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मंगलवार, 10 जनवरी 2017

विश्व हिन्दी दिवस और शब्द क्रमंचय संचय प्रयोग सब करते हैं समझते एक दो हैं

क्रमंचय
संचय
कितने
लोग
जानते हैं
कितने
समझ
ले
जाते हैं


क्रमंचय
संचय
उच्च
गणित
में प्रयोग
किया
जाता है

गणित
विषय
पढ़ने
और
समझने
वाला भी
दिमाग में
जोर
लगाता है
जब
क्रमंचय
संचय के
सवालों को
हल करने
पर आता है

किताबों
को छोड़
दिया जाये
अपने
आसपास
के लोग
और
समाज को
देखा जाये

नहीं सुने
होते हैं
ना ही
पढ़े होते हैं
क्रमंचय
संचय
पर
कलाकारी
देखिये
आँखें बड़ी
कर ले
जाते हैं
काणे भी
देखना
शुरु हो
जाते हैं

सवाल हल
करने की
जरूरत ही
नहीं पड़ती है
जवाब हाथ में
लेकर खड़े
हो जाते हैं

काम
निकलवाना
ज्यादा
महत्वपूर्ण
होता है
सबको पता
होता है

निकालने
के तरीके
के लिये
सोचने
के लिये
कहाँ तक
जाना है
कौन कब
सोच पाते हैं
जात पात
अमीर गरीब
ऊँच नीच
मिलाकर
जो लोग
घोल बना कर
लोगों को
पिलाना शुरु
हो जाते हैं

नशा होता है
गजब का
होता है
पीने वाले
अपना पराया
भूल जाते हैं

चल पड़ते हैं
लामबन्द
होकर
किसी भी
सियार के लिये

शेर बना कर
उसे जंगल से
बाहर छोड़
कर भी आते हैं

क्रमंचय संचय
नहीं पढ़ते हैं
क्रमंचय संचय
नहीं समझते हैं

काम करते हैं
अवसरवादियों
 के लिये

क्रमंचय संचय
के एक सवाल
का असल हल
पेश करते हैं

अवसर वाद
सारे वादों के
ऊपर का
 वाद होता है
‘उलूक’

तेरे जैसे
कई होते हैं
अवसर
मिलता है
और
दूसरों को
देख हमेशा
आँख मलते हैं

क्रमंचय
संचय
करते हैं
देखते हैं
सारी दुनियाँ
को प्रयोग
करते हुए
क्रमंचय
संचय
वो लोग जो
कभी भी
गणित नहीं
पढ़ते हैं ।

चित्र साभार: Pinterest
 

बुधवार, 14 सितंबर 2016

शब्द दिन और शब्द अच्छे जब एक साथ प्रयोग किये जा रहे होते हैं

कुछ शब्द
कभी भी
खराब गन्दे
अजीब से
या
गालियाँ
नहीं होते हैं

पढ़े लिखे
विद्वतजन
अनपढ़
अज्ञानी
सभी समझते
है अर्थ उनके
करते हैं प्रयोग
बनाते हैं वाक्य

पर्दे में नहीं
रखे जाते हैं
इतने बेशर्म
भी
नहीं होते हैं

ना सफेद
ना काली
ना हरी
ना लाल
मिर्च ही
होते हैं

एक ही दिन के
एक प्रहर में ही
एक ही नहीं
कई कई बार
प्रयोग होते हैं

ज्यादातर
कोई ध्यान
नहीं
देता है

कहते
कहते
बात में
बेबात में
ऐसे वैसे
या कैसे
किससे
क्यों और
किसलिये
कहे गये
होते हैं

कभी शब्दों
के आगे के
कभी शब्दों
के पीछे के
शब्द होते हैं

एक वचन होंं
स्त्रीलिंग होंं
बहुत ज्यादा
नरम होते हैं
बहुवचन और
पुल्लिंग होते
ही लगता है
जैसे कभी
अचानक ही
बहुत गरम
हो रहे
होते हैं

दिन अच्छा कहो
अच्छा दिन कहो
पत्ते हरे हों
या सूखे कहो
कहीं के भी
कभी भी
हिलते हुऐ
जरा सा भी
महसूस
नहीं होते हैं

‘उलूक’
बेवकूफ के
भेजे में भरे
गोबर में उठते
भवरों से
कुछ अजीब
से प्रश्न जरूर
उसे उठते हुऐ
दिख रहे होते हैं
जब शब्द
दिन के पीछे
शब्द अच्छे
और शब्द
अच्छे के आगे
शब्द दिन
किसी भी
संदर्भ में
कहे गये
करा रहे
होते हैं
आभास
कहीं कुछ
जलने का
और
सामने सामने
के ही कुछ
कुछ लाल
और
कुछ पीले
हो रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.indif.com

