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गुरुवार, 12 मार्च 2015

आदमी की खबरों को छोड़ गधे को गधों की खबरों को ही सूँघने से नशा आता है

अब ये तो नहीं पता
कि कैसे हो जाता है
पर सोचा हुआ
कुछ कुछ आगे
आने वाले समय में
ना जाने कैसे
सचमुच ही
सच हो जाता है
गधों के बीच में
रहने वाला गधा
ही होता है
बस यही सच
पता नहीं हमेशा
सोचते समय कैसे
भूला जाता है
गधों का राजा
गधों में से ही एक
अच्छे गधे को
छाँट कर ही
बनाया जाता है
इसमें कोई गलत
बात नहीं ढूँढी
जानी चाहिये
संविधान गधों का
गधों के लिये
ही होता है
गधों के द्वारा
गधों के लिये ही
बनाया जाता है
तरक्की भी गधों
के राज में गधों
को ही दी जाती है
एक छोटी कुर्सी से
छोटे गधे को
बड़ी कुर्सी में
बैठाया जाता है
छोटी कुर्सी के लिये
एक छोटा मगर
पहले से ही
जनप्रिय बनाया और
लाईन पर लगाया
गधा बैठाया जाता है
सब कुछ सामान्य
सी प्रक्रियाऐं ही
तो नजर आती है
बस ये समझ में
नहीं आ पाता है
जब खबर फैलती है
किसी गधे को
कहीं ऊपर बैठाये
जाने की ‘उलूक’
तुझ गधे को पसीना
आना क्यों
शुरु हो जाता है ?

चित्र साभार: www.clipartof.com

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