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शनिवार, 12 जुलाई 2014

लिखने की भी क्लास होती है लिखते लिखते पता हो ही जाता है

कहीं भी कोई
जमीनी हकीकत
नहीं दिखती है
किसी भी पन्ने में
वैसे दिखनी भी
नहीं चाहिये
जो हकीकत है
वो सोच में
नहीं होती है
कहीं भी किसी के
उसके होने ना
होने का पता
कुछ हो जाने
के बाद ही
चलता है
मिट्टी से लिख
देने से कोई
जमीन से थोड़ा
जुड़ा हुआ दिखने
लग जाता है
खूबसूरत और
मासूम चेहरे से ही
ज्यादातर आदमी
धोखे में आ जाता है
कर नहीं सकता है
मान लिया कुछ ऊँचा
हाई क्लास की सोच
को सोचने में खाली
जेब से क्या
चला जाता है
कहा क्या किसी ने
ऊँची सोच का कोई
सरकारी कर कहीं
लगाया जाता है
याद करता क्यों नहीं
अपने से पहली
एक पीढ़ी को
और देखता क्यों नहीं
एक आगे की सीढ़ी को
कितना बदल चुका है
सब कुछ समाज में
भाई समझा कर
कुछ पाने के लिये
ये जमाना अब
कुछ भी कर
लेना चाहता है
एक तू बेशरम है
‘उलूक’
निकल कोशिश तो कर
तेरे कुछ भी लिखे में
बस वही मिडिल क्लास
नजर आता है और
तेरा सब कुछ लिखा
इसी तरह कब
कूड़ेदान में फैंकने
के लायक हो जाता है
देखने वाला कहता
कुछ नहीं है पर
इशारों में बहुत कुछ
बता ही जाता है ।

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