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

कपड़े शब्दों के कभी हुऐ ही नहीं उतारने की कोशिश करने से कुछ नहीं होता

फलसफा
जिंदगी का
सीखने की
जरा सी भी
कोशिश कभी
थोड़ी सी भी
किया होता
आधी सदी
बीत गई
तुझे आये
हुऐ यहाँ
इस जमीन
इस जगह पर
कभी किसी दिन
एक दिन के
लिये ही सही
एक अदद आदमी
कुछ देर के
लिये ही सही
हो तो गया होता
जानवर ही जानवर
लिखने लिखाने में
कूद कर नहीं आते
तेरे इस तरह हमेशा
आदमी लिखने का
इतना तो हौसला
हो ही गया होता
सपेरे नचा रहे हैं
अपने अपने साँप
अपने अपने हिसाब से
साँप नहीं भी हो पाता
नाचना तो थोड़ा बहुत
सीख ही लिया होता
कपड़े उतारने से बहुत
आसान होने
लगी है जिंदगी
दिखता है हर तरफ
धुँधला नहीं
बहुत ही साफ
साफ कुँआरे
शीशे की तरह
बहुत सारे
नंगों के बीच में
खड़ा कपड़े
पहने हुऐ
इस तरह शरमा
तो नहीं रहा होता
क्या क्या कहेगा
कितना कहेगा
कब तक कहेगा
किस से कहेगा
‘उलूक’
हर कोई कह
रहा है अपनी
कौन सुन रहा
है किसकी
फैसला जिसकी
भी अदालत में होता
तेरे सोचने के जैसा
कभी भी नहीं होता
रोज उखाड़ा कर
रोज बो लिया कर
कुछ शब्द यहाँ पर
शब्दों के होते
हुए कबाड़ से
खाली दिमाग के
शब्दों को इतना
नंगा कर के भी
हर समय खरोचने
की आदत से कहीं
भी कुछ नहीं होता।
चित्र साभार: www.shutterstock.com

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

क्या कुछ कौन से शब्द चाहिये कुछ या बहुत कुछ व्यक्त करने के लिये कोई है जो चल रहा हो साथ में लेकर शब्दकोष शब्दों को गिनने के लिये

कुछ लिखने
का
दिल किया
कई दिनों
के बाद
कुछ कुछ
होना शुरु
होते होते
कुछ नया
कुछ अलग
लिखने की
सोच कर

पुराने सारे
लिखे लिखाये
को
कुछ देखना
शुरु किया
मतलब
शुरू से
शुरु किया

कुछ गिनना
कुछ जोड़ना
कुछ घटाना
जब
सारे लिखे
लिखाये पर
आरंभ से
अंत तक
सही में

सही सही
कहा जाये तो
शुरु किये गये
कुछ से
आज और
अभी तक
लिखे गये
कुछ कुछ तक

कितना खोजा
बहुत टटोला
बस मिला
बार बार
कई बार
किया गया
शब्द
जो प्रयोग
उनमें
बहुत कुछ
के प्रयोग से
बहुत कुछ
लिखा लिखाया
नहीं मिला

बस मिला
लिखा हुआ
अधिकतर में
ज्यादातर
कहीं कुछ
अखबार
कुछ आदमी
कुछ कुत्ता
कुछ खबर
कहीं कुछ गधा
कुछ गाँधी
कुछ चोर
कुछ उलूक
कुछ देश
कुछ बंदर
कहीं कहीं
कुछ बात
कुछ हवा
कुछ सोच
और
कहीं
थोड़े से
थोड़े
कुछ लोग

समझते
समझते
बस इतना
ही समझ
में आया

शब्दकोश
कितना बड़ा
समेटे हुऐ
खुद अपने में
कितने कितने
समझे बूझे हुऐ
अनगिनत शब्द
पर
कहने के लिये
अपनी
इसकी उसकी
आसपास की
व्यथा कथा
चाहिये
बहुत थोड़े
कुछ कुछ
छोटे छोटे
बेकार के
रोज रोज के
साग सब्जी
रोटी दाल
कपड़े बरतन
जैसे
शब्दों के
बीच में
गिरते लुड़कते
शब्दों को
जोड़ते तोड़ते
मरोड़ते शब्द

कोशिश में
समझाने की
बताने की
कुछ व्यक्त
कुछ अव्यक्त
व्यर्थ में
असमर्थ
समर्थ शब्द ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 3 अगस्त 2015

