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बुधवार, 4 जनवरी 2017

कविता बकवास नहीं होती है बकवास को किसलिये कविता कहलवाना चाहता है

जैसे ही
सोचो
नये
किस्म
का कुछ
नया
करने की

कहीं
ना कहीं
कुछ ना
कुछ ऐसा
 हो जाता है
जो
ध्यान
भटकाता है
और
लिखना
लिखाना
शुरु करने
से पहले ही
कबाड़ हो
जाता है

बड़ी तमन्ना
होती है
कभी एक
कविता लिख
कर कवि
हो जाने की

लेकिन
बकवास
लिखने का
कोटा कभी
पूरा ही
नहीं हो
पाता है

हर साल
नये साल में
मन बनाया
जाता है

जिन्दे कवियों
की मरी हुई
कविताओं को
और
मरे हुऐ
कवियों की
जिंदा
कविताओं
को याद
किया जाता है

कविता
लिखना
और
कवि हो
जाना
इसका
उसका
फिर फिर
याद आना
शुरु हो
जाता है

कविता
पढ़
लेने वाले
कविता
समझ
लेने वाले
कविता
खरीद
और बेच
लेने वालों
से ज्यादा
कविता पर
टिप्प्णी कर
देने वालों के
चरण
पादुकाओं
की तरफ
ध्यान चला
जाता है

रहने दे
‘उलूक’
औकात में
रहना ही
ठीक
रहता है

औकात से
बाहर जा
कर के
फायदे उठा
ले जाना
सबको नहीं
आ पाता है

लिखता
चला चल
बकवास
अपने
हिसाब की

कितनी लिखी
क्या लिखी
गिनती करने
कोई कहीं से
नहीं आता है

मत
किया कर
कोशिश
मरी हुई
बकवास से
जीवित कविता
को निकाल
कर खड़ी
करने की

खड़ी लाशों
के अम्बार में
किस लिये
कुछ और
लाशें अपनी
खुद की
पैदा की हुई
जोड़ना
चाहता है ।

चित्र साभार: profilepicturepoems.com

गुरुवार, 21 मई 2015

होती है बहुत होती है अंदर ही अंदर किसी को बहुत ही परेशानी होती है

सार्थक लेखन
की खोज में
निरर्थक भटकने
चले जाना भी
शायद बुद्धिमानी
होती है
बकवास कर
रहा होता है
बेवकूफ कोई कहीं
पीछा करते हुऐ
आदतन खोजना
अर्थ उसमें भी
फिर भी कई
सूरमाओं की
कहानी होती है
टटोलते हुऐ
बिना देखे
खाली फटे
टाट के झोले
में हाथ डालकर
हाथ में आई
हवा को बाहर
निकाल कर
देखने की आदत
बहुत पुरानी
होती है
पता होता है
खिसियाने की
जगह समझाने
की कलाकारी
उसके बाद ही
दिखानी होती है
लिख रहा होता
है बकवास
कह रहा होता
है है बकवास
अपने दिन के
हिसाब किताब
को शाम होते
डायरी में छिपाने
की बेताबी ‘उलूक’
को इसी तरह
बतानी होती है
बैचेनी का आलम
इधर हो ना हो
पता चल जाता है
किसी के लिखने
की आदत से
उस पर ऊपर से
अपना दर्द
होती है
अंदर ही अंदर
किसी को
बहुत ही
परेशानी होती है ।

