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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

जाते जाते आने वाले को कुछ सिखाने के लिये कान में बहुत कुछ फुसफुसा गया एक साल

बहुत कुछ
बता गया
बहुत कुछ
सिखा गया
याद नहीं
है सब कुछ
पर बहुत कुछ
लिखा गया
एक साल

और आते आते
सामने से
साफ साफ
दिख रहा है 
अब सीटी
बजाता
जाता हुआ 
एक साल

पिछले सालों
की तरह
हौले हौले
से जैसे
मुस्कुरा कर
अपने ही
होंठों के
अन्दर 
अन्दर
कहीं अपने
ही हाथ
का अँगूठा
दिखा गया
एक साल

अच्छे दिन
आने के सपने
सपनों के
सपनों में भी

बहुत 
अन्दर अन्दर
तक कहीं
घुसा गया
एक साल

असलियत
भी बहुत
ज्यादा खराब
नहीं दिख रही है
अच्छे अच्छे
हाथों में
एक नया
साफ सुथरा
सरकारी कोटे
से थोक में
खरीदे गये
झाड़ुओं में से
एक झाडू‌
थमा गया
एक साल

लिखने को
इफरात से था
बहुत कुछ खाली
दिमाग में था

शब्द चुक गये
लिखते लिखते
पढ़ने वालों की
पढ़ने की आदत
छुड़ा गया
एक साल

ब्लाग बने
कई नये
पुराने ब्लागों
के पुराने
पन्नों को
थूक लगा
लगा कर
चिपका गया
एक साल

अपनी अपनी
अपने घर में
सबके घर की
सब ने कह दी

सुनने वालों
को ही बहरा
बना गया
एक साल

खुद का खाना
खुद का पीना
खुद के
चुटकुल्लों पर
खुद ही हंस कर

बहुत कुछ
समझने
समझाने
की किताबें
खुद ही
लिखकर

अनपढ़ों
को बस्ते
भर भर कर
थमा गया
एक साल

खुश रहें
आबाद रहें
हिंदू रहें
मुसलमान रहें
रहा सहा
आने वाले
साल में कहें

गिले शिकवे
बचे कुचे
आने वाले
साल में
और भी
अच्छी तरह
से लपेटने
के नये तरीके
सिखा गया
एक साल ।

 चित्र साभार: shirahvollmermd.wordpress.com

भगवान जी भगवान जी होते हैं और नंगे नंगे होते हैं भगवान जी का नंगों से कोई रिश्ता नहीं होता है नंगा भगवान से बड़ा होता है

किसी को
कैसे बताऊं
अपना धर्म
नहीं बता
सकता

कुछ लोग
मेरे धर्म के
शुरु कर
चुके हैं
रक्त पीना
वो मुर्गा
नहीं खाते हैं
ना ही वो
बकरी खाते हैं

समझ में बस
एक बात
नहीं आती है
कि वो
कुत्ता क्यों
नही खाते हैं

वो कुत्तों से
प्यार भी नहीं
करते हैं
ना ही कुत्ते
उनको देख
अपनी पूँछ
हिलाते हैं

मुझे अपने
सर के बाल
नोचने हैं

वो व्हिस्की
के नशे में
कुछ लोगों
को आदेश
दे रहे हैं

भाई तेरी पूँछ
और मेरी पूँछ
का बाल हरा है

शुरु हो जा
नोचना गंजो
के सिर के
बालों को
सबसे अच्छा
होता है

पैसा उसका
धर्म है
किसी को नहीं
पता होता है

नंगा होना
अपराध
नहीं है
पैसा है तो
नंगा हो जा
मुनि
कहलायेगा
पैसा नहीं है
भिखारी
कहलायेगा

नियम
कानून कोर्ट
नंगो के लिये
नहीं होती है
नंगों की
जय जयकार
होती है
काश कोई
नंगा मेरा
भी बाप होता
मैं भी शायद
कहीं
आबाद होता।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