कुछ शब्द शब्दों में शरीफ कुछ चेहरे चेहरों में शरीफ

कुछ शरीफ चेहरे
शरीफ से कुछ
शब्द ओढ़े हुऐ
लिये हुऐ सारे
के सारे शरीफ
शब्दों को अपने
शरीफ हाथों में
करते हुऐ कुछ
शरीफ शब्दों को
इधर से कुछ उधर
पहुँचाने में लगे हों
जैसे इस शरीफ
हथेली से उस
शरीफ हथेली तक
बहुत ही शराफत से
रहते हुऐ शरीफों के साथ
शरीफ शब्दों को धोते
बहुत सफाई के साथ
दिखाई देते शरीफों के
खेतों में शराफत से बोते
कुछ बीज शरीफ
से छाँट कर
होता तो ऐसे
में कुछ नहीं
कह ही दी जाये
इतनी जरूरी
बात भी नहीं
कुछ कमजोरी कहें
कुछ मजबूरी कहें
कुछ श्रद्धा कहें
कुछ सबूरी कहें
कुछ शरीफों
के मेलों की
कुछ शरीफों के
शरीफ झमेलों की
शरीफ ओढ़े कुछ शरीफ
शरीफ मोड़े कुछ शरीफ
शरीफ तोड़े कुछ शरीफ
कुछ शब्द शब्दों में शरीफ
कुछ चेहरे चेहरों में शरीफ ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

रविवार, 12 जुलाई 2015

थोड़े बहुत शब्द होने पर भी अच्छा लिखा जाता है

अब कैसे
समझाया जाये
एक थोड़ा सा
कम पढ़ा लिखा
जब लिखना ही
शुरु हो जाये
अच्छा है
युद्ध का मैदान
नहीं है वर्ना
हथियारों की
कमी हो जाये
मरने जीने की
बात भी यहाँ
नहीं होती है
छीलने काटने
को घास भी
नहीं होती है
लेकिन दिखता है
समझ में आता है
अपने अपने
हथियार हर
कोई चलाता है
घाव नहीं दिखता
है कहीं किसी
के लगा हुआ
लाल रंग का
खून भी निकल
कर नहीं
आता है
पर कोशिश
करना कोई
नहीं छोड़ता है
घड़ा फोड़ने
के लिये कुर्सी
दौड़ में जैसे
एक भागीदार
आँख में पट्टी
बाँध कर
दौड़ता है
निकल नहीं
पाता है
खोल से अपने
उतार नहीं
पाता है
ढोंग के कपड़े
कितना ही
छिपाता है
पढ़ा लिखा
अपने शब्दों
के भंडार के
साथ पीछे
रह जाता है
कम पढ़ा लिखा
थोड़े शब्दों में
समझा जाता है
जो वास्तविक
जीवन में
जैसा होता है
लिखने लिखाने
से भी कुछ
नहीं होता है
जैसा वहाँ होता है
वैसा ही यहाँ आ
कर भी रह जाता है
‘उलूक’ ठीक है
चलाता चल
कौन देख रहा है
कोई अपनी नाव
रेत में रखे रखे ही
चप्पू चलाता है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 4 जुलाई 2015

पीछे का पीछे ही ठीक है आगे देखने वाले ही आगे जाते हैं

लौट कर
देखने की चाह
अपने ही बनाये
हुऐ शब्दों के
रास्ते पर
बस एक चाह
ही रह जाती है
लौटा जाता नहीं है
पीछे से शब्दों की
एक बहुत ही लम्बी
सी कतार रह जाती है
मुड़ कर देखना भी
आसान नहीं होता है
गरदन अपनी नहीं
अपने ही लिखे
शब्दों की टेढ़ी
होती सी
नजर आती है
चलना शुरु करती
है जिंदगी भी
अपने खुद के
ही पैरों पर
हमेशा ही आगे
की ओर ही
पीछे देखने की
सोचने सोचने तक
पूरी हो जाती है
बहुत कुछ चलता है
साथ में शब्दों के
बनते बिगड़ते
रास्तों में
अपने बहुत कम
ही रह पाते है
अपने जैसों को
छाँटते हुऐ
साथ बदलते
बदलते शब्द भी
रास्ते बदलते
चले जाते हैं
कैसे लौटे कोई
देखने के लिये
अपने ही ढूँढे हुऐ
शब्दों के पिटारों में
दीमक जिंदगी के
किसने देखें हैं
क्या पता शब्दों को
चाटते हुऐ ही
साथ में चलते
चले जाते हैं
मिटता हुआ
चलता है समय भी
दिखता कुछ
भी नहीं है
हम भी तुम भी
और सभी
धुंधले होते ही
चले जाते हैं
आगे के शब्दों पर
नजर रहना ही
ठीक लगता है
पीछे लिखे हुऐ
महसूस कराते हैं
जैसे कुछ खींचते हैं
कुछ खींच कर गिराते हैं ।

