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शनिवार, 30 अगस्त 2014

कभी ‘कुछ’ कभी ‘कुछ नहीं’ ही तो कहना है

अच्छी तरह पता है
स्वीकार करने में
कोई हिचक नहीं है
लिखने को पास में
बस दो शब्द ही होते हैं
जिनमें से एक पर
लिखने के लिये
कलम उठाता हूँ
कलम कहने पर
मुस्कुराइयेगा नहीं
होती ही नहीं है
कहीं आज
आस पास
किसी के भी
दूर कहीं रखी
भी होती होगी
ढूँढने उसे
जाता नहीं हूँ
प्रतीकात्मक
मान लीजिये
चूहा इधर उधर
कहीं घुमाता ही हूँ
चूहा भी प्रतीक है
गणेश जी के
वाहन का जिसको
कहीं बुलाता नहीं हूँ
माउस कह लीजिये
आप ठीक समझें
अगर हिलाता
इधर से उधर हूँ
खाली दिमाग के
साथ चलाता भी हूँ
दो शब्द में एक
‘कुछ’ होता है
और दूसरा होता है
‘कुछ नहीं’
सिक्का उछालता हूँ
यही बात बस एक
किसी को बताता
कभी भी नहीं हूँ
नजर पड़ती है
जैसे ही कुछ पर
उसको लिखने
के लिये बस कलम
ही एक कभी
उठाता नहीं हूँ
लिखना दवा
होता नहीं है हमेशा
बीमार होना मगर
कभी चाहता नहीं हूँ
मछलियाँ मेरे देश
की मैंने कभी
देखी भी नहीं
मछलियों की
सोचने की सोच
बनाता भी नहीं हूँ
चिड़िया को चावल
खिलाना कहा था
किसी ने कभी
मछलियों को खिलाने
जापान भी कभी
जाता नहीं हूँ
समझ लेते है
‘कुछ’ को भी मेरे
और ‘कुछ नहीं’ को
भी कुछ लोग बस
यही एक बात कभी
समझ लेता हूँ
कभी बिल्कुल भी
समझ पाता नहीं हूँ ।


चित्र: गूगल से साभार ।

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