 चित्र साभार: etc.usf.edu

बुधवार, 17 सितंबर 2014

सात सौ सतत्तरवीं बकवास नहीं कही जा सकती है बिना कुछ भी देखे सुने अपने आसपास

आप बीती
कह लीजिये
या जग बीती
जब देखी सुनी
महसूस की
जाती हैं तभी
कही और लिखी
भी जाती है
कहानियाँ
राजा रानी
राजकुमारी की
कह लीजिये
या परियों की
ऐसे वैसे भी
बुनी जाती हैं
सबको ही
दिखाई देता है
कुछ ना कुछ
अपने आस पास
देखने वाले की
नजर पर होता है
होने ना होने
में से कौन सी
चीज उसको
उसके काम की
नजर आती है
सभी पढ़ते हैं
एक ही किताब
से एक ही नज्म
हर किसी के
लिये नहीं होता
बन जाना
उसका एक गीत
किसी किसी को
दूर दूर तक
वही एक काली
भैंस की सींग
नजर आती है
‘उलूक’ सभी
एक मत से
कह रहे होते हैं
जहाँ कुछ नहीं है
तेरी फितरत का
क्या किया जाये
समझ में
नहीं आता है
तुझे वहाँ पर भी
कुछ लिख लिखा
देने के लिये
एक तस्वीर
नजर आती है
हर कोई बजा
रहा है तालियाँ
हवा में उनके
हवा महल की
हवा में हो रही
हवा बाजी पर
कह क्यों नहीं
पाता उन सब की
हवा की तारीफ
करने में तेरी
खुद की हवा
निकल जाती है ।

चित्र साभार: http://blogs.msdn.com/

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

इस देश में जो शरमाता है वही बेशरम कहलायेगा

पता था ईमानदार
बनकर सरकार
नहीं चला पायेगा
भ्रष्टाचार से चलते
हों जहाँ घर तक
उस देश में कैसे
तुझे ज्यादा दिन
तक मौज मनाने
का आसान मौका
दे दिया जायेगा
अच्छा किया जो
इस्तीफा दे दिया
अब सारे ईमानदारी
के ठेकेदारों के
नाम से दुबारा
टेंडर खुलवाया जायेगा
आम आदमी की टोपी
और आम आदमी का
गाना गा कर आंखिर
कितनी दूर तक
कोई चल पायेगा
बहुत अच्छा किया
जो भी किया
चल सड़क पर आजा
फिर से कुछ नये
क्राँतिकारी गीत सुनायेगा
मीडिया फिर से
टी आर पी के जुगाड़
के लिये तेरी कुछ
नई कहाँनियाँ कुछ
नये नाटक बनायेगा
इस देश में बस
वही टिक पायेगा
जो मुँह में राम
बगल में छुरी दबायेगा
हर मौहल्ले में
जिस देश की
होती है पुराने
चोरों की बहुत
सी गलियाँ
वहाँ किसी भी
नये प्रयोग करने
वाले को इसी तरह
लात मार मार कर
भगा दिया जायेगा
उसके बाद भगाने
वालों का जत्था ही
लगा कर राम और
रहीम के मुखौटे
बेवकूफ जनता को
ईमानदारी से वोट
देने के लिये उकसायेगा
अच्छा किया तूने
बहुत अच्छा किया
पर क्या तू फिर से
गधे की सवारी करने
के लिये दुबारा
गधों के दरबार में
कभी और किसी
दिन हाजिरी लगायेगा
हो सकता है
कुछ तरस खा कर
अगली बार गधा
तुझे हल्की दुलत्ती
लगा कर ही
खुश हो जायेगा
कर फिर कुछ कर
हमारे पास भी
कोई काम
धाम नहीं है
फिर से कुछ
बकवास करने
का एक मौका
हमारे हाथ में
तब भी आ जायेगा ।

शनिवार, 30 नवंबर 2013

और ये हो गयी पाँच सौंवी बकवास

इससे पहले
उबलते
उबलते
कुछ
छलक
कर गिरे

और

बिखर जाये
जमीन पर
तिनका
तिनका

छींटे पड़े
कहीं सफेद
दीवार पर

और कुछ

काले पीले
धब्बे बनायें

लिख
लिया कर
मेरी तरह
रोज का रोज
कुछ ना कुछ
कहीं ना कहीं
किसी रद्दी
कागज के
टुकड़े पर
ही सही