चित्र साभार: imageenvision.com

बुधवार, 1 जुलाई 2015

किसको क्या लगता है लगता होगा लगता रहे सोचने से अच्छा है कर लेना

अच्छा होता है
कुछ लिख लिखा
कर बंद कर देना
किताब के
पन्नों को
हो सके तो
चिपका देना
या सिल लेना
सुई तागे से
चारों तरफ से
ताकि खुलें
नहीं पन्ने
शब्दों को हवा
पानी लगना
अच्छा नहीं होता
बरसात में वैसे भी
नमी ज्यादा
होने से सील
जाती हैं चीजें
खत्म हो जाता
है शब्दों का
कुरकुरापन
गीले भीगे हुऐ
शब्द गीले
कागजों से
चिपके हुऐ
आकर्षित नहीं
करते किसी को
क्या देखने
क्या समझने
किसी के लिखे
हुऐ शब्द
शब्द तो
शब्द होते हैं
शब्दकोष में
बहुत होते हैं
इसके शब्द इसके
उसके शब्द उसके
करता रहे कोई
अपने हिसाब से
आगे पीछे
बनाता रहे
आँगन मकान
चिड़िया तूफान
दूसरों के शब्दों
से बनी इमारत
देख कर रहना
वैसे भी सीखा
नहीं जाता
अपने अपने मकान
खुद ही बनाना
खुद उसमें रहना
खुद सजाना
सँवारना अच्छा है
सबकी अपनी
किताब अपने ही
गोंद से चिपकी हुई
अपने पास ही
रहनी चाहिये
खुले पन्ने हवा में
फड़फड़ाते आवाज
करते हुऐ अच्छे
नहीं समझे जाते हैं
ऐसा पढ़ाया तो
नहीं गया है यहाँ
इस जगह पर
पर ऐसा ही जैसा
कुछ महसूस होता है
सही है या गलत
पता नहीं है अभी
पहली बार ही कहा है
किसी और को भी
ऐसा लगता है
चिपकी किताबों के
चिपके पन्नों को
गिनता भी तो
कोई नहीं है यहाँ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

सोमवार, 18 मई 2015

सच होता है जिंदा रहने के लिये ही उसे रहने दिया जाता है

एक आदमी
पकड़ता है
दौड़ते हुऐ
शब्दों में से
कुछ शब्द
जानबूझ कर
छोड़ते हुऐ
नंगे शब्दों को
जिनमें छुपा
होता है उसके
खुद का सच
रंगीन और काले
सफेद कपड़ों में
लिपटे हुऐ शब्द
हर जगह
नजर आते हैं
हर कोई उठाते
समय उन्ही
को उठाता है
भूखे नंगे गरीब
चिढ़चिढ़े शब्दों
को अच्छा भी
नहीं लगता है
खुले आम
शराफत से
अपने को एक
शरीफ दिखाने
वाले शब्द पकड़ने
वाले शब्दमार
की सोच के
जाल से पकड़ा जाना
फिर भी कभी कभी
लगने लगता है
शायद किसी दिन
दौड़ते दौड़ाते
कुछ हिम्मत
आ जायेगी
शब्द पकड़ने की
रोज की कोशिश
कुछ रंग लायेगी
और सजाये जा
सकेंगे अपने ही
चेहरे के नकाब
को उतार देने
वाले शब्द
‘उलूक’ सोचने में
क्या जाता है
नंगापन होता है
रहेगा भी
किसी से कहाँ
कुछ उसपर
कभी लिखा
भी जाता है
दौड़ भी होती
रहती है
पकड़ने वाला
पकड़ता भी
कहाँ है
बस दिखाता है
पकड़ में उसके
कुछ कभी भी
नहीं आ पाता है ।

चित्र साभार: technostories.wordpress.com

शुक्रवार, 8 मई 2015

एक सीधे साधे को किनारे से ही कहीं को निकल लेना होता है

धुरी से खिसकना
एक घूमते
हुऐ लट्टू का
नजर आता है
बहुत साफ
उसके लड़खड़ाना
शुरु करते ही
घूमते घूमते
एक पन्ने पर
लिखी एक इबारत
लट्टू नहीं होती है
ना ही बता सकती है
खिसकना किसी का
उसका अपनी धुरी से
दिशा देने के लिये
किसी को दिशा हीन
होना बहुत
जरूरी होता है
बिना खोये खुद को
कैसे ढूँढ लेना है
बहुत अच्छी तरह से
तभी पता होता है
शब्द अपने आप में
भटके हुऐ नहीं होते हैं
भटकते भटकते ही
इस बात को
समझना होता है
भटक जाता है
मुसाफिर सीधे
रास्ते में
एक दिशा में ही
चलते रहने वाला
सबसे अच्छा
भटकने के लिये
खुद को भटकाने
वालों के भटकाने
के लिये छोड़
देना होता है
लिखा हुआ किसी
का कहीं कोई
लट्टू नहीं होता है
घूमता हुआ भी
लगता है तो भी
उसकी धुरी को
बिल्कुल भी नहीं
देखना होता है
सीधे सीधे एक
सीधी बात को
सीधे रास्ते से
किसी को समझाने
के दिन लद
गये है ‘उलूक’
भटकाने वाली
गहरी तेज बहाव
की बातों की लहरों
को दिखाने वाले
को ही आज के
जमाने को दिशायें
दिखाने के लिये
कहना होता है ।

