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सोमवार, 6 मार्च 2017

सुना है फिर से आ गयी है होली

चल बटोरें रंग
बिखरे हुऐ
इधर उधर
यहाँ वहाँ
छोड़ कर
आ रहा है
आदमी आज
ना जाने सब
कहाँ कहाँ

सुना है फिर से
आ गयी है होली
बदलना शुरु
हो गया है मौसम

चल
करें कोशिश
बदलने की
व्यवहार को अपने
ओढ़ कर हंसी
चेहरे पर दिखाकर
झूठी ही सही
थोड़ी सी खुशी
मिलने की
मिलाने की

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
दिखायें रास्ते
शब्दों को
भटके हुऐ
बदलें मतलब
वक्तव्य के
दिये हुए
अपनों के
परायों के
करें काबू
जबानें
लोगों की
सभी जो
आते
हैं नजर
इधर और
उधर सटके हुऐ

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल चढ़ाये भंग
उड़ायें रंग
जगायें ख्वाब
सिमटे हुऐ
सोते हुऐ
यहाँ से
वहाँ तक
के सभी के
जितने भी दिखें
समय के
साथ लटके हुऐ

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
करें दंगा
करें पंगा
लेकिन निकल
बाहर हम्माम से
कुछ ही दिन सही
सभी नंगों के
साथ हो नंगा

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
उतारें रंग
चेहरे के
मुखौटों के
दिखायें रंग
अपने ही
खुद के होठों के
कहें उसकी नहीं
बस अपनी ही
कहें अपनों से कहें
किसलिये
लुढ़कना
हर समय
है जरूरी
साथ लोटों के

सुना है फिर से
आ गयी है होली
सुना है फिर से
आ गयी है होली ।


चित्र साभार: Happy Holi 2017

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

कपड़े शब्दों के कभी हुऐ ही नहीं उतारने की कोशिश करने से कुछ नहीं होता

फलसफा
जिंदगी का
सीखने की
जरा सी भी
कोशिश

कभी
थोड़ी सी भी
किया होता

आधी सदी
बीत गई
तुझे आये
हुऐ यहाँ
इस जमीन
इस जगह पर

कभी
किसी दिन
एक दिन के
लिये ही सही
एक अदद
आदमी
कुछ देर के
लिये ही सही
हो तो गया होता

जानवर
ही जानवर
लिखने
लिखाने में
कूद कर
नहीं आते
तेरे इस
तरह हमेशा

आदमी
लिखने का
इतना तो
हौसला
हो ही
गया होता

सपेरे
नचा रहे हैं
अपने अपने साँप
अपने अपने
हिसाब से

साँप नहीं
भी हो पाता
नाचना तो
थोड़ा बहुत
सीख ही
लिया होता

कपड़े
उतारने से बहुत
आसान होने
लगी है जिंदगी

दिखता है
हर तरफ
धुँधला नहीं
बहुत ही
साफ साफ
कुँआरे
शीशे की तरह

बहुत सारे
नंगों के बीच में
खड़ा कपड़े
पहने हुऐ
इस तरह शरमा
तो नहीं रहा होता

क्या
क्या कहेगा
कितना कहेगा
कब तक कहेगा
किस से कहेगा
‘उलूक’

हर कोई
कह रहा
है अपनी
कौन
सुन रहा
है किसकी

फैसला
जिसकी भी
अदालत में होता
तेरे सोचने के जैसा
कभी भी नहीं होता

रोज
उखाड़ा कर
रोज
बो लिया कर

कुछ
शब्द यहाँ पर

शब्दों
के होते
हुए कबाड़ से

खाली
दिमाग के
शब्दों को

इतना नंगा
कर के भी
हर समय
खरोचने
की आदत
से कहीं
भी कुछ
नहीं होता।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

उसके कुछ भद्दे कहे गये पर बौखलाने से कहीं भी कुछ भी नहीं होता है

तुम्हारे
बौखलाने से
अगर उसे
या
उसके जैसे
सभी अन्य
लोगों को
कोई असर
होने वाला होता
तो वो पहले ही
कोशिश करता

एक
भद्दा गाना
नहीं गाता
ऐसा एक ना
एक गाना
रोज ही
उसके ही किसी
स्टूडियो में
जानबूझ कर
तैयार किया
जाता है

