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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

किसी को भी नहीं दे देना कुछ भी सभी कुछ उसी को दे आ

उसके कहने
पर चला जा
इसको दे आ
इसकी मान ले
बात और
उसको दे आ
चाँद तारों को देख
रोशनी के ख्वाब बना
अपनी गली के
अंधेरों को सपनों
में ही भगा
खुद कुछ मत सोच
इसकी या उसकी
कही बात को नोच
कपड़े पहन कर
संगम में नहा
थोड़ी घंटी थोड़ा
शंख भी बजा
झंडा रखना
जरूरी है
डंडा चाहे पीठ
के पीछे छुपा
तेजी से बदल रही
दुनियाँ के नियम
कानूनो को समझने
में दिमाग मत लगा
जहाँ को जाती
दिखे भीड़
कहीं से भी घुस
कर सामने से आजाने
का जुगाड़ लगा
जिस घर में घुसे
अपना ही घर बता
जिस घर से चले
उस में आग लगाने
के लिये एक पलीता
पहले से छोड़ जा
हारना सच को ही है
पता है सबको
झूठ के हजार पोस्टर
हजार जगहों पर चिपका
बहुत कुछ देख लेता है
‘उलूक’ रात के अंधेरे में
उसके रात को निकलने
पर सरकारी पाबंदी लगवा
दिमाग से कुछ कुछ देकर
आधा अधूरा मत बना
बिना सोचे समझे
सब कुछ देकर
पूरा बनाने का
गणित लगा
मरना तो है ही
एक ना एक दिन
सभी को कुछ तो
समझदारी दिखा
दो गज जमीन
खोद कर
पहले से कहीं ना
कहीं रख कर जा ।

चित्र साभार: eci.nic.in

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

जमाने को सिखाने की हिम्मत गलती से भी मत कर जाना

ये अपना अपना
खुद का खुद क्या
लिखना लिखाना
कभी कुछ
ऐसा भी लिख
जिसका कहे
कोई जरा
इंपेक्ट फेक्टर
तो बताना
इधर से टीप
उधर से टीप
कभी छोटा सा
कभी लम्बा
सा बना ना
बिना डरे घबराये
दो चार संदर्भ
लिखे के नीचे
से छोटे छोटे
अक्षरों में कुछ
छपवा ले जाना
इधर उस पर
कुछ पैसा बनाना
उधर इस पर
इनाम कुछ
कह कहलवा
कर उठवाना
अपने आप खुद
अपनी सोच से
कुछ लिख लिखा
लेने वालों का
जनता के बीच
मजाक बनवाना
ऐसा भी क्या
एक झंडा उठाना
जिसे फहराने
के लिये
कहना पड़ जाये
हवा से भी
आ जा ना
आ जा ना
समझ नहीं सका
बेवकूफ तू
ना समझ
पायेगा कभी भी
ये जमाना भी है
उसी का जमाना
अपनी कहते
रहते हैं मूरख
‘उलूक’ जैसे
कुछ हमेशा ही
तू उसके नीम
कहे पर चाशनी
लगा कर
हमेशा मीठा
बना बना कर
वाह वाही पाना
हींग लगेगी
ना फिटकरी
ना तेरी जेब से
कभी भी इस में
कुछ है जाना
लगा रह इसका
उस से कहते हुऐ
उसका इस से
कहते चले जा ना ।

चित्र साभार: www.clker.com

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

कहने को कुछ नहीं है ऐसे हालातों में कैसे कोई कुछ कहेगा

दिख तो रहा है
अब मत कह देना
नहीं दिख रहा है
क्यों दिख रहा है
दिखना तो
नहीं चाहिये था
क्या हुआ ऐसा
दिखाई दे गया
और जो दिखा
वही सच है
ऐसे कई सच
हर जगह
सीँच रहे हैं
खून से
जिंदा लाशों को
और बेशरम लाशें
खुश हैं व्यस्त हैं
बंद आँखों से
मरोड़ते हुऐ
सपने अपने भी
और सपनों के भी
ये दिखना दिखेगा
कोई कुछ कहेगा
कोई कुछ कहेगा
मकान चार खंभों पे
टिका ही रहेगा
खंभा खंभे
को नोचेगा
एक गिरेगा
तीन पर हिलेगा
दो गिरेंगे
दो पर चलेगा
लंगड़ायेगा
कोई नहीं देखेगा
लंगड़ा होकर भी
गिरा हुआ खंभा
मरेगा नहीं
खड़ा हो जायेगा
फिर से मकान
की खातिर नहीं
खंभे की खातिरदारी
के लिये
ऐसे ही चलेगा
कल मकान में
जलसा मिलेगा
दावत होगी
लाशें होंगी
मरी हुई नहीं
जिंदा होंगी
तालियाँ बजेंगी
एक लाल गुलाब
कहीं खिलेगा
आँसू रंगहीन
नहीं होंगे
हर जगह रंग
लाल ही होगा
पर लाली नहीं होगी
खून पीला हो चुकेगा
कोई नहीं कुछ कहेगा
कुछ दिन चलेगा
फिर कहीं कोई
किसी और रंग का
झंडा लिये खड़ा
झंडे की जगह ले लेगा
खंबा हिलेगा
हिलते खंबे को देख
खंबा हिलेगा
मकान में जलसा
फिर भी चलेगा।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

