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शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

बिना झंडे के लोग लावारिस हो रहे हैं

चेहरे
दिखा
करते
थे कभी
आज झंडे
हो रहे हैं

उग रहे
हैं झंडे
बेमौसम
बिना पानी
झंडे ही झंडे
हो रहे हैं

चल रहे हैं
लिये हाथ में
डंडे ही डंडे
कपड़े रंगीले
हरे पीले
गेरुए
हो रहे हैं

धनुष है
ना तीर है
निशाने
सपनों
में लिये
अपने अपने
जगह जगह
गली कोने
अर्जुन
ही अर्जुन
हो रहे हैं

शक्ल
अपनी
आईने में
देखने से
सब के ही
आजकल
परहेज
हो रहे हैं

सच्चाई
सामने
देख कर
क्योंकि
कई क्लेश
हो रहे हैं

उग रहे हैं
रोज झंडे
चेहरों के
ऊपर कई
बस चेहरे
हैं कि
बेनूर हो
रहे हैं

खेत अपने
लिये साथ
में वो हैं
किसान
हो रहे हैं

झंडे लिये
हाथ में
किसी के
खेत में
कोई झंडे
बो रहे हैं

बिना डंडे
बिना झंडे
के बेवकूफ
सो रहे हैं

गली मोहल्ले
में तमाशे
करने वाले
अपनी किस्मत
पे रो रहे हैं

देश के लिये
इक्ट्ठा कर
रहे हैं झंडे
झंडों को
इधर भी
उधर भी

झंडे के
ऊपर भी
झंडे और
नीचे भी
झंडे हो
रहे हैं

इन्सान
की बात
इन्सानियत
की बात
फजूल की
बात है
इन दिनों
‘उलूक’

औकात की
बात कर
बिना झंडे
के लोग
लावारिस
हो रहे हैं ।

चित्र साभार: Canstockphoto.com

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

ऊपर वाले ऊपर ही रहना नीचे नहीं आना

हे ऊपर वाले
तू ऊपर ही रहना
गलती से भी
भूल कर कभी
सशरीर नीचे
मत चले आना
सर घूम जाता है
समझ में नहीं
आ पाता है
जब तेरे झंडों
और नारों के
साथ ही इतना
बबाल कर
दिया जाता है
क्या होगा अगर
कोई देख लेगा
सामने से साक्षात
चलता हुआ
ऊपर वाला खुद
अपने ही पैरों पर
धरती पर आकर
चलना शुरु
हो जाता है
कहाँ जायेगा
ऊपर वाला जब
यहाँ आ ही जायेगा
प्रधानमंत्री के
साथ जायेगा या
आम आदमी
के साथ जायेगा
मंदिर में रहेगा
मस्जिद में रहेगा
या किसी गुरुद्वारे
में जा कर
बैठ जायेगा
संसद में पहुँच
गया अगर
कौन से दल के
नेता से जाकर
हाथ मिलायेगा
किस तरह
का दिखेगा
क्या कोई
पहचान भी
पायेगा
हे ऊपर वाले
तेरे नहीं होने से
यहाँ थोड़े बहुत
मर कट रहे हैं
तेर नाम पर ही
तू आ ही गया
सच में बड़ा एक
बबाल हो जायेगा
रहने दे ऊपर ही
कहीं बैठ कर
कर जो कुछ भी
तेरे बस का है
गलती से
उतर आयेगा
अगर नीचे
उतना कुछ भी
नहीं कर पायेगा
नोचने दे अपने
नाम पर नोचने
वालों को नीचे
हो सकता है
तुझे ही शायद
पहचान नहीं
होने से नोच
दिया जायेगा
अगर किसी को
नीचे कहीं
नजर आ जायेगा ।