और उसकी
जैसी सोच के
सभी लोगों
की सहमति
के साथ
उसके ही
बाजार में
पेश कर
दिया जाता है

तुम सुनो
ना सुनो
नाक भौं
सिकौड़ो
उसे कोसो
गालियाँ दो
अखबार
में लिखो
आकाशवाणी
दूरदर्शन
में खुली
बहसें रखो
ब्लाग में
पोस्ट करो
उसके बाद
चर्चा में
उसे लाकर
सजाकर धरो

इसके गुस्से
पर किसी
उसकी टिप्प्णी
उसके
खिसियाने पर
किसी इसकी
झिड़कियों
को पढ़ो
कुछ लिखो

होना कुछ
नहीं है
सारी
मसालेदार मिर्ची
भरी तीखी
फूहड़ बातें
करते समय
उसके दिमाग
में अपने जैसे
उसके सभी
वो लोग होते हैं
जिन्होने उसे
और उसके
जैसे लोगों को
ताज पहना कर
बादशाह
बनाया होता है

और
उनकी
अपेक्षाओं में
खरा उतरने
के लिये बहुत
जरूरी होता है

कुछ ऐसी भद्दी
बात कर देना
जिससे
कहीं ना कहीं
कोई नंगा होता है

और इसी सीढ़ी
पर चढ़ कर
उसे अगली बार
कुर्सी पर
चढ़ना होता है

इसलिये
फिर से सुन लो
थोड़े तुम्हारे
हमारे जैसों
के बौखलाने
से उसके
और उसके
समर्थकों का
हौसला बुलंद
ही होता है

हम्माम
भी उसका
पानी भी
उसका
नहाना
उसमें उसे
और उसके
जैसे लोगों
को ही होता है

उसके कुछ
भद्दे कहे गये
पर बौखलाने
से कहीं भी
कुछ भी
नहीं होता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

बुधवार, 27 मई 2015

परेशान हो जाना सवाल देख कर सवाल का जवाब नहीं होता है

हमाम के
अंदर रहता है
अपने खुद के
पहने हुऐ
कपड़ों को
देख कर
परेशान होता है
दो चार जानवरों
के बारे में बात
कर पाता है
जिसमें एक गधा
एक लोमड़ी या
एक कुत्ता होता है
सब होते हैं जहाँ
वहाँ खुद मौजूद
नहीं होता है
इंसानों के बीच
एक गधे को
और गधों के बीच
एक इंसान का रहना
एक अकेले के लिये
अच्छा नहीं होता है
ढू‌ढ लेते हैं अपनी
शक्ल से मिलती
शक्लें लोग हमेशा ही
इस सब के लिये
आईना किसी के
पास होना जरूरी
नहीं होता है
इज्जत उतारने
के लिये कुछ
कह दिया जाये
किसी से
किसी किताब में
कहीं कुछ ऐसा
लिखा भी
नहीं होता है
अपने कपड़े तेरे
खुद के ही हैं
‘उलूक’
नंगों के
बीच जाता है
जिस समय
कुछ देर के लिये
उतार क्यों
नहीं देता है ?

चित्र साभार: imageenvision.com

सोमवार, 18 मई 2015

सच होता है जिंदा रहने के लिये ही उसे रहने दिया जाता है

एक आदमी
पकड़ता है
दौड़ते हुऐ
शब्दों में से
कुछ शब्द
जानबूझ कर
छोड़ते हुऐ
नंगे शब्दों को
जिनमें छुपा
होता है उसके
खुद का सच
रंगीन और काले
सफेद कपड़ों में
लिपटे हुऐ शब्द
हर जगह
नजर आते हैं
हर कोई उठाते
समय उन्ही
को उठाता है
भूखे नंगे गरीब
चिढ़चिढ़े शब्दों
को अच्छा भी
नहीं लगता है
खुले आम
शराफत से
अपने को एक
शरीफ दिखाने
वाले शब्द पकड़ने
वाले शब्दमार
की सोच के
जाल से पकड़ा जाना
फिर भी कभी कभी
लगने लगता है
शायद किसी दिन
दौड़ते दौड़ाते
कुछ हिम्मत
आ जायेगी
शब्द पकड़ने की
रोज की कोशिश
कुछ रंग लायेगी
और सजाये जा
सकेंगे अपने ही
चेहरे के नकाब
को उतार देने
वाले शब्द
‘उलूक’ सोचने में
क्या जाता है
नंगापन होता है
रहेगा भी
किसी से कहाँ
कुछ उसपर
कभी लिखा
भी जाता है
दौड़ भी होती
रहती है
पकड़ने वाला
पकड़ता भी
कहाँ है
बस दिखाता है
पकड़ में उसके
कुछ कभी भी
नहीं आ पाता है ।