पी के जा रहा है और पी के देख के आ रहा है

अरे ओ मेरे
भगवान जी
तुम्हारा मजाक
उड़ाया जा रहा है
आदमी पी के जैसी
फिलम बना रहा है
जनता देख रही है
मारा मारी के साथ
बाक्स आफिस का
झंडा उठाया
जा रहा है
ये बात हो रही थी
भगवान अल्ला
ईसा और भी
कई कई
कईयों के देवताओं
के सेमिनार में
कहीं स्वरग
या नरक या
कोई ऐसी ही जगह
जिसका टी वी
कहीं भी नहीं
दिखाया जा रहा है
एक देवता भाई
दूसरे देवता को
देख कर
मुस्कुरा रहा है
समझा रहा है
देख लो जैसे
आदमी के कुत्ते
लड़ा करते हैं
आपस में पूँछ
उठा उठा कर
बाल खड़े
कर कर के
कोई नहीं
कह पाता है
आदमी उनको
लड़ा रहा है
तुमने आदमी को
आदमी से
लड़वा दिया
कुत्तों की तरह
पूरे देश का
टी वी दिखा रहा है
भगवान जी
क्या मजा है
आप के इस खेल में
आपकी फोटो को
बचाने के लिये
आदमी आदमी
को खा रहा है
आप के खेल
आप जाने भगवान जी
हम अल्ला जी के साथ
ईसा जी को लेकर
कहीं और किसी देश में
कोई इसी तरह की
फिलम बनाने जा रहे हैं
बता कर जा रहे हैं
फिर ना कहना
भगवान जी का
कापी राईट है
और किसी और का
कोई और भगवान
उसकी नकल बना कर
मजा लेने जा रहा है ।

चित्र साभार: galleryhip.com

रविवार, 28 दिसंबर 2014

फिसलते हुऐ पुराने साल का हाथ छोड़ा जाता नहीं है

शुरु के सालों में
होश ही नहीं था

बीच के सालों में
कभी पुराने साल
को जाते देख
अफसोस करते
और
नये साल को
आते देख
मदहोश होकर
होश खोते खोते
पता ही नहीं चला
कि
बहुत कुछ खो गया

रुपिये पैसे की
बात नहीं है
पर बहुत कुछ
से कुछ भी
नहीं होते होते
आदमी
दीवालिया हो गया

पता नहीं
समझ नहीं पाया
उस समय समझ थी
या
अब समझ खुद
नासमझ हो गई

साल के
बारहवें महीने
की अंतिम तारीख
आते समय
कुछ अजीब अजीब
सी सोच
सबकी होने लगी है
या
मेरे ही दिमाग
की हालत
कुछ ऐसी
या वैसी
हो गई है

पुराने साल
को हाथ से
फिसलते देख
अब रोना
नहीं आता है

नये साल के
आने की
कोई खुशी
नहीं होती है

हाथ में
आता हुआ
एक नया हाथ
जैसे पकड़ा
जाता नहीं है

पता होता है
तीन सौ
पैंसठ दिन
पीछे के
जाने ही थे
चले गये हैं

तीन सौ पैंसठ
आगे के आने है
आयेंगे ही शायद
आना शुरु हो गये हैं

खड़ा भी
रहना चाहो
बीच में
सालों के
बिना
इधर हुऐ
या बिना
उधर हुऐ ही
ऐसा किसी
से किया
जाता नहीं है

इक्तीस की रात
कही जा रही है
कई जमानों से
कत्ल की रात
यही राज तो
किसी के
समझ में
आता नहीं है
जिसके आ
जाता है
वो भी
समझाता नहीं है ।

