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बुधवार, 7 जनवरी 2015

इंद्रियों को ठोक पीट कर ठीक क्यों नहीं करवाता है

कान आँख नाक
जिह्वा तव्चा को
इंद्रियां कहा जाता है
इन पाँचों के अलावा
ज्ञानी एक और
की बात बताता है
छटी इंद्री जिसे
कह दिया जाता है
गाँधी जी ने
तीन बंदर चुने
कान आँख और
जिह्वा बंद किये हुऐ
जिनको बरसों से
यहाँ वहाँ ना जाने
कहाँ कहाँ
दिखाया जाता है
सालों गुजर गये
थका नहीं एक भी
बंदर उन तीनों में से
भोजन पानी का
समय तक आता है
और चला जाता है
नाक बंद किया हुआ
बंदर क्यों नहीं था
साथ में इन तीनो के
इस बात को पचाना
मुश्किल हो जाता है
गाँधी जी बहुत
समझदार थे
ऐसा कुछ किताबों में
लिखा पाया जाता है
झाड़ू भी नहीं दे गये
किसी एक बंदर
के हाथ में
ये भी अपने आप में
एक पहेली जैसा
हो जाता है
जो भी है
अपने लिये तो
आँखो से देखना ही
बबाल हो जाता है
आँखे बंद भी
कर ली जायें तो
कानो में कोई
फुसफुसा जाता है
कान बंद करने की
कोशिश भी की
कई बार पर
अंदर का बंदर
चिल्लाना शुरु
हो जाता है
एक नहीं अनेकों
बार महसूस
किया जाता है
‘उलूक’ तुझ ही में
या तेरी इंद्रियों में ही
है कोई खराबी कहीं
आशाराम और रामपाल
की शरण में क्यों
नहीं चला जाता है
ज्यादा लोग देखते
सूँघते सुनते
महसूस करते हैं
जिन जिन बातों को
तेरे किसी भी
कार्यकलाप में
उसका जरा सा भी
अंश नहीं आता है
सब की इंद्रियाँ
सक्रिय होती हैं
हर कोई कुछ ना कुछ
कर ही ले जाता है
तुझे गलतफहमी
हो गई है लगता है
छटी इंद्री कहीं होने
की तेरे पास
इसीलिये जो कहीं
नहीं होता है
उसके होने ना
होने का वहम
तुझे हो जाता है ।

चित्र साभार: bibliblogue.wordpress.com

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