चित्र साभार: forbarewalls.com

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

कुछ भी यूँ ही

शब्द बीजों
से उपजी
शब्दों की
लहलहाती
फसल हो या
सूखे शब्दों से
सूख चुके
खेत में पढ़े हुऐ
कुछ सूखे शब्द
बस देखते रहिये
काटने की जरूरत
ना होती है
ना ही कोशिश
करनी चाहिये
काटने की
दोनों ही
स्थितियों में
हाथ में कुछ
नहीं आता है
खुशी हो या दुख:
शब्द बोना बहुत
आसान होता है
खाद पानी हवा
के बारे में नहीं
सोचना होता है
अंकुर फूटने का
भी किसी को
इंतजार नहीं
होता है ना ही
जरूरत होती है
सोच लेने में
कोई हर्ज नहीं है
रात के देखे
सुबह होने तक
याद से उतर जाते
सपनों की तरह
पौंधे उगते ही हैं
सभी नहीं तो कुछ
कुछ उगने
भी चाहिये
अगर बीज
बीज होते हैं
अंकुरित होते
जैसे तो हमेशा
ही महसूस
किये जाते हैं
 पर
अंकुरण होने
से लेकर
पनपने तक
के सफर में
खोते भी हैं और
सही एक रास्ते पर
होते होते मंजिल तक
पहुँच भी जाते हैं
कुछ भी हो
खेत बंजर होने से
अच्छा है बीज हों भी
और पड़े भी रहें
जमीन की ऊपरी
सतह पर ही सही
दिखते भी रहे
उगें नहीं भी
चाहे किसी को
भूख ना भी लगे
और भरे पेट कोई
देखना भी ना चाहे
ना खेतों की ओर
या बीजों को
कहीं भी
खेत में या
कहीं किसी
बीज की
दुकान पर
धूल पड़े कुछ
थैलों के अंदर
शब्दों के बीच
दबे हुऐ शब्द
कुचलते हुऐ
कुछ शब्दों को
यूँ ही ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शनिवार, 8 नवंबर 2014

होता ही है एक बच्चे की खींची हुई लकीरें कागज पर ढेर सारी एक दूसरे से उलझ ही जाती हैं

शायद किसी दिन
कुछ लिखने के 
काबिल हो जाऊँ 
और पा लूँ एक 
अदद पाठक भी 
ऐसा पाठक जो 
पढ़े मेरे लिखे हुऐ को 
बहुत ध्यान से 
और समझा भी दे 
मुझे ही भावार्थ 
मेरे लिखे हुऐ का 
लिखने की चाह 
होना काफी नहीं होता 
बहुत ज्यादा और 
कुछ भी लिख देना 
कागज भरना 
कलम घिस देना 
ऐसे में कई बार 
आँखों के सामने 
आ जाता है कभी 
एक बच्चा जो 
बहुत शौक से 
बहुत सारी लाईने 
बनाता चला जाता है 
कागज ही नहीं 
दीवार पर भी 
जमीन पर और 
हर उस जगह पर 
जहाँ जहाँ तक 
उसकी और उसकी 
कलम की नोक 
की पहुँच होती है 
उसके पास बस
कलम होती है
कलम पर बहुत
मजबूत पकड़ होती है
बस उसकी सोच में
शब्द ही नहीं होते हैं
जो उसने उस समय
तक सीखे ही
नहीं होते हैं
इसी तरह किसी
खुशमिजाज दिन की
उदास होने जा रही
शाम जब शब्द
ढूँढना शुरु होती है
और माँगती है
किसी आशा से
मुझ से कुछ
उसके लिये भी
कह देने के लिये
दो चार शब्द
जो समझा सकें
मेरे लिखे हुऐ में
उसको उसकी उदासी
और उस समय मैं
एक छोटा सा बच्चा
शुरु कर देता हूँ
आकाश में
लकीरें खीँचना
उस समय
महसूस होता है
काश मैं भी
एक लेखक होता
और उदास शाम
मेरी पाठक
क्या पता किसी दिन
कोई लकीर कुछ कह दे
किसी से कुछ इतना
जिसे बताया जा सके
कि कुछ लिखा है ।

