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बुधवार, 6 सितंबर 2017

आभार गौरी लंकेश जानवरों के लिये मरने के लिये

बहुत परेशान
रहते हैं लोग
जो चिट्ठाकारी
नहीं समझते हैं

लेकिन चिट्ठा
लेखन
करने वाले
पर मिलकर
बहस करते हैं

पड़ोसी का
खरीदा हुआ
अखबार माँग
कर पढ़ने
वाले लोग
महीने के
सौ दो सो
बचा कर
बहुत कुछ
बाँचने का
दावा करते हैं

शहर के लोग
ना चिट्ठी
जानते हैं
ना चिट्ठों से ही
उनका कोई
लेना देना है

उनकी
परेशानी है
अखबार में
आने से
रोक दी
जा रही
खबरों से
जो कहीं कहीं
चिट्ठों में कुछ
गैर सरकारी
लोग लिख
ले जाते हैं
गौरी लंकेश
हो जाते हैं
गोली खाते हैं
मर जाते हैं

गौरी लंकेश
एक बहाना है
लोग रोज
मर रहे हैं
लिखने
वाले नहीं
वो लोग
जिनको पता है
वो क्या कर रहे हैं

शहर छोड़िये
पूरे राज्य में
कितने
चिट्ठाकार हैं
जरा गिनिये
जरूरी है
आप लोगों
के लिये गिनना

कल
कितने लोगों
को गोली
खानी है
कितने लोगों
ने मरना है

कितने
लोगों को
बस यूँ ही
किसी झाड़
झंकार के
पीछे मरी हुई
एक लाश हो
कर तरना है

कितनों
के नाम
मजबूरी में
अखबार में
छापे जायेंगे

‘उलूक’
‘गौरी लंकेश’
हो जाना
सौभाग्य की
बात है
तुझे पता है
सारे पूँछ
कटे कुत्ते
पूँछ कटे
कुत्ते के
पीछे ही
 जाकर
अपनी
कटी पूँँछ
बाद में
छुपायेंगे।

चित्र साभार: Asianet Newsable

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

कपड़े शब्दों के कभी हुऐ ही नहीं उतारने की कोशिश करने से कुछ नहीं होता

फलसफा
जिंदगी का
सीखने की
जरा सी भी
कोशिश

कभी
थोड़ी सी भी
किया होता

आधी सदी
बीत गई
तुझे आये
हुऐ यहाँ
इस जमीन
इस जगह पर

कभी
किसी दिन
एक दिन के
लिये ही सही
एक अदद
आदमी
कुछ देर के
लिये ही सही
हो तो गया होता

जानवर
ही जानवर
लिखने
लिखाने में
कूद कर
नहीं आते
तेरे इस
तरह हमेशा

आदमी
लिखने का
इतना तो
हौसला
हो ही
गया होता

सपेरे
नचा रहे हैं
अपने अपने साँप
अपने अपने
हिसाब से

साँप नहीं
भी हो पाता
नाचना तो
थोड़ा बहुत
सीख ही
लिया होता

कपड़े
उतारने से बहुत
आसान होने
लगी है जिंदगी

दिखता है
हर तरफ
धुँधला नहीं
बहुत ही
साफ साफ
कुँआरे
शीशे की तरह

बहुत सारे
नंगों के बीच में
खड़ा कपड़े
पहने हुऐ
इस तरह शरमा
तो नहीं रहा होता

क्या
क्या कहेगा
कितना कहेगा
कब तक कहेगा
किस से कहेगा
‘उलूक’

हर कोई
कह रहा
है अपनी
कौन
सुन रहा
है किसकी

फैसला
जिसकी भी
अदालत में होता
तेरे सोचने के जैसा
कभी भी नहीं होता

रोज
उखाड़ा कर
रोज
बो लिया कर

कुछ
शब्द यहाँ पर

शब्दों
के होते
हुए कबाड़ से

खाली
दिमाग के
शब्दों को

इतना नंगा
कर के भी
हर समय
खरोचने
की आदत
से कहीं
भी कुछ
नहीं होता।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