बुधवार, 13 अगस्त 2014

आज ही छपा है अखबार में कहने को कल परसों भी कह दिया है

पूरे पके और
सूखे हुऐ कददू
को हाथ में
लेकर संकल्प
ले लिया है
ना खुद खाउँगा
ना खाने दूँगा
बहुत जोर से
बहुत बड़ा एक
लाउडस्पीकर
हाथ में लेकर
कह दिया है
सावधान बड़ा
खाने वालो
खाना पीना
दिखना कहीं
किसी को भी
नजर भूल से
भी नहीं
आना चाहिये
बहुत पुराना
खा चुके मोटे
लोगों को भी
अपना भार अब
घटाना चाहिये
सब कुछ
बदल डालूँगा
एक नहीं कई कई
बार कह दिया है
खाने पीने को
छोड़ कर बाकी
सब कुछ कर लेने
का लाइसेंस बस
अपने ही ईमानदारों
को ही दिया है
अभी तो बस
बड़े बड़े खाने वालों
के लिये सी सी कैमरे
लगाये जा रहे हैं
कद्दू के अंदर
पनप रहे कीड़े
कौन सा किसी को
बाहर से कहीं
नजर आ रहे हैं
छोटे मोटे बिल पर्चे
टी ऐ डी ऐ कमीशन
सब हजार दस हजार
तक के अभी पाँच साल
तक नोटिस में
नहीं लिये जायेंगे
अगले पाँच साल में
छोटे खाने वाले भी
ट्रेनिंग रिफ्रेशर कोर्सेस
के लिये बुला लिये जायेंगे
अभी चोगे धो धुला के
स्त्री कर करा कर
शरीर पे डालना ही
सिखाया जा रहा है
मैले मन को धोने
धुलाने का पाउडर भी
जल्दी ही चीन या
अमेरिका का ही
आने जा रहा है
देश भक्तो
बेकार की
फालतू बातों में
ध्यान क्यों
लगा रहे हो
पंद्रह अगस्त
दो ही दिन के
बाद आ रहा है
इतनी बड़ी बात
भूल क्यों
जा रहे हो
खाना पीना
पीना खाना
होता रहता है
कम बाकी कल
परसों भी हो
ही जायेगा
अभी झंडे बेचने हैं
उनको बेचने और
खरीदने को कौन
कहाँ से आयेगा
कहाँ को जायेगा
चीन से बन कर
भी आता है तो
क्या होता है
झंडा ऊँचा रहे हमारा
अपने देश में ही
गाया जायेगा ।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

खड़ा था खड़ा ही रह पड़ा

पत्रकार मित्र ने
पढ़ा जब लिखा
हुआ अखबार में
छपा बड़ा बड़ा
समीक्षा करते हुऐ
कहा जैसा सभी
कह देते हैं अच्छा
बहुत अच्छा है लिखा
और एक बुद्धिजीवी
इससे ज्यादा कभी
कर भी नहीं है सका
कभी कुछ लिख
देने के सिवा
उसके पास नहीं
होता है एक उस्तरा
ना होता है हिम्मत से
लबालब कोई घड़ा
बहुत कायर होता है
लिख लिख कर
करता है साफ
अपने दिमाग से
बेकाम का देखा भोगा
घर का अड़ोस का
या पड़ौस का
हर रगड़ा झगड़ा
परजीवी तो नहीं
कहा जा सकता
पर करने में
लगा रहा हमेशा
कुछ इसी तरह का
खून छोड़िये लाल रंग
को देख कर होता है
कई बार भाग खड़ा
क्रांंति लाया हो कभी
अपने विचारों से
इतिहास में कहीं भी
ऐसा नहीं है देखा गया
मजदूरों ने जब भी
किया कहीं भी कोई
किला इंकलाब का खड़ा
हाँ वहाँ पर जा कर
हमेशा एक बुद्धिजीवी
ही है देखा गया
झंडा फहराता हुआ
एक बहुत बड़ा
पढ़ने वालों से
बहुत है पाला पड़ा
पर ऐ बेबाक मित्र
सलाम है तुझे
तूने मेरे मुँह पर ही
साफ साफ मेरा सच
कड़वा ही सही कहा
कुछ कहते हुऐ
ही नहीं बन पड़ा ।