चित्र साभार: www.lifespirals.com.au

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

क्या किया जाये ऐसे में अगर कोई कहीं और भी मिल जाये

रिश्ते शब्दों के
शब्दों से भी
हुआ करते हैं
जरूरी नहीं
सारे रिश्तेदार
एक ही पन्ने में
कहीं एक साथ
मिल बैठ कर
आपस में बातें
करते हुऐ
नजर आ जायें
आदमी और
उसकी सोच की
पहुँच से दूर
भी पहुँच जाते हैं
एक पन्ने के
शब्दों के रिश्ते
किसी दूसरे के
दूसरे पन्ने की
तीसरी या चौथी
लाईन के बीच में
कहीं कुछ असहज
सा भी लगता है
कुछ शब्दों का
किसी और की
बातों के बीच
मुस्कुराना
कई बार पढ़ने
के बाद बात
समझ में आती
हुई सी भी
लगती है
बस पचता
नहीं है शब्द का
उस जगह होना
जैसे किसी के
सोने के समय
के कपड़े कुछ
देर के लिये
कोई और पहन
बैठा हो
उस समय एक
अजीब सी इच्छा
अंदर से बैचेन
करना शुरु
कर देती है
जैसे वापस
माँगने लगे कोई
अचानक पहने
हुऐ वस्त्र
आँखे कई बार
गुजरती हैं
शब्दों से इसी तरह
कई लाईनों के
बीच बीच में
बैठे हुऐ रिश्तेदारों
के वहाँ होने की
असहजता के बीच
मन करता है
खुरच कर क्यों ना
देख लिया जाये
क्या पता
नीचे पन्ने पर
कुछ और लिखा हुआ
समझ में आसानी
से आ जाये
‘उलूक’ तेरे चश्में में
किस दिन किस
तरह की खराबी
आ जाये
तेरे रिश्तेदार
कौन कौन से
शब्द है और
कहाँ कहाँ है
शायद किसी
की समझ में
कभी गलती
से आ ही जाये।

चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com

रविवार, 21 सितंबर 2014

बीमार सोच हो जाये तो एक मजबूत शब्द भी बीमार हो जाता है

शब्दों का
भी सूखता
है खून
कम हो
जाता है
हीमोग्लोबिन

शब्द भी
हमेशा
नहीं रह
पाते हैं
ताकतवर

झुकना शुरु
हो जाते हैं
कभी
लड़खड़ाते हैं
कई बार
गिर भी
जाते हैं

बात इस
तरह की
कुछ पचती
नहीं है
अजीब सी
ही नहीं
बहुत ही
अजीब सी
लगती है

पर क्या
किया जाये
कई बार
सामने वाले
के मुँह से
निकलते
मजबूत
शब्द भी
मजबूर
कर देते हैं
विवश
कर देते हैं
सोचने के लिये
कि
बोलने वाला
बहुत ही
खूबसूरत
होता है
सभ्य भी
दिखता है
उम्र पक
गई होती है
और
सलीका
इतना कि
जूते की
सतह में
सामने
वाले का
अक्स
दिखता है

फिर भी
बोलना
शुरु करता
है तो
गिरना
शुरु हो
जाते हैं
वो शब्द भी
जो बहुत
मजबूत
शब्द माने
जाते हैं

इतिहास
गवाह
होता है
किसी एक
खाली धोती
पहनने वाले
शख्स के
द्वारा
मजबूती से
पूरी देश
की जनता
से बोले
जाते हैं

सुनने वाले
को देते
हैं उर्जा
बीमार
से बीमार
को खड़े
होने की
ताकत
दे जाते हैं
और
 वही शब्द
निकलते
ही किसी
के मुँह से
खुद ही
बीमार
हो जाते हैं
लड़खड़ाने
लगते हैं
और
कभी कभी
गिरना
भी शुरु
हो जाते हैं

एक
शब्द ही
जैसे खुद
अपनी ऊर्जा
को पचा
जाता है
अर्थी के
साथ चल
रहे लोगों के
मुँह से
निकलता
 ‘राम नाम सत्य है’
जैसा हो
जाता है ।

चित्र साभार: http://expresslyspeaking.wordpress.com/

बुधवार, 2 जुलाई 2014

श्रद्धांजलि मौन होती है जाने वाला सुकून से चल देता है (सुशील, रायपुर, के निधन पर)

मृत्यू तो रोज 
ही होती है
रोज मरता है
एक आदमी
कहीं अंदर से
या बाहर से
आभास होता है
परवाह नहीं
करता है
सूखी हुई
आँखों से कुछ
टपकता भी है
ना नमकीन
होता है ना
मीठा होता है
बस कुछ होने
भर का एक
अहसास होता है
चिर निद्रा में
उसे भी सोना
ही होता है जो
उम्र भर सोने
की कोशिश में
लगा रहता है
ऐसी एक नहीं
ढेर सारी मौतों
का कोई भी
प्रायश्चित कहीं
भी नहीं होता है
इन सभी मृत्युओं
के बीच अपने किसी
बहुत नजदीकी
की मृत्यू से
आहत जब
कोई होता है
कोई शब्द
नहीं होता है
बस एक
मौन रोता है ।