रविवार, 13 सितंबर 2015

कभी हिसाब लगायें अपने अंदर इंसानियत कितने दिन चलेगी कब तक कितनी बचेगी

अचानक कौंधा
कुछ औंधे लेटे हुऐ
जमीन पर घरेलू
कुत्ते के पास
मन हुआ कुछ
चिंता कर
उपाय खोजा जाये
इंसान की घटती
हुई इंसानियत पर
इस से पहले
कि इंसानियत ही
इतिहास हो जाये
कुछ देर के लिये सही
कुछ बातें खाली यूँ ही
दिल बहलाने के लिये
झूठ मूठ के लिये ही
खुद से कह ली जायें
समझ में आ चुकी
अब तक की सारी
बातें पोटलियों में बधीं
खुद के अंदर गाँठे खोल
कर फिर से देखी जायें
रोज की इधर की उधर
और उधर की इधर
करने की आदत से
थोड़ी देर के लिये ही सही
कुछ तौबा कर ली जाये
इस सब में उलझते
उलझते टटोला गया
खुद के ही अंदर
बहुत कुछ भीतर का
पता ही नहीं चला कैसे
और कब बालों वाला
कुछ जानवर जैसा
आदमी हो चला और
समझ में आने लगा
पास में बैठा हुआ
घरेलू जानवर कितना
कितना इंसान क्यों
और कैसे हो चला
थोड़ा सा धैर्य बंधा
चलो इधर खत्म भी
हो जाती है इंसानियत
तब भी कहीं ना
कहीं तो बची रहेगी
किसी मोहनजोदाडो‌
जैसी खुदाई में ‘उलूक’
की राख में ना सही
कुत्ते की हड्डी में
शर्तिया कुछ ना कुछ
तो पक्का ही मिलेगी ।

चित्र साभार: schools-demo.clipart.com

मंगलवार, 18 मार्च 2014

देश अपना है शरम छोड़ "उलूक" कोई हर्ज नहीं हाथ आजमाने में

दिखने शुरु हो
गये हैं दलाल
हर शहर गाँव
की गलियों
सड़कों बाजार
की दुकानों में
टोह लेते हुऐ
आदमी की
सूंघते फिरने
लगे हैं पालतू
जानवर जैसे
ढूँढ रहे हो
आत्माऐं अपने
मालिकों के
मकानो की
मकान दर
मकानों में
महसूस कराने
में लग चुके
हैं नस्ल किस्म
और खानदान
की गुणवत्ता
लगा कर
नया कपड़ा
कब्र के पुराने
अपने अपने
शैतानों में
ध्यान हटवाने
में लगे है
लड़ते भिड़ते
खूँखार भेड़ियों की
खूनी जंग से
जैसे हो रहे
हो युद्ध देश
की सीमा पर
जान देने ही
जा रहे हों
सिपाहियों की तरह
नजर लगी हुई है
सब की देश के
सभी मालखानों में
जानता है हर कोई
बटने वाली है
मलाई दूध की
कुछ बिल्लियों को
कुछ दिनों के
मजमें के बाद
आँख मुँह कान
बँद कर तैयार
हो रहा है
घड़ा फोड़ने के
खेल में दिमाग
बंद कर अपना
फिर भी भाग
लगाने में
क्या बुरा है
“उलूक”
सोच भी लिया
कर कभी किसी
एक बिल्ली का
दलाल तेरे भी
हो जाने में ।

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

क्या हुआ अगर खुद लिख कर खुद ही कोई समझ रहा है

रात रात भर
भौंक रहा है
आजकल घर का
पालतू कुत्ता
भौंक रहा है तो
भौंक रहा है
रोकने की कोशिश
भी जारी है
पर फिर भी कुछ
कहीं नहीं हो रहा है
अब जब आदमी को
मौका मिल रहा है
स्कूल जाने का
तो पढ़ लिख
ले रहा है
कोई कहीं भी उसे
रोक नहीं रहा है
जो नहीं जा पा
रहा है स्कूल
वो पढ़े लिखों की
संगत में रहकर
पढ़ने लिखने की
सोच ले रहा है
क्या बुरा कर रहा है
जहाँ तक कुछ
लिख लेने की
बात आती है
लिखना बस
चाहने तक की
बात होती है
हर कोई कुछ ना कुछ
लिख ही ले रहा है
अब कौन लिख रहा है
क्या लिख रहा है
क्यों लिख रहा है
किस पर लिख रहा है
किसी को इस सब से
कहाँ कोई मतलब
जैसा ही हो रहा है
खाना खाता है हर कोई
एक समय मिल गया
तो भी ठीक
नहीं तो कोई दो दो समय
भी अपना पेट भर रहा है
सुबह से लेकर शाम तक
कभी ना कभी फारिग
भी हो ले रहा है
चल रहा है होना ही है
इसलिये हो रहा है
किसी के फारिग
हो लेने से किसी को
क्या कोई फर्क पड़ रहा है
क्या किया जाये अगर
दिमाग किसी का
चल रहा है
चल रहा है तो
चल रहा है
कमप्यूटर के प्रिंटर का
रिफिल जो क्या है
कह दिया जाये
आज खाली हो रहा है
बाजार में नया
नहीं मिल रहा है
फर्क बस इतना है
कि पालतू कुत्ता
अकेला भौं भौं
नहीं कर रहा है
पूरी रात भौकता है
जब एक बार
शुरु कर रहा है
शहर के हर कोने से
कोई ना कोई जानवर
पालतू या आवारा
उसका साथ देने में
कोई कसर भी
नहीं कर रहा है
बात अलग है
कि उलूक के पल्ले
कुछ नहीं पड़ रहा है
इतना सोच कर बस
खुश हो ले रहा है
कि पढ़े लिखे होने का
असर कहीं तो
किसी पर पड़ रहा है !

