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सोमवार, 23 मई 2016

लिखना हवा से हवा में हवा भी कभी सीख ही लेना

कफन मरने के
बाद ही खरीदे
कोई और मरने
वाले के लिये
अच्छा है
सिला सिलाया
मलमल का
खूबसूरत सा
खुद पहले से
खरीद लेना
और
जरूरी है
थोड़ा सा कुछ
सम्भाल कर
जेब में उधर
ऊपर के लिये
भी रख लेना
सब कुछ इधर
का इधर ही
निगल लेने से
भी कुछ नहीं होना
अंदाज आ ही
जाना है तब तक
पूरा नहीं भी तो
कुछ कुछ ही सही
यहाँ कितना कुछ
क्या क्या
और किसका
सभी कुछ
है हो लेना
रेवड़ियांं होती
ही हैं हमेशा से
बटने के लिये
हर जगह ही
अंधों के
बीच में ही
खबर होती
ही है अंधों के
अखबारों में
अंधों के लिये ही
आँख वालों
को इसमें
भी आता है
ना जाने
किसलिये इतना
बिलखना रोना
लिखने वाले
लिख गये हैं
टुकडे‌ टुकड़े में
पूरा का पूरा
आधे आधे का
अधूरा भी
हिसाब सारा
सब कुछ कबीर
के जमाने से ही
कभी तो माना
कर जमाने के
उसूलों को
‘उलूक’
किसी एक
पन्ने में पूरा
ताड़ का पेड़
लिख लेने से
सब कुछ
हरा हरा
नहीं होना ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

गधों के घोड़ों से ऊपर होने के जब जमाने हो रहे होते हैं

मुद्दई जैसे जैसे
सुस्त हो रहे होते हैं
मुद्दे भी उतनी ही
तेजी से चोरी
हो रहे होते हैं
मुद्दे बिल्ली के
 शिकार मोटे
तगड़े किसी चूहे
जैसे हो रहे होते हैं
बहुत उछल कूद
कर भी लेते हैं
मगर शिकार
शिकारी बिल्ले के
जबड़े में फंस कर
ही हो रहे होते हैं
किताबें मोटी कुछ
बगल में दबाकर
किताब पढ़ने वाले
ज्ञान समेट बटोर
कर जबर्दस्ती
फैला दे रहे होते हैं
काम कराने वाले
मगर अखबार की
पुरानी रद्दी से ही
अपने किये गये
कर्मों की धूल
रगड़ रगड़ बिना पानी
के धो रहे होते हैं
बेवकूफ आदमी
आदमी के सहारे
आदमी को फँसाने
की तिकड़मों को
ढो रहे होते हैं
समझदार के देश में
गाँधी पटेल नेता जी
की आत्माओं को
लड़ा कर जिंदा
आदमी की किस्मत
के फैसले हो रहे होते हैं
जमीन बेच रहा हो
कौड़ियों के मोल कोई
इसका यहाँ इसको
और उसका वहाँ उसको
इज्जत नहीं लुट रही है
जब इसमें किसी की
और मोमबत्तियों को
लेकर लोगों की सड़कों
में रेलमपेल के खेल
नहीं हो रहे होते है
 फिर तेरी ही अंतड़ियों
में मरोड़ किसलिये
और क्यों हो रहे होते हैं
मुद्दे शुरु होते समय
कीमत कहाँ बताते हैं अपनी
गरम होने में समय लेते हैं
समाचार में आते आते
बिकना शुरु हुऐ नहीं
खबर देते हैं अरबों
करोड़ों के हो रहे होते हैं
‘उलूक’ अपनी अक्ल
मत घुसेढ़ा कर हर जगह
हर बात पर उस जगह
जहाँ घोड़ों की जगह
गधो‌ के दाम बहुत
ऊँचे हो रहे होते हैं‌ ।


चित्र साभार: www.colourbox.com

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

चढ़े हुऐ के होते हुऐ उतर चुके के निशानों को इस जहाँ में कहाँ गिनते हैं

उस जमाने में
लादे गये फूल
मालाओं से
इस जमाने में
सूखे हुऐ पत्तों
में दबे मिलते हैं
भेष बदलने वाले
अब ही नहीं
बदलते हैं भेष
अपने अपने
जो बदलते हैं
बहुत पहले से
ही बदलते हैं
सब चलाते है
चमड़े के अपने
अपने सिक्के
हरेक के सिक्के
हर जमाने में
हर जगह
पर चलते हैं
बाकी कुछ
आम खास
कुछ खास
आम हो कर
हर जमाने में
किसी ना किसी
पतली गली से
चल निकलते हैं
इस देश में
देश प्रेम गीत
बहुत बनते हैं
बनते ही नहीं
खूब चलते है
तेरी नजरे
इनायत ‘उलूक’
तब उन पर हुई
किस को पड़ी है
अब देखते है
उसकी किस्मत को
जिस गधे के सिर
पर सींग आजकल
में ही एक नहीं
कई कई निकलते हैं
एक साथ निकलते हैं ।