रविवार, 25 मई 2014

रेखाऐं खींच कर कह देना भी कहना ही होता है

पूरी जिंदगी
ना सही
कुछ ही दिन
कभी कभी
कुछ आड़ी तिरछी
सौ हजार ना सही
दो चार पन्नों
में ही कहीं
पन्ने में नहीं
कहीं किसी दीवार
में ही सही
खींच कर
जरूर जाना
जाने से पहले
जरूरी भी
नहीं है बताना
वक्त बदलता है
ऐसा सुना है
क्या पता
कोई कभी
नाप ही ले
लम्बाईयाँ
रेखाओं की
अपनी सोच
के स्केल से
और समझ में
आ जाये उसके
कुछ बताने के लिये
हमेशा जरूरी
नहीं होती हैं
कुछ भाषाऐं
कुछ शब्द
दो एक सीधी
रेखाओं के
आस पास
पड़ी रेखाऐं
होना भी
बहुत कुछ
कह देता है
हमेशा नहीं
भी होता होगा
माना जा सकता है
पर कभी कहीं
जरूर होता है
समझ में आते ही
एक या दो
या कुछ और
रेखाऐं रेखाओं के
आसपास खींच देने
वाला जरूर होता है
रेखाऐं बहुत मुश्किल
भी नहीं होती हैं
आसानी से समझ
में आ जाती है
बहुत थोड़े से में
बहुत सारा कुछ
यूँ ही कह जाती हैं
जिसके समझ में
आ जाती हैं
वो शब्द छोड़ देता है
रेखाओं का
ही हो लेता है ।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

सवाल सिस्टम और व्यवस्था का जब बेमानी हो जाता है

कैसे बनेगा कुछ नया
उस से जिसके
शब्दों की रेल में
गिनती के होते हैं
कुछ ही डब्बे
और उसी रेल को
लेकर वो सफर
करता हो हमेशा ही
एक इंटरसिटी की
यात्रा की तरह
अपने घर से
मौहल्ले बाजार
होते हुऐ शहर की
इस गली से
उस गली में
निकलते हुऐ
वही रोज की
गुड मोर्निंग
वही मुस्कुराहटें
वही पैदल चलने
वालों को रौंदने
की इच्छा करते हुऐ
सड़क पर दौड़ते
दो पहिये चार पहिये
कुछ कुत्ते कुछ सांड
कुछ पुलिस वाले बेचारे
नेताओं की ओर से
मुँह फेरते हुऐ
बच्चों और लड़कियों
को सीटी बजाकर
उनके वाहनो को
खदेड़ने के करते
हुऐ इशारे
मंदिरों के सामने से
उनको ढकती खड़ी होती
सड़क पर पहँच कर
दुकाने निकालती
चालीस फीट उँचाई
के नियम को
तोड़ती बिखेरती मीनारें
और अंत में वही
रोज का तालाब
जिसके किनारे से
लगा होता है एक बोर्ड
यहाँ मछली पकड़ना
सख्त मना है
और कोई भी जहाँ
मछली पकड़ता हुआ
कहीं भी नजर
नहीं आता है
मछलियां अपने आप
फंसना फंसाना सीखती है
कोई किसी से
कुछ नहीं कहता है
या कहो कहना ही
नहीं चाहता है
या नहीं कह पाता है
कुर्सियांं भी तो हर
जगह होती ही है
किनारे किनारे
उन पर कोई भी
कभी भी कहीं भी
बैठ जाता है
बस कुछ गोलियांं
रखता है अपने पास
सबको बाँटता
चला जाता है
गोली देने में कोई
जात पात कोई
ईमान धर्म भी
नहीं देखा जाता है
सब कुछ लोकतांंत्रिक
तरीके से किया जाता है
अब ‘उलूक’ का तो
रोज का यही
काम रह जाता है
रोज शुरु करता है
अपनी यात्रा
रोज जाता है
मछलियां देखता है
और वापिस भी
आ जाता है
रेल के कुछ डब्बों को
आगे पीछे करता हुआ
दूसरे दिन के लिये
एक रेल बनाता है
ऐसे में कोई कैसे
उम्मीद करता है
कुछ नया खुद का
बनाया हुआ रेल का
एक डब्बा ही सही
कोई क्यों नहीं
किसी को दिखाता है ।

शनिवार, 22 मार्च 2014

शब्दों के कपड़े उतार नहीं पाने की जिम्मेदारी तेरी हो जाती है

हमाम  में आते 
और जाते रहना
बाहर आकर कुछ
और कह देना
आज से नहीं
सालों साल से
चल रहा है
कमजोर कलेजे
पर खुद का
जोर ही नहीं
चल रहा है
थोड़ी सी हिम्मत
रोज बट भी
कभी जाती है
बताने की बारी
आती है तो
गीले हो गये
पठाके की तरह
फुस्स हो जाती है
नंगा होना
हमाम
के अंदर शायद
जरूरी होता है
हर कोई होता है
शरम थोड़ी सी
भी नहीं आती है
 
कपड़े पहन कर
पानी की बौछारें
वैसे भी कुछ
कम कम ही
झेली जाती हैं
बहुत से कर्मो
के लिये शब्द
ही नहीं होते
कभी पास में
शब्द के अर्थ
होने से भी
कोई बात समझ
में आ जानी
जरूरी नहीं
हो जाती है
सभी नहाते हैं
नहाने के लिये
ही 
हमाम बनाने
की जरूरत
हो जाती है
शब्दों को नँगा
कर लेने जैसी
बात किसी से
कभी भी कहीं
भी नहीं कही
जाती है 
हमाम में
नहाने वाले से
इतनी बात जरूर
सीखी जाती है
खुद कपड़े उतार
भी ले कोई
सभी अपने
“उलूक” आ ही
जानी चाहिये
इतने सालों में
  