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

आम में खास खास में आम समझ में नहीं आ पा रहा है

आज का नुस्खा
दिमाग में आम
को घुमा रहा है
आम की सोचना
शुरु करते ही
खास सामने से
आता हुआ नजर
आ जा रहा है
कल जब से
शहर वालों को
खबर मिली कि
आम आज जमघट
बस आमों में आम
का लगा रहा है
आम के कुछ खासों
को बोलने समझाने
दिखाने का एक मंच
दिया जा रहा है
खासों के खासों का
जमघट भी जगह
जगह दिख जा रहा है
जोर से बोलता हुआ
खासों का एक खास
आम को देखते ही
फुसफुसाना शुरु
हो जा रहा है
आम के खासों में
खासों का आम भी
नजर आ रहा है
टोपी सफेद कुर्ता सफेद
पायजामा सफेद झंडा
तिरंगा हाथ में एक
नजर आ रहा है
वंदे भी है मातरम भी है
अंतर बस टोपी में
लिखे हुऐ से ही
हो जा रहा है
“उलूक” तो बस
इतना पता करना
चाह रहा है
खास कभी भी
नहीं हो पाया जो
उसे क्या आम में
अब गिना जा रहा है ।

बुधवार, 24 जुलाई 2013

आज गिरोह बनायेगा कल पक्का छा जायेगा



सावन के अंधे की
तरह हो जायेगा
समय के साथ अगर
बदल नहीं पायेगा
कोई कुछ नहीं
देखेगा जहां
वहाँ तुझको
सब हरा हरा
ही नजर आयेगा
पिताजी ने बताया
होगा कोई रास्ता
उस जमाने में कभी
भटकने से तुझे वो
भी नहीं बचा पायेगा
अपने लिये आखिर
कब तक खुद ही
सोचता रह जायेगा
गिरोह में शामिल
अगर नहीं हो पायेगा
बेवकूफी के साथ
दो करोड़ घर
में रख जायेगा
आबकारी आयुक्त की
तरह लोकपाल
के पंजे मे जा
कर फंस जायेगा
समझदारी के साथ
एक झंडा उठायेगा
उंगली भी कोई नहीं
कभी उठा पायेगा
अपना और अपने
लोगों का तो करेगा
ही बहुत कुछ भला
गिरोह के लिये भी
कुछ कर पायेगा
करोडो़ की योजना
परियोजना बनायेगा
सबका हिस्सा टाईम
पर दे के आयेगा
झुक कर करता चलेगा
रोज बस नमस्कार
बस एक बार
काम का बस भोंपू
बना कर बजायेगा
आज गिरोह के लिये
झंडा एक उठायेगा
कल खुद गिरोह के
झंडे में नजर आयेगा
एक बेवकूफ दो
करोड़ के साथ
घर में
पकड़ा जायेगा
जेल पहुँच जायेगा
तू दस करोड़
भी ले जायेगा
लाल बत्ती की कार
के साथ कहीं बैठा
भी दिया जायेगा
निर्वात पैदा होने की
चिंता कोई भी
नहीं कर पायेगा
निकलते ही तेरे ऊपर
नीचे से एक
नया गिरोहबाज
तैयार खड़ा
तुझे मिल जायेगा ।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

