उलूक टाइम्स: दरवाजा
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बुधवार, 6 अगस्त 2014

बारिशों का पानी भी कोई पानी है नालियों में बह कर खो जाता है

खुली खिड़कियों
को बरसात
के मौसम में
यूँ ही खुला
छोड़ कर
चले जाने
के बाद
जब कोई
लौट कर
वापस
आता है
कई दिनों
के बाद
गली में
पाँवों के
निशान तक
बरसते पानी
के साथ
बह चुके
होते हैं
पता भी
नहीं चलता है
किसी के आने
और
झाँकने का भी
दरवाजे भी
कुछ कुछ
अकड़ चुके
होते है
बहुत सारे
लोग
बहुत सारे
लोगों के
साथ साथ
आगे पीछे
होते होते
कहीं से
कहीं की
ओर निकल
चुके होते हैं
वहम होने
या
ना होने का
हमेशा वहम
ही रह
जाता है
जब कोई
गया हुआ
वापस लौट
कर आता है
जहाँ से
गया था
वहाँ पहुँच
कर बस
इतना ही
पता चल
पाता है
पता नहीं
किसी ने
पता लिख
दिया था
उस का
उस जगह का
जहाँ उसे
लगता था
वो है
उस जगह पर
लौट कर
खुद अपने
को ही बस
नहीं ढूँढ
पाता है
हर कोई
अपने अपने
पते को
लेकर
अपनी अपनी
चिट्ठी

खुद के
लिये ही

लिखता हुआ
नजर आता है
ना पोस्ट आफिस
होता है जहाँ
ना ही कोई
डाकिया
कहीं दूर
दूर तक
नजर आता है
‘उलूक’
बहुत ही
जालिम है ये
सफेद पन्ना
काला नहीं
हो पाता है
अगर कभी
तो कोई
भी झाँकने
तक नहीं
आता है
काँटा
चुभा रहना
जरूरी है
पाँव के
नीचे से
खून दिखना
भी जरूरी
हो जाता है
तेरा पता तुझे
पता होता है
खुद ही खोना
खुद ही ढूँढना
खुद को यहाँ
हर किसी को
इतना मगर
जरूर
आता है ।