हैं
कंटीली झाड़ियाँ

कूढ़े के
ढेरों पर
लटके हुऐ
बेतरतीब
कंकरीट के
जंगल जैसे
मकानों की
फोटो प्रतिलिपियों
से भरी हुई जगहें

हर तरफ
चारों ओर
मकानों से
झाँकती हुई
कई जोड़ी आँखे

नंगा करने
पर तुली हुई
जैसे खोज रही
हों सब कुछ

कुछ संतुष्टी
कुछ तृप्ति
पाने के लिये

पता नहीं
पर शायद
होती होगी
किसीके
पास कुछ
उसकी अपनी
खाली जगह
उसके ही लिये

बस बिना
सवालों के
काँटो की
तार बाड़
से घिरी
बंधन रहित

जहाँ से
बिना किसी
बहस के
उठा सके
कोई
अपने लिये
अपने ही
समय को
मुट्टी में

जी भर के
देखने के लिये
अपना प्रतिबिम्ब

पर मन को भी
नंगा कर उसके
आरपार देख कर
मजा लेने वाले
लोगों से भरी इस
दुनियाँ में नहीं है
सँभव होना

ऐसी कोई
जगह जहाँ
अतिक्रमण
ना हो

यहाँ तक
जहाँ अपनी
ही खाली
जगह को
खुद ही घेर कर
हमारी सोच
घुसी रहती है

दूसरों की खाली
जगहों के पर्दे
उतार फेंकने के
पूर जुगाड़ में
जोर शोर से ।

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