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बुधवार, 6 मई 2015

क्यों कभी कोई कहीं आग से ही आग को गरम कर रहा होता है

आग होती है
थोड़ी सी कहीं
कहीं थोड़ी सी
बस राख होती है
कहीं धीमा सा
सुलगता हुआ
नरम एक
कोयला होता है
कहीं थोड़ा सा धुआँ
और बस कुछ
धुआँ होता है
कहीं जलता है
खुद का ही
कुछ खुद ही
के अंदर कहीं
जलने वाले को
पता होता है
कहीं कुछ कुछ
जल रहा होता है
कहीं दिखती है लपट
कहीं दिखता नहीं है
कुछ भी कहीं पर
कहीं कुछ बातों में
निकल बूँद बूँद
टपक रहा होता है
‘उलूक’ अपनी आग
लेकर साथ में अपने
इसकी आग से
उसकी आग में
आग लगने की
चिंता कर रहा होता है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

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