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शनिवार, 18 मार्च 2017

निगल और निकल यही रास्ता सबसे आसान नजर आता है

कभी कभी
सब कुछ
शून्य हो
जाता है
सामने से
खड़ा नजर
आता है


कुछ किया
नहीं जाता है
कुछ समझ
नहीं आता है


कुछ देर
के लिये
समय सो
जाता है


घड़ी की
सूंइयाँ
चल रही
होती है
दीवार पर
सामने की
हमेशा की तरह

जब कभी
डरा जाता है
उस डर से

जो हुआ ही
नहीं होता है
बस आभास
दे जाता है
कुछ देर
के लिये

ऐसे
समय में
बहुत कुछ
समझा
जाता है

समय
समझाता है
समझाता
चला जाता है
समय के साथ
सभी को

कौन याद
रख पाता है
कहाँ याद
रहती हैं
ठोकरें
किसी को
बहुत लम्बे
समय तक

हर किसी
की आदत
नहीं होती है

हर कोई
सड़क पर
पड़े पत्थर को
उठा कर
किनारे
कहाँ
लगाता है

कृष्ण भी
याद ऐसे ही
समय में
आता है

ऐसे ही समय
याद आती है
किताबें

किताबों में
लिखी इबारतें

नहीं समझी
गई कहावतें

जो हो रहा
होता है
सामने सामने
सत्य बस
वही होता है

पचता
नहीं भी है
फिर भी
निगलना
जरूरी
हो जाता है

‘उलूक’
चूहों की दौड़
देखते देखते
कब चूहा हो
लिया जाता है

उसी समय
पता समझ
में आता है

जब टूटती है
नींद अचानक

दौड़
खत्म होने
के शोर से

और कोई
खुद को
अपनी ही
डाल पर

चमगादड़ बना
उल्टा लटका
हुआ पाता है ।

चित्र साभार: www.gitadaily.com

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

रास्ते का खोना या खोना किसी का रास्ते में

किसी जमाने में
रोज आते थे
और बहुत आते थे
अब नहीं आते
और जरा सा
भी नहीं आते
रास्ते इस शहर के
कुछ बोलते नहीं
जो बोलते हैं कुछ
वो कुछ बताते ही नहीं
उस जमाने में
किस लिये आये
किसी ने
पूछा ही नहीं
इस जमाने में
कैसे पूछे कोई
वो अब
मिलता ही नहीं
रास्ते वही
भीड़ वही
शोर वही
आने जाने वालों में
कोई नया दिख रहा हो
ऐसा जैसा भी नहीं
सब आ जा रहे हैं
उसी तरह से
उन्हीं रास्तों पर
बस एक उसके
रास्ते का किसी को
कुछ पता ही नहीं
क्या खोया वो
या उसका रास्ता
किससे पूछे
कहाँ जा कर कोई
भरोसा उठ गया
‘उलूक’ जमाने का
उससे भी और
उसके रास्तों से भी
पहली बार
सुना जब से
रास्ते को ही
साथ लेकर अपने
कहीं खो गया कोई ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

रास्ता

मेरा रास्ता तो
रास्ते में ही
खो जाता है
लगता है
सही रास्ता
खुद ही
भटक जाता है
लोगों का
रास्ता शायद
मंजिल तक
जाता है
जब भी मैं कहीं
को जाता हूँ
अपने रास्ते
में किसी को
कभी भी
नहीं पाता हूँ
लोग तो
जा रहे होते हैं
समूह भी
बना रहे होते हैं
वर्षों से लोगों
ने रास्ते बनाये हैं
बना के कई रास्ते
रास्ते में छोड़
भी आये हैं
उन रास्तों ने
किसी को
नहीं भटकाया है
हो सका है
तो भटके हुवे
को ही रास्ता
दिखाया है
आज भी लोग
नये रास्ते बनाते
चले जा रहे हैं
आगे को जा रहे हैं
पीछे के
रास्ते को रास्ते
से हटाते जा रहे हैं
वो जानते हैं जहां
वो रास्ता
उन्हें पहुंचायेगा
पीछे वाला भी
कभी ना कभी वहां
पहुंच ही जायेगा
रास्ते का भेद
रास्ते में ही
खुल जायेगा।

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