तेरे
  खाली

दिमाग में
बात को कपड़े
पहना कर बताने
की कला
बिना 
हमाम 
में रहे और
नहाये कभी
भी नहीं किसी
को आ पाती है । 

रविवार, 8 सितंबर 2013

शब्द हमेशा सच नहीं बोल रहा होता है

ऎसे ही बैठे बैठे
कोई कुछ नहीं
कह देता है
ऎसे ही बिना
सोचे कोई कुछ भी
कहीं भी लिख
नहीं देता है
बांंधने पढ़ते हैं
अंदर उबलते हुवे
लावों से भरे
हुऎ ज्वालामुखी
बहुत कुछ ऎसा
भी होता है जो
सबके सामने
कहने जैसा ही
नहीं होता है
कहीं नहीं मिलते हैं
खोजने पड़ते हैं
मिलते जुलते
कुछ ऎसे शब्द
खींच सकें जो
उन गन्दी लकीरों को
शराफत से पहना कर
कुछ ऎसे कपडे़
जिस के आर पार
सब कुछ साफ साफ
दिख रहा होता है
पर ये सब
कर ले जाना
इतना आसान भी
नहीं होता है
शब्द खुद
ही उतारते
चले जाते हैं
शब्दों के कपडे़
शब्द मौन होकर
ऎसे में कुछ नहीं
कह रहा होता है
चित्र जीवित होता है
वर्णन करना उस
जीवंतता का
लिखने वाले को
ही जैसे नंगा
कर रहा होता है
क्या किया जाये
लिखने वाले की
मजबूरी को कोई
कहाँ समझ
रहा होता है
अंदर ही अंदर
दम तोड़ते शब्दों
पर शब्द ही जब
तलवार खींच
रहा होता है
शब्दों के फटने की
आहट से ही
लिखने वाला
बार बार चौंक
रहा होता है
इसी अंतरद्वंद से
जब रचना का जन्म
हो रहा होता है
सच किसी कोने में
बैठ कर रो
रहा होता है
जो निकल के
आ जाता है
एक पन्ने में
वो कुछ कुछ
जरूर होता है
पर एक पूरा
सच होने से
मुकर रहा
होता है ।

शनिवार, 22 जून 2013

कुछ नहीं कुछ बहुत कुछ

कुछ लोग
बहुत थोडे़
शब्दों में
बहुत कुछ
कह ले
जाते हैं
उनके शब्द
उनकी तरह
सुन्दर होते हैं
उनके बारे में
कुछ कहाँ
बता जाते हैं
शब्द मेरे
पास भी
नहीं होते हैं
ना ही मेरी
सोच में ही
आ पाते हैं
किसे बताउँ
क्या बताउँ
कैसे कैसे लोग
क्या क्या कर
ले जाते हैं
कुछ लोग बस
खाली बैठे बैठे
शर्माते हैं
सीख क्यों नहीं
लेते कुछ शब्द
ऎसे जो सब
लोग कह
ले जाते हैं
सब लोग
समझ जाते हैं
सबके आस पास
सब कुछ हो
रहा होता है
हर कोई किसी
चीज पर कुछ
ना कुछ कह
रहा होता है
कुछ लोग वो
सब कुछ क्यों
नहीं देख
ले जाते हैं
जिस पर
लिखने से
लोग शोहरत
पा ले जाते हैं
समान समान में
विलय हो जाता है
सिद्धान्त पढ़ते पढ़ाते
भी कुछ लोग नहीं
समझ पाते हैं
कुछ लोग ही तो
होते हैं जो कुछ
लोगों का कहे को
ही कहा है
कहे जाते हैं
लोग लोग होते हैं
इधर होते हैं या
उधर हो जाते है
कुछ लोग ही
जानते हैं जाने वाले
किधर किधर जाते हैं
बहुत से शब्द
बहुत से लोगों के
पास हो जाने से
कुछ भी नहीं
कहीं होता है
कुछ लोगों के
कुछ शब्द ही
कुछ कहा गया है
कि श्रेणी में
आ पाते हैं
मेरे तेरे और
उसके जैसे लोग
तो आते हैं और
चले जाते हैं
कुछ लोगों के
लिये ही होती हैं
बही कुछ चीजें
उन का लुफ्त
कुछ लोग ही
उठा पाते हैं
कहीं से शुरु कर
कहीं पर खतम
कर के देख ले
आज कल हो
या परसों
कुछ लोग ही
दुनियाँ को
चलाते हैं
बहुत से लोग
मर भी जायें
कुछ लोगों के
लिये से कुछ
नहीं होता है
शहीद कुछ
लोगों में से ही
गिने जाते हैं
कुछ बातें
कुछ लोगों की
कुछ लोग ही
समझ पाते हैं ।

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