चित्र साभार: technostories.wordpress.com

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

किसे मतलब है और होना भी क्यों है अगर एक बददिमाग का दिमाग शब्दों से हल्का हो रहा होता है

हाथी होने का
मतलब एक
बड़ी चीज होना
ही जरूरी
नहीं होता है
किसी चींटी
का नाम भी
कभी किसी ने
हाथी रखा
होता है
दुधारू गाय को
किसी की कोई
मरा हुआ हाथी
कभी कह देता है
परेशान होने की
जरूरत
नहीं होती है
अखबार में
जो होता है
उससे बड़ा सच
कहीं नहीं होता है
चिढ़ किसी
को लगती है
खुश होना चाहिये
चिढ़ाने वाले को
अजीब सी बात
लगती है जब
आग लगाने
वाला ही नाराज
हो रहा होता है
झूठ के साथ
एक भीड़ का
पता भी होता है
बस इसी सच
का पता
बेवकूफों को
नहीं होता है
भौंकते रहते हैं
भौंकने वाले
हमेशा ही
काम करने
वाला अपनी
लगन से ही
कर रहा होता है
लगे रहो लिखने
वाले अपने
हिसाब से कुछ
भी लिखने के लिये
जल्लाद का शेयर
हमेशा मौत से
ज्यादा चढ़
रहा होता है
शेरो शायरी में
दम नहीं होता है
‘उलूक’ तेरी
तू भी जानता है
तेरे सामने ही
तेरा अक्स ओढ़
कर भी सब कुछ
सरे आम
नंगा हो रहा
होता है ।
चित्र साभार: www.clipartof.com

मंगलवार, 31 मार्च 2015

कोई नई कहानी नहीं अपना वही पुराना रोना धोना ‘उलूक’ आज फिर सुना रहा था

लाऊडस्पीकर से
भाषण बाहर
शोर मचा रहा था
अंदर कहीं मंच पर
एक नंगा शब्दों को
खूबसूरत कपड़े
पहना रहा था
अपनी आदत में
शामिल कर चुके
इन्ही सारे प्रपंचों को

रोज की पूजा में
एक भीड़ का
बड़ा हिस्सा
घंटी बजाने
प्रांंगण में ही बने
एक मंदिर की ओर
आ जा रहा था
कविताऐं शेर और
गजल से ढकने में
माहिर अपने पापों को
आदमी आदमी को
इंसानियत का पाठ
सिखा रहा था
एक दिन की बात
हो तो कही जाये
कोई नई बात है 
आज पता चला
फिर से एक बार
ढोल नगाड़ों के साथ
एक नंगा हमाम
में नहा रहा था
‘उलूक’ कब तक
करेगा चुगलखोरी
अपनी बेवकूफियों
की खुद ही खुद से
नाटक चालू था कहीं
जनाजा भी तेरे जैसों
का पर्दा खोल कर
निकाला जा रहा था
तालियांं बज रही थी
वाह वाह हो रही थी
कबाब में हड्डी बन कर
कोई कुछ नहीं फोड़
सकता किसी का
उदाहरण एक पुरानी
कहावत का पेश
किया जा रहा था
नंगों का नंगा नांंच
नंगो को अच्छी तरह
समझ में आ रहा था ।

चित्र साभार: pixshark.com

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

भगवान जी भगवान जी होते हैं और नंगे नंगे होते हैं भगवान जी का नंगों से कोई रिश्ता नहीं होता है नंगा भगवान से बड़ा होता है

किसी को
कैसे बताऊं
अपना धर्म
नहीं बता
सकता

कुछ लोग
मेरे धर्म के
शुरु कर
चुके हैं
रक्त पीना
वो मुर्गा
नहीं खाते हैं
ना ही वो
बकरी खाते हैं