चित्र साभार: community.prometheanplanet.com

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

इक्तीस दिसम्बर इस साल नहीं आ पाये सरकार के इस फरमान का मान रखें

ख्याल रखें
नया साल
इस साल
मनाने की
सोच कर
अपने लिये
पैदा नहीं करें
कोई बबाल
तुगलक और
उसके फरमानों
की फेहरिस्त
लिख लिखा कर
कहीं पैंट की जेब
में सँभाल रखें
इक्तीस दिसम्बर
को पूजा करें
हनुमान जी
का ध्यान धरें
राम नामी
माला ओढ़ कर
तुलसी माला के
108 दाने
दूध में धो कर
धूप में सुखाकर
जनता को कुछ
नया कर दिखाने
का मन ही
मन ठान रखें
बीमार नहीं होना है
छुट्टी नहीं लेनी है
पीने पिलाने का
कार्यक्रम करें
कोई रोक नहीं है
परदा लगा
कर एक मोटा
इक्तीस को
छोड़ कर
किसी और दिन
अपने घर से
कहीं दूर किसी
और की गली में
करते समय
ध्यान से अपने
चेहरे पर एक
रुमाल रखें
जनता के लिये
जनता के द्वारा
जनता के बीच
जनता के साथ
तुगलक के
नये वर्ष की
तुगलकी
एक जनवरी
साल के किसी
तीसरे या चौथे
महीने से शुरु
करते हुऐ
उम्मीदों को
खरीदने बेचने
की एक
नई दुकान की
नई पहल के
नये फरमान
का कुछ
तो मान रखें ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

इसके जाने और उसके आने के चरचे जरूर होंगे

समाधिस्त होने
की प्रक्रिया में
एक और वर्ष
संत
दो शून्य एक चार
चार की जगह पाँच
पैदा होने को तैयार
संतों की परम्पराओं
में खरा उतरने
कुछ नया करने
कुछ पुराने को कुतरने
सीमा पाँच दिन दूर
होना है कुछ तो
आर या पार
कंघा निकाल ले
तू भी गंजे
बाल ले अपने संवार
कपड़े अपने नहीं तो
पड़ोसी के ही सही
धुलवा कर स्त्री
करा ले नंगे
किसे पता है
किस गली में
कौन मिल जाये
भगवान भी खेलते हैं
जिस जमीन पर
चोर सिपाही और
तालियाँ पीटते हैं
साथ में भिखमंगे
किस के हाथ
क्या लगे
पानी में तक
नजर है
बहुतों की
गंदगी दिखना
बंद हो रही
बंद गले से
गूँगे भी चिल्लाने
की फिराक में हैं
हर हर गंगे
कूड़े की किस्मत
क्या कहें
झेंप रहा हो
शायद फिराक भी
मुँह छिपा कर
कहीं जन्नत के
किसी कवि
सम्मेलन में
रत्नों में रत्न
अगले किसी दशक
के होने वाले
देश रत्न
सड़क पर फिंकवा
रहे हैं ठेका ले कर
सस्ते में फिर भी
नहीं होते दिख रहे हैं
इस सब पर
कहीं भी पंगे
इंतजार है
बेसब्री से
इसके जाने का
और उसके आने का
पिछले में नहीं आये
अगले में मिल जायें
मरे हुऐ सपने
रात की नींद से
निकल कर कभी तो
जिंदा होकर सामने के
किसी मैदान पर
भगवान राम के साथ
पुष्पक विमान से
हैप्पी न्यू ईयर
कहते कहते शायद
कभी जमीन पर उतरेंगे ।

चित्र साभार: november2013calendar.org

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

मैरी क्रिसमस टू यू

पितामह और
 संध्याकाल
गणेश स्तुति
रामरक्षा
हनुमान चालीसा
और ध्यान
कहीं अंधेरे में
कुछ कुछ
दिखता हुआ
शायद भगवान
सुबह की दौड़
बस्ता प्रार्थना सभा
ईशू के गीत
चमकता चेहरा दाड़ी
कुछ कथाऐं
बलिदान करता हुआ
एक भगवान
पच्चीस दिसम्बर
सजी हुई
एक इमारत
मोमबत्तियाँ
केक चर्च
कहानियाँ
और कहानियों
में ही कहीं
कोई एक शैतान
चर्च की बजती घंटियाँ
मंदिर की आरतियाँ
सलीब पर लटका
कोई एक ईश्वर
गुदा हुआ कीलों से
रिस्ता हुआ खून
बलिदान करता
एक भगवान
राम में ईशू
ईशू में राम
भगवान ईश्वर
धनुष तलवार
शंखनाद घंटियाँ
मधुर आवाज
बचपन से पचपन
की ओर
धर्म और अधर्म
आदमी और शैतान
आदमी से आदमी
की कम होती पहचान
ना दिखे राम
ना मिले ईशू
होते चले
इसके उसके
और मेरे भगवान
बाकी कुछ नहीं
रह गया कहने को
क्या कहूँ बस
कुछ भूलूँ
कुछ याद करूँ
हैप्पी क्रिसमस टू यू
मैरी क्रिसमस टू यू ।