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

करे तो सही कोई समझौता वो करना सिखाना चाहता है

जानवर को पालतू
हो जाने में कोई
परेशानी नहीं होती है
काबू में आसानी
से आ जाता है
कोशिश करता है
सामंजस्य बैठाने की
हर अवस्था में
अगर बांध दिया
जाता है जंजीर से
तब भी मान लेता है
बंधन को और
खुश रहता है
ऐसा लगता है
क्योंकि खुल गया कभी
तो कहीं नहीं जाता है
वापस लौट आता है
लगता है जानवर को
आदमी बहुत अच्छी
तरह से समझ
में आता है
आदमी भी तो आदमी
से हमेशा सामंजस्य
बिठाना चाहता है
बराबरी की बने रहे रिश्तेदारी
इसलिये स्टूल में बैठ कर
सामने वाले को जमीन
में बैठाना चाहता है
स्टूल में बैठना बहुत
ही दुखदायी होता है
हर बात में इसी बात को
समझाना चाहता है
बना रहता है सामंजस्य
हमेशा तब तक जब तक
जमीन पर बैठा आदमी
अपने लिये भी एक
स्टूल नहीं बनवाना चाहता है
कोई स्टूल कोई रस्सी
कोई जंजीर कहीं भी
किसी को नजर
नहीं आती है
हर किसी के लिये
हर कोई एक
अलग ही तरीका
इस सब में
अपनाना चाहता है
दिखती रहे सबको
रेगिस्तान में हरियाली
समझदारी से
सारी बातों को
इशारों में ही समझा
ले जाना चाहता है
आदमी की तरह बना रहे
आदमी की तरह करता रहे
आदमी की तरह दिखता रहे
हर समय हर जगह
बस अपने सामने
अपने आस पास ही
एक जानवर जैसा ही
बना ले जाना चाहता है
इस तरह के समझौते
होते रहे आपस में
वो भी मिल जुल कर
एक का समझौता
दूसरे को कभी भूल कर भी
बताना नहीं चाहता है ।

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

आदमी जानवर को लिखना क्यों नहीं सिखाता है !

घोडे‌ बैल या गधे को
अपने आप कहां
कुछ आ पाता है
बोझ उठाना वो ही
उसको सिखाता है
जिसके हाथ मे‌ जा
कर पड़ जाता है
क्या उठाना है
कैसे उठाना है
किसका उठाना है
इस तरह की बात
कोई भी नहीं कहीं
सिखा पाता है
एक मालिक का
एक जानवर जब
दूसरे मालिक का
जानवर हो जाता है
कोशिश करता है
नये माहौल में भी
उसी तरह ढल जाता है
एक घर का एक
दूसरे घर का दूसरा
होने तक तो सब
सामान्य सा ही
नजर आता है
एक मौहल्ले का एक
होने के बाद से ही
बबाल शुरु हो जाता है
एक जान एक काम
बहुत अच्छी तरह से
करना चाहता है
क्या करे अगर कोई
लादना चाहता है
और दूसरा उसी समय
जोतना चाहता है
जानवर इतने के लिये
जानवर ही होता है
आदमी ना जाने
क्यों सोचता है कि
उसके कहने से तो
बैठ जाता है और
मेरे कहने पर सलाम
ठोकने को नहीं आता है
अब ऐसे में तीसरा आदमी
भी कुछ नहीं पाता है
आदमी के बारे में 
सोचने की फुर्सत नहीं
हो जिसके पास
जानवर की समस्या में
टांग अड़ाने की हिम्मत
नही‌ कर पाता है ।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