समझ में बस
एक बात
नहीं आती है
कि वो
कुत्ता क्यों
नही खाते हैं

वो कुत्तों से
प्यार भी नहीं
करते हैं
ना ही कुत्ते
उनको देख
अपनी पूँछ
हिलाते हैं

मुझे अपने
सर के बाल
नोचने हैं

वो व्हिस्की
के नशे में
कुछ लोगों
को आदेश
दे रहे हैं

भाई तेरी पूँछ
और मेरी पूँछ
का बाल हरा है

शुरु हो जा
नोचना गंजो
के सिर के
बालों को
सबसे अच्छा
होता है

पैसा उसका
धर्म है
किसी को नहीं
पता होता है

नंगा होना
अपराध
नहीं है
पैसा है तो
नंगा हो जा
मुनि
कहलायेगा
पैसा नहीं है
भिखारी
कहलायेगा

नियम
कानून कोर्ट
नंगो के लिये
नहीं होती है
नंगों की
जय जयकार
होती है
काश कोई
नंगा मेरा
भी बाप होता
मैं भी शायद
कहीं
आबाद होता।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

जानवर पढ़ के इस लिखे लिखाये को कपड़ा माँगने शायद चला आयेगा

नंगों के लिये
कपड़े लिख देने
से ढका कुछ भी
नहीं जायेगा
कुछ नहीं किया
जा सकता है
कुछ बेशर्मियों
के लिये जिन्हें
ढकने के लिये
पता होता है
कपड़ा ही छोटा
पड़ जायेगा
आँखों को ढकना
सीखना सिखाना
चल रहा होता है
सब जगह जहाँ
मालूम होता है
अच्छी तरह
एक छोटे से
कपड़े के टुकड़े
से भी काम
चल जायेगा
दिखता है सबको
सब कुछ
दिख गया लेकिन
किसी से नहीं
कहा जायेगा
ऐसे देखने वालों की
आँखों का देखना
देखने का चश्मा
कहाँ मिल पायेगा
दिखने को लिखना
बहुत ही आसान है
मगर यहीं पर हर कोई
गंवार और अनपढ़
बन जायेगा
लिखता रहेगा
रात भर अंधेरे को
‘उलूक’ हमेशा ही
सवेरे के आने तक
सवेरा निकलेगा
उजाले के साथ
आँखों में धूप का
चश्मा बहुत काला
मगर लगायेगा
जल्दी नहीं आयेगा
समझ में कुछ
कुछ समय खुद ही
समय के साथ
सिखायेगा
नंगेपन को
ढकना नहीं है
लिखना सीखना
है ज्यादा जरूरी
लिखते लिखते
नंगापन ही एक
फैशन भी हो जायेगा
कपड़ा सोचना
कपड़ा लिखना
कपड़े का इतिहास
बने या ना बने
बंद कुछ पढ़ने से
खुला सब पढ़ना
हमेशा ही अच्छा
कहा जायेगा ।

चित्र साभार: www.picsgag.com

बुधवार, 10 सितंबर 2014

सुबह की सोच कुछ हरी होती है शाम लौटने के बाद पर लाल ही लिखा जाता है

सैलाब में बहुत
कुछ बह गया
उसके आने की
खबर हुई भी नहीं
सुना है उसके
अखबार में ही
बस छपा था कुछ
सैलाब के आने
के बारे में मगर
अखबार उसी के
पास ही कहीं
पड़ा रह गया
कितने कितने सैलाब
कितनी मौतें
कितनी लाशें
सब कुछ खलास
कुछ दिन की खबरें
फिर उसके बाद
सब कुछ सपाट
और एक सैलाब
जो अंदर कहीं
से उठता है
कुछ बेबसी का
कुछ मजबूरी का
जो कुछ भी नहीं
बहा पाता है
अंदर से ही कहीं
शुरु होते होते
अंदर ही कहीं
गुम भी हो जाता है
जब नजर आता है
एक नंगा
शराफत के साथ
कुछ लूटता है
खुद नहीं दिखता है
कहीं पीछे से कहीं
गली से इशारे से
बिगुल फूँकता है
कुछ शरीफों के
कपड़े उतरवा कर
कुछ बेवकूफों को
कबूतर बना कर
लूट करवाता है
लूट के समय
सूट पहनता है
मंदिर के घंटे
बजवाता है
पंडित जी को
दक्षिणा दे जाता है
दक्षिणा भी उसकी
खुद की कमाई
नहीं होती है
पिछ्ली लूट से
बचाई हुई होती है
लूट बस नाम
की होती है और
बहुत छोटी छोटी
सी ही होती हैं
चर्चा में सरे आम
कहीं नहीं होती हैं
अच्छी जाति का
कुत्ता होने से जैसे
कुछ नहीं हो जाता है
घर में कितनी भी
मिले अच्छी डबलरोटी
सड़क में पड़ी हड्डी को
देख कर झपटने से
बाज नहीं आ पाता है
सैलाब की बात से
शुरु हुई थी बात
सैलाब कहीं भी
नजर नहीं आता है
गीत लिखने की
सोचना सच में
बहुत मुश्किल
काम होता है
ऐसे समय में ही
समझ में आ पाता है
नंगई को नंगई
के साथ ही चलना है
‘उलूक’ बहाता रहता
है सैलाब कहीं अंदर
ही अंदर अपने
एक नहीं हजारों
बार समझा भी
दिया जाता है
चुल्लू भर अच्छी सोच
का पानी बहना
शुरु होने से पहले ही
नंगई की आँच से
सुखा दिया जाता है ।

