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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

मान भी जाया कर इतना मत पकाया कर

अब
अगर
उल्टी
आती है
तो कैसे
कहें उससे
कम आ

पूरा मत
निकाल
थोड़ा सा
छोटे छोटे
हिस्सों में ला

पूरा निकाल
कर लाने का
कोई जी ओ
आया है क्या

कुछ पेट में भी
छोड़ कर आ

लम्बी कविता
बन कर के क्यों
निकलती है
कुछ क्षणिंका
या हाईगा
जैसी चीज
बन के आ जा

अब अगर
कागज में
लिखकर
नहीं होता हो
किसी से
हिसाब किताब
तो जरूरी
तो नहीं ऎसा
कि यहाँ आ आ
कर बता जा

अरे कुछ
बातों को रहने
भी दिया कर
परदे में
बेशर्मों की
तरह घूँघट
अपना उधाड़
के बात बात
पर मत दिखा
रुक जा

वहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
यहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
नक्कार खाने
में कितनी भी
तूती तू बजाता
हुआ चले जा

इस से
अच्छा है
कुछ अच्छी
सोच अपनी
अभी भी
ले बना

मौन रख
बोल मत
शांत हो

अपना भी
खुश रह
हमको भी
कभी चाँद
तारों सावन
बरसात
की बातों
का रस
भी लेने दे

बहुत
पका लिया
अब जा ।

शनिवार, 12 मई 2012

जा एक करोड़ का होजा

बीबी बच्चों का
भविष्य बना
एक करोड़ का
तू बीमा करा
इधर अफसर
तीन सौ करोड़
घर के अन्दर
छिपा रहा है
उधर उसका
अर्दली दस करोड़
के साथ पकड़ा
जा रहा है
तू कभी कुछ
नहीं खा पायेगा
बस सपने ही
देखता रह जायेगा
अपने पास ना सही
किसी के पास
एक करोड़
इस तरह तो ला
एक करोड़ का
सपना तू होजा
चल सोच मत
किश्त जमा कर के आ
अभी करायेगा
कम किश्त में
हो जायेगा
बूढा़ हो जायेगा
किश्त देने में
ही मर जायेगा
आज करा अभी करा
एक करोड़
की पेटी होजा
दो रोटी कम खा
बीमा जरूर करा
बीमा करते ही
अनमोल हो जायेगा
किसी के चेहरे पर
रौनक ले आयेगा
तेरे जीने की ना सही
मरने की दुआ करने
कोई ना कोई
अब मंदिर की
तरफ जायेगा
किसी की मौत पर
रोना शुरु हो
जाते हैं लोग
तू पैदा हुआ
खुश हुवे थे लोग
मरेगा तब भी
हर कोई मुस्कुरायेगा
चल सोचना बंद कर
तीन सौ का नहीं
बस एक करोड़
का ही सही
करा जल्दी करा
साठ पर करा
और सत्तर पर
पार होजा पर
बीमा एक करोड़
का जरूर करा।

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