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शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

स्पोक्समैन

पढ़ा लिखा होने से
कुछ हो ना हो
आदमी समझदार
बड़ा हो जाता है
कुछ नहीं कहता है
उसे अपने मुँह पर
हैरीसन का ताला
लगाना आ जाता है
सबसे ज्यादा होशियार
पढ़ा लिखा पढे़ लिखों
की एक जमात का
कहने सुनने की जिम्मेदारी
अपने आप ही उठाता है
बिना किसी से पूछे हुऎ
अपने मन की कहानियाँ
खुद ही बनाता पकाता है
अखबार में अपने वक्तव्य
पढे़ लिखों की तरफ से
भिजवाता है छपाता है
अखबार वाला भी
पढे़ लिखों से कुछ
पूछने नहीं आता है
पढे़ लिखों की बाते हैं
सोच कर कुछ भी
छाप ले जाता है
पढे़ लिखे ने क्या कहा
उनको अखबार में
छपी खबर से ही
पता चल पाता है
पढ़ालिखा उसको
चश्मा लगा कर पढ़ता है
इधर उधर देखता
कि उसे पढ़ते हुऎ तो
कोई नहीं देखता है
और सो जाता है
पढ़ा लिखा सब्जी
की तरह होता है
बडी़ मुश्किल से
पैदा हो पाता है
उसकी तरफ से बात
को कहने वाला
झाड़ की माफिक होता है
कहीं भी किसी मौसम में
बिना खाद के उग जाता है
ऎसे पढे़ लिखे को आजकल
स्पोक्समैन कहा जाता है ।

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