चित्र साभार: http://dst121.blogspot.in/

मंगलवार, 27 मई 2014

बस थोड़ी सी मुट्ठी भर स्पेस अपने लिये

बचने के लिये
इधर उधर
रोज देख लेना

और कुछ
कह देना
कुछ पर
आसान है

अचानक
सामने
टपक पड़े
खुद पर
उठे सवाल का
जवाब देना
आसान नहीं है

जरूरी भी
नहीं है
प्रश्न कहीं हो
उसका उत्तर
कहीं ना कहीं
होना ही हो

एक नहीं
ढेर सारे
अनुत्तरित प्रश्न
जिनका
सामना
नहीं किया
जाता है

नहीं झेला
जाता है
किनारे को
कर दिया
जाता है
कूड़ा कूड़ेदान
में फेंक
दिया जाता है

कूड़ेदान
के ढक्कन
को फिर
कौन उठा कर
उसमें झाँकना
दुबारा चाहता है

जितनी
जल्दी हो सके
कहीं किसी
खाली जगह
में फेंक देना
ही बेहतर विकल्प
समझा जाता है

सड़ांध से बचने
का एकमात्र तरीका
कहाँ फेंका जाये

निर्भर करता है
किस खाली जगह
का उपयोग ऐसे में
कर लिया जाये

बस यही खाली
जगह या स्पेस
ही होता है एक
बहुत मुश्किल प्रश्न

खुद के लिये
जानबूझ कर
अनदेखा
किया हुआ

पर हमेशा
नहीं होता

उधड़
ही जाती है
जिंदगी रास्ते में
कभी यूँ ही
और
खड़ा हो जाता है
यही प्रश्न बन कर

एक बहुत
बड़ी मुश्किल
बहुत बड़ी मुसीबत
कहीं कुछ
खाली जगह
अपने आप के लिये

सोच लेना
शुरु किया
नहीं की

दिखना
शुरु हो जाती हैं
कंटीली झाड़ियाँ

कूढ़े के
ढेरों पर
लटके हुऐ
बेतरतीब
कंकरीट के
जंगल जैसे
मकानों की
फोटो प्रतिलिपियों
से भरी हुई जगहें

हर तरफ
चारों ओर
मकानों से
झाँकती हुई
कई जोड़ी आँखे

नंगा करने
पर तुली हुई
जैसे खोज रही
हों सब कुछ

कुछ संतुष्टी
कुछ तृप्ति
पाने के लिये

पता नहीं
पर शायद
होती होगी
किसीके
पास कुछ
उसकी अपनी
खाली जगह
उसके ही लिये

बस बिना
सवालों के
काँटो की
तार बाड़
से घिरी
बंधन रहित

जहाँ से
बिना किसी
बहस के
उठा सके
कोई
अपने लिये
अपने ही
समय को
मुट्टी में

जी भर के
देखने के लिये
अपना प्रतिबिम्ब

पर मन को भी
नंगा कर उसके
आरपार देख कर
मजा लेने वाले
लोगों से भरी इस
दुनियाँ में नहीं है
सँभव होना