कागज
में लिखा
बहुत
आसान
होता है
छिपा लेना
मिटा लेना
आसान
होता है
जला लेना

राख हवा
के साथ
उड़ जाती है
बारिश
के साथ
बह जाती है

बहुत कुछ
हल्का हो
जाता है

बहुत से
लोग
कुछ भी
नहीं कहते
ना ही उनका
लिखा हुआ
कहीं नजर
में आता है

और
एक तू है
जब भी
भीड़ के
सामने
जाता है

बहुत कुछ
लिखा हुआ
तेरे चेहरे
माथे और
आँखों में
साफ नजर
आ जाता है

तुझे पता
भी नहीं
चलता है
हर कोई
तुझे कब
और
किस समय
पढ़ ले
जाता है

मत
हुआ कर
सरे आम
नंगा
इस तरह से

जब कागज
में सब कुछ
लिख लिखा
कर आसानी
से बचा जाता है

कब से
लिख रहा
है “उलूक”
देखता
नहीं क्या
एक था
पन्ना कभी
जो आज
लिखते
लिखते
हजार का
आधा हो
जाता है ।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

लो मित्र तुम्हारे प्रश्न का उत्तर हम यूं लेकर आते हैं

सुनो मित्र
तुम्हारे सुबह
किये गये
प्रश्न का उत्तर
देने जा रहा हूँ
पूछ रहे थे तुम
कौन सी कहानी
ले कर आज शाम
को आ रहा हूँ
कहानी और कविता
लेखक और कवि
लिखा करते
हैं जनाब
मैं तो बस
रोज की तरह
वही कुछ
बताने जा रहा हूँ
जो देख सुन
कर आ रहा हूँ
कहानियां
बनाने वाले
कहानियां
रोज ही बनाते हैं
उनका काम
ही होता है
कहानियां बनाना
वो कहानियां बना
कर इधर उधर
फैलाते हैं
कुछ फालतू लोग
जो उन कहांनियों को
समझ नहीं पाते हैं
उठा के यहां
ले आते हैं
कहानियां
बनाने वाले को
चलानी होती है
कोई ना कोई कार या
सरकार कहीं ना कहीं
उनके पास होते हैं
अपने काम को छोड़
कर काम कई
वो काम करते हैं
बकवास करने से
हमेशा कतराते हैं
सारे के सारे कर्मयोगी
इसीलिये हमेशा
एक साथ
एक जगह
पर नजर आते हैं
कहांनिया बनाने
वाले जन्म देत हैं
एक ही नहीं
कई कहानियों को
त्याग देखिये उनका
कभी किसी
कहानी को
खुद पढ़ने के लिये
कहीं नहीं जाते हैं
काम के ना काज के
दुश्मन अनाज के
कुछ लोग कहांनियां
बताने वाले
बन जाते हैं
पूरा देश ही
चल रहा है
कहानी बनाने
वालों से
आप और हम
तो बस
एक कहानी को
पीटने के लिये
रोज यहां
चले आते हैं ।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