क्षमा विष्णु शर्मा : संशोधन पञ्चतन्त्र के लिये

कल की
दावत में

बस
लोमड़ी दिखी
थाली के साथ

पर नजर
नहीं आया
कहीं बगुला
अपनी सुराही
के साथ

विष्णु शर्मा
तुम्हारा पञ्चतन्त्र
इस जमाने में
पता नहीं क्यों
थोड़ा सा कहीं पर
कतरा रहा है

पैंतरे
दिखा दिखा
कर के नये
नये छेदों से
पता नहीं
कहाँ से कहाँ
घुस जा रहा है

कुछ दिनों से
क्योंकि
लोमड़ी और बगुला
साथ नजर आ रहे हैं

दावत में
एक दूसरे को
अपने अपने घर भी
नहीं बुला रहे हैं

किसी तीसरी जगह
साथ साथ दोनो
अपनी उपस्थिति
जरूर दर्ज करा रहे हैं

लोमड़ी

अपनी थाली
ले कर
चली आ रही है

बगुला भी
सुराही दबाये
बगल में
दिख जा रहा है

ना बगुला
अपनी सुराही
लोमड़ी की
तरफ बढ़ाता 
है

ना
  ही लोमड़ी
बगुले को
थाली में
खाने के
लिये बुलाती है

पर मजे
की बात है
दोनो ही मोटे
होते जा रहे हैं

दोनो ही
कुछ ना कुछ
लेकिन जरूर
खा रहे हैं

बहुत
समझदार
हो गये हैं
सारे जानवर
जंगल के

विष्णु शर्मा जी

फिर से
आ जाओ
नया
पञ्चतन्त्र लिखो
और देख लो

जंगल राज
कैसे जंगल से
आदमी में घुस के
आ गया है
और
जानवर
आदमी बन के
आदमी के अंदर
पूरा का पूरा
छा गया है ।

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

जानवर की खबर और आदमी की कबर

हथिनी के बच्चे का
नहर में समाना
कोशिश पर कोशिश
नहीं निकाल पाना
हताशा में चिंघाड़ना
और चिल्लाना
हाथियों के झुंड का
जंगल से निकल
कर आ जाना
आते ही दो दलों
में बट जाना
नहर में उतर कर
बच्चे को धक्के लगाना
बच्चे का सकुशल
बाहर आ जाना
हथिनी का बच्चे के
बगल में आ जाना
हाथियों का सूंड में
पानी भर कर लाना
बच्चे को नहलाकर
वापस निकल जाना
पूरी कहानी का
फिल्मी हो जाना
जंगली जीवन
की सरलता के
जीवंत उदाहरण का
सामने आ जाना
आपदा प्रबंधन का
नायाब तरीका
दिखा जाना
नजर हट कर
अखबार के दूसरे
कोने में जाना
आदमी की चीख
किसी का भी
ना सुन पाना
बच्चे के उसके
मौत को गले लगाना
आपदा प्रबंधन का
पावर पोइंट प्रेजेन्टेशन
याद आ जाना
सरकार का
लाश की कीमत
कुछ हजार बताना
सांत्वना की चिट्ठी
सार्वजनिक करवाना
मौत की जाँच पर
कमेटी बिठाना
तरक्की पसंद आदमी
की सोच का
जानवर हो जाना ।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

आदमखोर

ऎसा कहा जाता है
जब शेर के मुँह में
आदमी का खून
लग जाता है
उसके बाद वो
किसी जानवर को
नहीं खाता है
आदमी का शिकार
करने के लिये
शहर की ओर
चला आता है
आदमखोर हो गया है
बताया जाता है
जानवर खाता है
तब भी शेर
कहलाता है
आदमी खाने
के बाद भी
शेर ही रह जाता है
इस बात से
इतना तो पता
चल जाता है
कि आदमी बहुत
शातिर होता है
उसका आदमीपन
उसके खून में
नहीं बहता है
बहता होता तो
शेर से पता
चल ही जाता
आदमी को
खाने के बाद
शेर शर्तिया कुछ
और हो जाता
और आदमी
वाकई में एक
गजब की चीज
ना नाखून लगाता है
ना चीरा लगाता है
खाता पीता भी नजर
कहीं से नहीं आता है
सामने खड़े हुऎ को
बहुत देर में अंदाज
ये आ पाता है
कोई उसका खून
चूस ले जाता है
कोई निशान कोई
सबूत किसी को कहीं
नहीं मिल पाता है
उधर आदमखोर शेर
शिकारियों के द्वारा
जंगल के अंदर
उसके ही घर में
गिरा दिया जाता है।

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