ऐसी कोई
जगह जहाँ
अतिक्रमण
ना हो

यहाँ तक
जहाँ अपनी
ही खाली
जगह को
खुद ही घेर कर
हमारी सोच
घुसी रहती है

दूसरों की खाली
जगहों के पर्दे
उतार फेंकने के
पूर जुगाड़ में
जोर शोर से ।

शनिवार, 22 मार्च 2014

शब्दों के कपड़े उतार नहीं पाने की जिम्मेदारी तेरी हो जाती है

हमाम  में आते 
और जाते रहना
बाहर आकर कुछ
और कह देना
आज से नहीं
सालों साल से
चल रहा है
कमजोर कलेजे
पर खुद का
जोर ही नहीं
चल रहा है
थोड़ी सी हिम्मत
रोज बट भी
कभी जाती है
बताने की बारी
आती है तो
गीले हो गये
पठाके की तरह
फुस्स हो जाती है
नंगा होना
हमाम
के अंदर शायद
जरूरी होता है
हर कोई होता है
शरम थोड़ी सी
भी नहीं आती है
 
कपड़े पहन कर
पानी की बौछारें
वैसे भी कुछ
कम कम ही
झेली जाती हैं
बहुत से कर्मो
के लिये शब्द
ही नहीं होते
कभी पास में
शब्द के अर्थ
होने से भी
कोई बात समझ
में आ जानी
जरूरी नहीं
हो जाती है
सभी नहाते हैं
नहाने के लिये
ही 
हमाम बनाने
की जरूरत
हो जाती है
शब्दों को नँगा
कर लेने जैसी
बात किसी से
कभी भी कहीं
भी नहीं कही
जाती है 
हमाम में
नहाने वाले से
इतनी बात जरूर
सीखी जाती है
खुद कपड़े उतार
भी ले कोई
सभी अपने
“उलूक” आ ही
जानी चाहिये
इतने सालों में
  

तेरे
  खाली

दिमाग में
बात को कपड़े
पहना कर बताने
की कला
बिना 
हमाम 
में रहे और
नहाये कभी
भी नहीं किसी
को आ पाती है । 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

मेरी संस्था मेरा घर मेरा शहर या मेरा देश कहानी एक सी

उसे लग रहा है
मेरा घर शायद
कुछ बीमार है
पता लेकिन नहीं
कर पा रहा है
कौन जिम्मेदार है
वास्तविकता कोई
जानना नहीं चाहता है
बाहर से आने वाले
मेहमान पर तोहमत
हर कोई लगाता है
बाहर से दिखता है
बहुत बीमार है
शायद किसी जादूगर
ने किया जैसे वार है
पर घाव में पडे़ कीडे़
किसी को नजर
कहाँ आते हैं
हमारे द्वारा ही तो
छुपाये जाते हैं
वो ही तो घाव के
मवाद को खाते हैं
अंदर की बात
यहाँ नहीं बताउंगा
घर का भेदी
जो कहलाउंगा
खाली कुछ सच
कह बैठा अगर
हमाम के बाहर भी
नंगा हो जाउंगा
असली जिम्मेदार
तो मैं खुद हूँ
किसी और के
बारे में क्या
कुछ कह पाउंगा
लूट मची हो जहाँ
अपने हिस्से के लिये
जरूर जोर लगाउंगा ।

गुरुवार, 15 मार्च 2012

अपना कल याद नहीं

वो कल नंगा
हो गया था
आज उसे
कुछ याद नहीं

हंस रहा है
आज सुबह से
सामने खड़े हुवे
नंगो को
देख देख कर

बिना कपड़ों के
भूखे की रोटी
छीन कर खाने
मरीज की
दवा बेच कर
उसे ऊपर पहुंचाने
में माहिर होने के
आरोपों के मेडल
छाती से चिपकाये

आज भौंक रहा है
सुबह से उन्ही
भाई भतीजों पर
जिनको आज उसने
इस लायक बना के
यहां तक आने के
लिये तैयार किया है

उससे दो
कदम आगे
पहुंचने वाले
उसके शागिर्द
काट खा रहे हैं
एक दूसरे को
खुले आम

कर रहे हैं
वो काम
जो उसने
भी किया

चुटकी में
पटक दिया
अपने सांथी को
बिना भनक लगे

सुना था
देख
भी लिया
गुरू सब
दाँव सिखाता है

एक को
छोड़ कर
अपने बचाव
के लिये।

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