चित्र साभार: pupublogja.nolblog.hu

शनिवार, 31 जनवरी 2015

एक को चूहा बता कर हजार बिल्लियों ने उसे मारने से पहले बहुत जोर का हल्ला करना है


बाअदब
बामुलाहिजा
हो शियार
बाकी सब कुछ
तो ठीक है
अपनी अपनी
जगह पर
तुम एक
छोटी सी बात
हमको भी
बताओ यार
शेर के खोल
पहन कर
कब तक करोगे
असली शेरों
का शिकार
सबसे मनवा
लिया है
सब ने मान
भी लिया है
कबूल कर
लिया है
सारे के सारे
इधर के भी
उधर के भी
हमारे और
तुम्हारे तुम जैसे
जहाँ कहीं पर
जो भी जैसे भी हो
शेर ही हो
उसको भी पता है
जिसको घिर घिरा
कर तुम लोगों
के हाथों बातों के
युद्ध में मरना है
मुस्कुराते हुऐ
तुम्हारे सामने
से खड़ा है
गिरा भी लोगे
तुम सब मिल
कर उसको
क्योंकि एक के
साथ एक के युद्ध
करने की सोचना
ही बेवकूफी
से भरा है
अब बस एक
छोटा सा काम
ही रह गया है
एक चूहे को
खलास करने
के लिये ही
सैकड़ों तुम जैसी
बिल्लियों को
कोने कोने से
उमड़ना है
लगे रहो
लगा लो जोर
कहावत भी है
वही होता है जो
राम जी को
पता होता है
जो करना होता है
वो सब राम जी ने ही
करना होता है
राम जी भी
तस्वीरों में तक
इन दिनों कहाँ
पाये जाते हैं
तुम्हारे ही किसी
हनुमान जी की
जेबों में से ही
उन्होने भी
जगह जगह
अपना झंडा
ऊँचा करना है
वो भी बस
चुनाव तक
उसके बाद
राम जी कहाँ
हनुमान जी कहाँ
दोनो को ही
मिलकर
एक दूसरे के लिये
एक दूसरे के
हाथों में हाथ लिये
विदेश का दौरा
साल दर साल
हर साल करना है ।

चित्र साभार: www.bikesarena.com

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

इंसानियत तो बस एक मुद्दा हो जाता सरे आम दिन दोपहर की रोशनी में उसे नंगा किया जाता है अंधा ‘उलूक’ देखने चला आता है

एक नहीं 
कई बार 
कहा है तुझसे 
दिन में मत 
निकला कर 
निकल भी 
जाता है अगर 
तो जो दिखता है 
मत देखा कर 
ऐसा देख कर आना 
फिर यहाँ आ 
कर बताना 
क्यों करता है 
रात का निशाचर है 
दिन वालों की 
खबर रखता है 
हर प्रहर के 
अपने नियम कानून 
बनाये जाते हैं 
दिन के दिन में 
रात के रात में 
चलाये जाते हैं 
उल्लुओं की दुनियाँ 
के कब्रिस्तान 
दिन की फिल्मों में 
ही दिखाये जाते हैं 
इंसान इंसान होता है 
इंसान ही उसे 
समझ पाते हैं 
बलात्कार होना 
लाश हो जाना 
कीड़े पड़ जाना 
लाश घर में रख कर 
आँदोलित हो जाना 
वाजिब है 
समझ में भी आता है
आक्रोश होना
अलग बात होती है
आक्रोश दिखाया जाता है
स्कूल बंद कराये जाते हैं
बाजार बंद कराये जाते हैं
बंद कराने वाले
अपने अपने रंग बिरंगे
झंडे जरूर साथ
ले कर आते हैं
अखबार वाले
समाचार बनाने आते हैं
टी वी वाले
वीडियो बनाने आते हैं
अगला चुनाव
दिमाग में होता है
राजनीतिज्ञ
वक्तव्य दे जाते हैं
सब कुछ साफ साफ
देख लेता है ‘उलूक’
दिन के उजाले में भी
घटना दुर्घटना
महज मुद्दे हो जाते हैं
सबके लिये काम होता है
मुद्दे भुनाने का
बस भोगने वाले
अपने आँसू खुद
ही पी जाते हैं
इंसान का हुआ होता
है बलात्कार और
बस इंसान ही खो जाते हैं
कहीं भी नजर नहीं आते हैं
सोच में आती है
कुछ देर के लिये एक बात
सभी अपने रंगीन
झंडों को भूलकर
किसी एक घड़ी के लिये
काले झंडे एक साथ
एक सुर में
क्यों नहीं उठा पाते हैं ।

चित्र साभर: gladlylistening.wordpress.com

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

बिल्ला कोई भी लगायेगा आदमी तो हो जायेगा !