तुलसीदास जी की दुविधा

सरस्वती प्रतिमा
को हाथ जोडे़ खडे़
तुलसीदास जी
को देख कर
थोडी़ देर को
अचंभा सा हुआ
पर पूछने से
अपने आप को
बिल्कुल भी
ना रोक सका
पूछ ही बैठा
आप और यहाँ
कैसे आज दिखाई
दे जा रहे हैं
क्या किसी को
कुछ पढा़ने के
लिये तो नहीं
आप आ रहे हैं
राम पर लिखा
किसी जमाने में
उसे ही कहाँ
अब कोई पढ़
पा रहा है
बस उसके नाम
का झंडा बहुतों
के काम बनाने
के काम में जरूर
आज आ रहा है
हाँ यहाँ तो बहुत
कुछ है नया नया
बहुत कुछ ऎसा
जैसे हो अनछुआ
अभी अभी देखा
नये जमाने का
नायक एक मेरे
सामने से ही
जा रहा है
उसके बारे में
पता चला कि
हनुमान उसे
यहाँ कहा
जा रहा है
हनुमान मेरी
किताब का
नासमझ निकला
फाल्तू में रावण से
राम के लिये
पंगा ले बैठा
यहाँ तो
सुना रावण
की संस्तुति
पर हनुमान
के आवेदन
को राम खुद ही
पहुँचा रहा है
समझदारी से देखो
कैसे दोनों का ही
आशीर्वाद बिना पंगे
के वो पा रहा है
राम और रावण
बिना किसी चिंता
2014 की फिल्म
की भूमिका बनाने
निकल जा रहे हैं
हनुमान जी जबसे
अपनी गदा यहाँ
लहरा रहे हैं
लंकादहन के
समाचार भी
अब अखबार
में नहीं पाये
जा रहे हैं
मैं भी कुछ
सोच कर यहाँ
आ रहा हूँ
पुरानी कहानी के
कुछ पन्ने हटाना
अब चाह रहा हूँ
क्या जोडूँ
क्या घटाऊँ
बस ये ही
नहीं कुछ समझ
पा रहा हूँ
विद्वानों की
छत्र छाया
शायद मिटा
दे मेरी
इस दुविधा
को कभी
इसीलिये आजकल
यहाँ के चक्कर
लगा रहा हूँ ।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

बेबस पेड़

एक झंडा एक भीड़
बेतरतीब होते हुऎ
भी परिभाषित
दे देती है अंदाज
चाहे थोड़ा ही
अपने रास्ते का
अपनी सीमा का
यहाँ तक अपनी
गुंडई का भी
दूसरी भीड़
एक दूसरा झंडा
सब कुछ तरतीब से
कदमताल करते हुऎ
मोती जैसे गुंथे हों
माला में किसी
परिभाषित नजर
तो आती है पर
होती नहीं है
यहां तक कि
अपराध करने का
अंदाज भी होता है
बहुत ही सूफियाना
दोनो भीड़ होती हैं
एक ही पेड़
की पत्तियाँ
बदल देने पर
झंडे के रंग और
काम करने के
ढंग के बावजूद
भी प्रदर्शित
कर जाती हैं
कहीं ना
कहीं चरित्र
बेबस पेड़
बस देखता
रह जाता है
अपनी ही
पत्तियों को
गिरते गिरते
बदलते हुऎ
रंग अपना
पतझड़ में ।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

देशद्रोह

थोड़ा कुछ लिखना
थोड़ा कुछ बनाना
हो जाता है अब
अपने लिये ही
आफत को बुलाना
देखने में तो बहुत
कुछ होता हुआ
हर
किसी को नजर आता है
उस होते हुऎ पर
बहुत ऊल जलूल
विचार भी आता है
कोशिश करके बहुत
अपने को रोका जाता है
सब कुछ ना कह कर
थोड़ा सा इशारे के लिये
ही तो कहा जाता है
यही थोड़ा सा कहना
और बनाना अब
देशद्रोह हो जाता है
करने वाला ऊपर से
झंडा एक फहराता है
डंडे के जोर पर
जो मन में आये
कर ले जाता है
करने वाले से
कुछ बोल पाने की
हिम्मत कोई नहीं
कर पाता है
क्योंकी ऎसा करना
सम्मान से करना
कहा जाता है
लिखने बनाने वाले पर
हर कोई बोलना
शुरू हो जाता है
सारा कानून जिंदा
उसी के लिये हो जाता है
अंदर कर दिये जाने को
सही ठहराने के लिये
अपनी विद्वता प्रदर्शित
करने का यह मौका
कोई नहीं गंवाता है
अंधेर नगरी चौपट राजा
की कहावत का मतलब
अब जा कर अच्छी तरह
समझ में आ जाता है ।