आदत अगर हो खराब तो हो ही जाती है बकवास

मैने तो सोचा था
आज तू नहीं आयेगा
थक गया होगा
आराम करने को
कहीं दूर चला जायेगा
चार सौ पन्ने
भर तो चुका है
अपनी बकवासों से
कुछ रह नहीं गया
होगा बकाया तेरे पास
शायद तुझसे अब कुछ
नया नहीं कहा जायेगा
ऎसा कहाँ हो पाता है
जब कोई कुछ भी
कभी भी कहीं भी
लिखना शुरु जाता है
कहीं ना कहीं से
कुछ ना कुछ
खोद के लिखने के
लिये ले आता है
अब इतना बड़ा देश है
तरह तरह की भाषाऎं
हैं और हैं बोलियाँ
हर गली मोहल्ले के
अपने तीज त्योहार
हर गाँव हर शहर की
अपनी अपनी होती हैं
रंगबिरंगी टोलियाँ
कोई देश की बात को
बडे़ अखबार तक
पहुँचा ले जाता है
सारे अखबारों का
मुख्य पृष्ठ उस दिन
उसी खबर से
पट जाता है
पता कहाँ कोई
कर पाता है कि
खबर वाकई में
कोई एक सही ले
कर यहाँ आता है
सुना जाता है
इधर के सबसे
बडे़ नेता को कोई
बंदर कह जाता है
बंदर की टीम का
कोई एक सिकंदर
खुंदक में किसी
को फंसाने के लिये
सुंदर सा प्लाट
बना ले जाता है
उधर का बड़ा नेता
बंदर बंदर सुन कर
डमरू बजाना
शुरु हो जाता है
साक्षात शिव का 
रुप हो जाता है
तांडव करना
शुरु हो जाता है
अब ये तो बडे़
मंच की बड़ी बड़ी
रामलीलाऎं होती है
हम जैसे कूप मंडूकों
से इस लेवल तक
कहाँ पहुँचा जाता है
हमारी नजर तो
बडे़ लोगों के
छोटे छोटे चाहने
वालों तक ही
पहुंच पाती है
उनकी हरकतों को
देख कर ही हमारी
इच्छाऎं सब हरी
हो जाती हैं
किसी का लंगोट
किसी की टोपी के
धूप में सूखते सूखते
हो गये दर्शन की सोच
ही हमें मोक्ष दिलाने
के लिये काफी
हो जाती हैं
सबको पता है
ये छोटी छोटी
नालियाँ ही मिलकर
एक बड़ा नाला
और बडे़ बडे़
नाले मिलकर ही
देश को डुबोने
के लिये गड्ढा
तैय्यार करवाती हैं
कीचड़ भरे इन्ही
गड्ढों के ऊपर
फहरा रहे झकाझक
झंडों पर ही लेकिन
सबकी नजर जाकर
टिक जाती है
सपने बडे़ हो जाते हैं
कुछ सो जाते हैं
कुछ खो जाते हैं
झंडे इधर से
उधर हो जाते हैं
नालियाँ उसी जगह
बहती रह जाती हैं
उसमें सोये हुऎ
मच्छर मक्खी
फिर से भिनभिनाना
शुरु हो जाते हैं
ऎसे में जो
सो नहीं पाते
जो खो नहीं जाते
वो भी क्या करें
अपनी अपनी
बकवासों को लेकर
लिखना पढ़ना
शुरु हो जाते हैं ।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

उ0 प्र0 2012

आधी बकवास 'उलूक' की आज के 'अमर उजाला' के पेज 9 पर छपी है बाकी बची खुची कहो पूरी कहो यहाँ नीचे पड़ी है।

बड़ी
मुश्किल से
हाथी काबू
में आया है
अगले पाँच
साल के लिये
बांध कर के
सुलाया है

महावत ही
खा रहा था
हाथी का खाना
बच ही नहीं
पा रहा था
कुछ उसके
अपने ही
परिवार के
लिये दाना

महावत
आज बहुत
खुश नजर
आ रहा था

अपनी
छकड़ा
साईकिल
निकाल कर
बहुत इतरा
रहा था

अगले
पाँच साल
वो साइकिल
में जाया करेगा

हाथी बेचारा
बैठे बैठे सूँड
हिलाया करेगा

मेरा कुछ
हो पायेगा
मुझे कुछ भी
नहीं मालूम
टूटे हाथ में
कमल मेरे
पहले की तरह
मुर्झाया करेगा

चार हजार
करोड़ के साथ
थोड़ा और कुछ
ही खा पाया था
हाथी सुना है

बचा हुवा
साईकिल की
रिपेयर में
काम आया करेगा

श्रीमती मेरी
दूध सब्जी गैस
के दामों पर
अभी भी चिल्लायेगी

क्या पता दीदी
की जगह भतीजे
को देख अब
वो मुस्कुरायेगी

आओ दुवा करो
मेरे साथ आप भी
मिलकर वोटरो

साईकिल बिना
रिपेयर के
पाँच साल
चल ही जायेगी
पैट्रोल के बिल
दिखा कर
एन आर एच एम
की कहानी
कम से कम फिर से
नहीं दोहरायेगी

कुछ बेकसूर
लोगो को
यूँ ही मौत
की नीद
असमय ही
ना सुलायेगी

अमन चैन
ना भी ला सकी
उसके सपने
तो दे ही जायेगी।

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