चित्र साभार: imageenvision.com

शनिवार, 24 जनवरी 2015

आदमी होने से अच्छा आदमी दिखने के जमाने हो गये हैं

आदमी होने
का वहम हुऐ
एक या दो
दिन हुऐ हों
ऐसा भी नहीं है
ये बात हुऐ तो
एक दो नहीं
कई कई
जमाने
हो गये हैं
पता मुझको
ही है ऐसा
भी नहीं है
पता उसको
भी है वो बस
कहता नहीं है
आदमी होने के
अब फायदे
कुछ भी नहीं
रह गये हैं
आदमी दिखने
के बहुत ज्यादा
नंबर हो गये हैं
दिखने से आदमी
दिखने में ही
अब भलाई है
आदमी दिखने
वाले आदमी
अब ज्यादा ही
हो गये है
आम कौन है
और खास
कौन है आदमी
हर किसी के
सारे खास
आदमी आम
आदमी हो गये हैं
हर कोई आदमी
की बात करने
में डूबा हुआ है
आज बहुत
गहराई से
आदमी था
ही नहीं कहीं
बस वहम था
एक जमाने से
इस वहम को
पालते पालते
हुऐ ही कई
जमाने हो गये हैं ।

चित्र साभार: www.picthepix.com

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

आँख में ही दिखता है पर बाजार में भी बिकता है अब दर्द

आँख में झाँक कर
दिल का दर्द
देख कर आ गया
मुझे पता है तू
अंदर भी बहुत सी
जगहों पर जा कर
बहुत कुछ देख सुन
कर वापस आ गया
कितना तुझे दिखा
कितना तूने समझा
मुझे पता नहीं चला
क्योंकि आने के बाद
तुझसे कुछ भी कहीं भी
ऐसा कुछ नहीं कहा गया
जिससे पता चलता
किसी को कि
तू गया तो
इतने अंदर तक
कैसे चला गया
और बिना डूबे ही
सही सलामत पूरा
वापस आ गया
जमाने के साथ
नहीं चलेगा तो
बहुत पछतायेगा
किसी दिन अंदर गया
वाकई में डूब जायेगा
वैसे किसी की
आँखों तक
नहीं जाना है
जैसी बात
किसी किताब
ने बताई नहीं है
कुऐं के मुडेर से
रस्सी से पानी
निकाल लेने में
कोई बुराई नहीं है
बाल्टी लेकर कुऐं
के अंदर भी जाते थे
किसी जमाने के लोग
पर अब कहीं भी
उस तरह की साफ
सफाई और
सच्चाई नहीं है
आ जाया कर
आने के लिये
किसी ने नहीं रोका है
पर दलदल में उतरने में
तेरी भी भलाई नहीं है
जो दिखता है
वो होता नहीं
जो होता नहीं
उसी को बार बार
दिखाने की रस्म
लगता है अभी तक
तुझे किसी ने भी
समझाई नहीं है
कितने जमाने
गुजर गये और
तुझे अभी तक
जरा सी भी
अक्ल आई
नहीं है ।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

उस समय और इस समय और दिल

पहलू और उसपर
दिल का होना
पता चल जाता है
जिस दिन से
शुरू हो जाती है
कसमसाहट
हमारे पुराने
जमाने में भी
कोई नया जो
क्या होता था
ऎसा ही होता था
पर थोड़ा सा
परदे में होता था
स्टेज एक में
धक धक करने
लगता था
स्टेज दो में
उछलने लगता था
स्टेज तीन में
किसी के कंट्रोल
में चला जाता था
स्टेज चार में
भजन गाना शुरु
हो जाता था
अब तो डरता
भी नहीं है
बस लटक जाता है
बहुत मजबूती से
बाहर से ही दिखाई
देता है कि है
स्टेज वैसे ही
एक से चार
ही हो रही हैं
गजब का स्टेमिना है
चौथे में जाकर
भी बहार हो रही है
इस जमाने के
कर रहे हों तो
अजूबा सा नहीं लगता
हमारे जमाने के
कुछ कुछ में हलचल
लगातार हो रही है
ऎ छोटे से खिलौने
मान जा इतनी सी
शराफत तो दिखा जा
पुराने जमाने के
अपने भाई बहनों
को थोड़ा समझा जा
अभी भी कटेगा तो
कुछ हाथ नहीं
किसी के आयेगा
फिर से उसी बात
को दोहराया जायेगा
कतरा ए खून ही गिरेगा
वो भी किसी के
काम में नहीं आयेगा
दिल है तो क्या
गुण्डा गर्दी पर
उतर जायेगा।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

बदल जमाने के साथ चल

जमाने के साथ आ
जमाना अपना मत बना
इमानदारी कर मत
बस खाली दिखा
अन्ना की तरफदारी
भी कर ले
कोई तेरे को कहीं
भी नहीं रोक रहा
सफेद टोपी भी लगा
शाम को मशाल जलूस
अगर कोई निकाले
अपने सारे गिरोह को
उसमें शामिल करा लेजा
"सत्य अहिंसा भाईचारा
कुछ नये प्रयोग"
पर सेमिनार करा
संगोष्ठी करा वर्कशोप करा
इन सब कामों में हम से
कुछ भी काम तू करवा
हमें चाहे एक धेला
भी ना दे जा
पर हमारे लिये
परेशानी मत बन
कल उसने कुत्ते को
देख कर बकरी कहा
कोई कुछ कर पाया
हमने कुत्ते को कागज
पर "एक बकरी दिखी थी"
का स्टेटमेंट जब लिखा
अब भी संभल जा
उन नब्बे लोगों में आ
जिन्होने कुत्ते को बकरी
कहने पर कुछ भी नहीं कहा
बस आसमान की तरफ
देख कर बारिश
हो सकती है कहा
बचे दस पागलों का
गिरोह मत बना जिनको
कुत्ता कुता ही दिखा
गाड़ी मिट्टी के तेल
से घिसट ही रही हो
पहुंच तो रही है कहीं
पैट्रोल से चलाने का
सुझाव मत दे जा
जाके कहीं भी आग लगा
और हमारी तरह सुबह के
अखबार मे अपनी फोटो पा
बधाई ले लडडू बंटवा।

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