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी

देश बहुत
बड़ा है
आजादी
और
आजाद देश
को समझने
में कौन पड़ा है
जितना भी
मेरी समझ
में आता है
मेरे घर और
उसके लोगों
को देख कर
कोई भी अनाड़ी
आजादी का
मलतब आसानी
से समझ जाता है
इसलिये कोई
दिमाग अपना
नहीं लगाता है
देश की आजादी
का अंदाज
घर बैठे बैठे ही
जब लग जाता है
अपना काम
तो भाई आजादी
से चल जाता है
कहीं जाये ना
जाये आजाद
15 अगस्त और
26 जनवरी को
तो पक्का ही
काम पर जाता है
झंडा फहराता है
सलामी दे जाता है
राष्ट्रगीत में बकाया
गा कर भाग लगाता है
आजादी का मतलब
अपने बाकी आये हुऎ
आजाद भाई बहनो
चाचा ताइयों को
समझाता है
वैसे सभी को
अपने आप में
बहुत समझदार
पाया जाता है
क्योंकी आजादी को
समझने वाला ही
इन दो दिनो के
कार्यक्रमों में
बुलाया जाता है
फोटोग्राफर को भी
एक दिन का काम
मिल जाता है
अखबार के
एक कालम को
इसी के लिये
खाली रखा
जाता है
किसी एक फंड
से कोई
मिठाई सिठाई
भी जरूर
बंटवाता है
जय हिन्द
जय भारत के
नारों से
कार्यक्रम का
समापन कर
दिया जाता है
इसके बाद
के 365 दिन
कौन कहाँ
जाने वाला है
कोई किसी को
कभी नहीं
बताता है
अगले साल
फिर मिलेंगे
झंडे के साथ का
वादा जरुर
किया जाता है
जब सब कुछ
यहीं बैठ कर
पता चल जाता है
तो कौन बेवकूफ
इतना बडे़ देश
और
उसकी आजादी
को समझने के
लिये जाता है।

बुधवार, 30 मई 2012

झंडा है जरूरी

ये मत समझ लेना
कि वो बुरा होता है
पर तरक्की पसंद
जो आदमी होता है
किसी ना किसी
पार्टी से जुडा़ होता है
पार्टी से जो जुडा़
हुवा नहीं होता है
उसकी पार्टी तो
खुद खुदा होता है
स्टेटस उसका बहुत
उँचा उठा होता है
जिसके चेहरे पर
एक झंडा लगा होता है
सत्ता होने ना होने
से कुछ नहीं होता है
इनकी रहे तो ये
उनको नहीं छूता है
उनकी रही तो
इनको भी कोई
कुछ नहीं कहता है
इस बार इनका
काम आसान होता है
उनका ये समय तो
आराम का होता है
अगली बार उनका
हर जगह नाम होता है
इनका कुन्बा दिन
हो या रात सोता रहता है
बिना झंडे वाला बकरे
का बार बार काम
तमाम होता है
जिसे देखने के लिये भी
वहाँ ना ये होता है
ना ही वो होता है
भीड़ काबू करने का
दोनो को जैसे कोई
वरदान होता है
भीड़ के एक छोटे
हिस्से पर इनका
दबदबा होता है
बचे हिस्से को
जो काबू में
कर ही लेता है
अपने कामों को
करने के लिये
झंडा मिलन भी
हो रहा होता है
मीटिंग होती है
मंच बनता है
उस समय इनका
झंडा घर में सो
रहा होता है
पर तरक्की पसंद
जो आदमी होता है
किसी ना किसी
झंडे से जुड़ा होता है
जिसका कोई झंडा
नहीं होता है
वो कभी भी ना ये
होता है ना वो होता है।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

बिल्ली युद्ध

आइये शुरू
किया जाये
एक खेल
वही पुराना
बिल्लियों को
एक दूसरे से
आपस मे
लड़वाना
जरूरी नहीं
की बिल्ली
मजबूत हो
बस एक अदद
बिल्ली का होना
है बेहद जरूरी
चूहे कुत्ते सियार
भी रहें तैयार
कूद पड़े
मैदान में
अगर होने
लगे कहीं
मारा मार
शर्त है
बिल्ली बिल्ली
को छू नहीं
पायेगी
गुस्सा दिखा
सकती है
केवल मूंछ
हिलायेगी
मूंछ का
हिलना बता
पायेगा बिल्ली
की सेना को
रास्ता
सारी लड़ाई
बस दिखाई
जायेगी
अखबार टी वी
में भी आयेगी
कोई बिल्ली
कहीं भी नहीं
मारी जायेगी
सियार कुत्ते
चूहे सिर्फ
हल्ला मचायेंगे
बिल्ली के लिये
झंडा हिलायेंगे
जो बिल्ली
अंत में
जीत पायेगी
वो कुछ
सालों के लिये
फ्रीज कर दी
जायेगी
उसमें फिर
अगर कुछ
ताकत बची
पायी जायेगी
तो फिर से
मरने मरने
तक कुछ
कुछ साल में
आजमाई जायेगी
जो हार जायेगी
उसे भी चिंता
करने की
जरूरत नहीं
उसके लिये
दूध में अलग
से मलाई
लगाई जायेगी।

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