कितनी भी बडी़
तोप तू होता होगा
तेरा गोला चलकर
भी फुस्स हो जायेगा
किसी भी गलत मुद्दे को
तू सही ठहराने की
मुहिम में हार जायेगा
कोई भी तेरे साथ
में नहीं आ पायेगा
एक ना एक दिन
लटका दिया जायेगा
बिना किसी बात के
मुश्किल में भी फंसा
कहीं दिया जायेगा
अपने पत्ते अगर
नहीं उनको दिखायेगा
तेरे होने ना होने से
यहाँ कुछ नहीं होता
जो भी होता है
माथे पे लिखे हुऎ
बिल्ले से होता है
तेरा होना यहाँ
भाजपा या काँग्रेस
वाला ही बता पायेगा
दो में नहीं होना भी
थोड़ा बहुत चल जायेगा
तीसरे फ्रंट से कहीं
तेरा तार अगर जुड़ा
उन्हें कहीं दिख जायेगा
मुश्किल में होने पर
होना कहीं ही तेरे को
बचा ले जायेगा
एक दिन तू बचेगा
कभी तू भी किसी को
बचा कर निकाल
के ले आयेगा
कहीं नहीं होने वाला
अपनी आवाज से
बस कुछ कौऎ
और कबूतर ही
उड़ा पायेगा
दल में नहीं घुस सके
संगठन से उसके जा
कर भी अगर
कहीं जुड़ जायेगा
मुश्किलें पैदा करना
किसी के लिये भी
तेरे लिये आसान
बहुत हो जायेगा
हर कोई तेरे से
राय फिर जरूर
लेने के लिये आयेगा
चुनाव के दिनों
को छोड़कर
बाकी दिनों की
समस्या में तू
कहाँ है ये नहीं
देखा जायेगा
तेरे दर्द के लिये
उधर वाला भी
अपने झंडे दिखा
कर जलूस बनायेगा
सबके दिल में
होगा तू इधर भी
और उधर भी
तेरा नाम किसी
की जबान पर
कहीं भी नहीं आयेगा
मेरी एक पते
की बात अगर
तू मान जायेगा
सोनिया, मोदी,
वृंदा या माया दीदी
में से किसी की
छाया भी अगर
कहीं पा जायेगा
तेरा अस्तित्व
उस दिन उभर
कर निखर जायेगा
कौड़ी का भाव
जो आज है तेरा
करोड़ों के मोल
का हो जायेगा
कुछ लोगों के
लिये कुछ
करने वालों मे
गिन लिया जायेगा
ये सब तभी
संभव हो पायेगा
जब बिल्ला कोई एक
माथे पर आज भी
अपने लिखवायेगा
ऎसे ही चलता
रहा बिना छत्र
छाया के अगर
कौन तेरा भला
कुछ कर पायेगा
लावारिस में गिना
जाता है आज भी
लावारिस हमेशा
के लिये हो जायेगा ।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

सायरन बजा देवता नचा

कुछ ही दिन पहले तक
लोगों के बीच में था
एक आदमी अब
सायरन सुना रहा है
सड़क पर खड़ी जनता को
अपने से दूर भगा रहा है
सायरन बजाने वालों
में बहुत लोगों का अब
नम्बर आ जा रहा है
जिसका नहीं आ पा रहा है
वो गड्ढे खोदने को जा रहा है
काफिले बदल रहे हैं
झंडे बदल रहे हैं
कुछ दिन पहले तक
सड़क पर दिखने वाला 

चेहरा आज बख्तरबंद 
गाड़ी में जा रहा है
पुराने नेता और उनको
शहर से बाहर तक 

छोड़ने जाने वाले लोगों
को अब बस बुखार
ही आ रहा है
गाड़ियां फूलों की माला
सायरन की आवाज
काफिले का अंदाज
नहीं बदला जा रहा है
टोपी के नीचे वाला
हर पाचं साल में
बदल जा रहा है
शहर में लाने ले जाने
वाले भी बदल जा रहे हैं
बदल बदल के पार्टियों
के राजकाज को वोटर 

सिर खुजाता जा रहा है
बस सुन रहा है सायरन
का संगीत बार बार
पहले वो बजा रहा था
अब ये बजा रहा है
देव भूमि के देवताओं
को नचा रहा है
मेरा प्रदेश बस 
मातम  मना रहा है
दिन पर दिन
धरती में समाता
जा रहा है 

उसको क्या पड़ी है
वो बस सड़क पर
गाड़ियां दौड़ा रहा है
सायरन बजा रहा है।

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