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सोमवार, 28 मई 2012

कूड़ा (एक)

रोज घर के
कूड़े की
एक थैली
बनाता है

मुंह अंधेरे
एक चेहरा
खिड़की से
बाहर निकल
कर आता है

ताकत लगा
कर थैली को
दूसरे घर
के आंगन में
पहुँचाता है

चेहरा
खिड़की बिना
आवाज किये
बंद करता
हुआ लौट
कर अपने
बिस्तरे पर
जा कर
फिर से
लुढ़क
जाता है

इस आँगन
से उस
आँगन तक
होता हुवा
थैला थैलों
से टकराते
छटकते
अंतत:
कूडे़दान
में समा तो
नहीं पाता है

पर कुछ
मुरझाये
कुछ थके हारे
सा होकर
सड़क तक
पहुँच कर
फट फटा
जाता है

कूड़ा अंदर
का निकल
कर बाहर
खुले में फैल
जाता है

बाहरी कूडे़
का सलीकेदार
प्रबंधन मेरे
शहर के हर
पढे़ लिखे
को आता है

जैविक अजैविक
कूडे़ की थैलियाँ
आते जाते कहीं
ना कहीं टकरा
ही जाती हैं

घर वालों की
औकात कूड़े
में फेंके गये
सामान से
मेल भी
खाती हैंं

थोड़ी सी
बात 'उलूक'
के पाव भर
के हवा भरे
दिमाग में
बस यहाँ
पर नहीं
घुस पाती है

दिमाग में
भरे हुवे
कूडे़ का
निस्तारण
वही चेहरा
अपने
अंदर से
कौन से
थैले में
और कहाँ
जा कर
कराता है

टी वी में
होता है कुछ
रेडियो में
होता है कुछ
कुछ अखबार
के समाचार में
चिपका हुआ
नजर आता है

चेहरा अपने
अंदर के कूड़े
के साथ
ईमानदारी
दिखाता है

कोई थैला
कहीं भी
फटा हुआ
किसी गली
किसी सड़क
में नजर
दूर दूर
तक भी
नहीं आता है ।

चित्र साभार: cliparts.co

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