चित्र साभार: luvly.co

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

पानी रे पानी लिख तो सही तू भी कभी तो कुछ पानी

बहते पानी की
एक लहर लिख
और छोड़ दे
पानी में पानी
गंदा है या साफ है
कोई फर्क
नहीं पड़ता है
बस पानी
होना चाहिये
और उस पानी को
बहने की तमीज
होनी चाहिये
मतलब एक
परिभाषा
अनुरूप ही
होना चाहिये
पानी जैसे
पानी में रसायन
रासायनिक पानी
पानी का मंत्री पानी
पानी का प्रधानमंत्री पानी
गंगा का पानी
बिना कपड़े का नंगा पानी
पानी टाई पहने हुऐ
एक शरीफ पानी
शोध परियोजना का
सबसे महंगा पानी
कुछ भी कह दो
कुछ भी लिख दो
किसे पता चलना है कुछ
जब बह गया हो
पानी में पानी
बहुत आसान है
बहुत बेकार का है
हर जगह दिखता है
हर जगह मिलता है
वही जो है पानी
लूटता भी नहीं है
जिसको हर लुटेरा
सोचता भी
कहाँ है पानी
बहुत अच्छा है
लिख लेना कभी
थोड़ा सा कुछ पानी
किस को पड़ी है
पानी की कहीं
बहता रहे
लिखा लिखाया
उसमें कहीं तेरा भी
कुछ कहीं पानी
कितना अच्छा है
सोचने में कि
तू भी पानी
और मैं भी पानी
कहाँ होता है अलग
पानी से कभी
कहीं का भी पानी
लूट खसोट चूस
और मुस्कुरा
और फिर कह दे
सामने वाले से
कि मैं हूँ पानी
‘उलूक’
तेरे पानी पानी
हो जाने से भी
कुछ नहीं होना है
पानी को रहना है
हमेशा ही पानी ।

www.mycutegraphics.com

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

सुधर क्यों नहीं जाता है छोटी सी बात करना सीखने के लिये क्यों नहीं कहीं दूर चला जाता है

छोटी छोटी बातों
के ऊपर बातें
बनाने से बात
बहुत लम्बी
हो जाती है
अपने आस पास
की धुंध गहरी
होते होते धूल
भरी एक
आँधी हो जाती है
बड़ी बात
करने वाले को
देखने सुनने
से समझ में
आ जाता है
अच्छी मगर एक
छोटी पक्की बात
एक छोटे आदमी
को कहाँ से कहाँ
उठा ले जाती है
एक छोटी बात से
चिपका हुआ आदमी
अपनी ही बनाई
आँधी में आँखें
मलता रह जाता है
एक दिमागदार
छोटी सी बात
का मसीहा
साल के हर दिन
क्रिसमस मनाता है
सोचने में अच्छा
लगता है और
बात भी समझ
में आती है
मगर छोटी छोटी
बातों को खोजने
परखने में सारी
जिंदगी गुजर जाती है
अपने आस पास के
देश को देख देख कर
देश प्रेम उमड़ने से
पहले गायब हो जाता है
देशभक्ति करने की
सोच बनाने से पहले
पुजारी को धंधा
और धंधे का फंडा
कदम कदम पर
उलझाता है
समझदार अपनी
आँखों पर दूरबीन
नाक पर कपड़ा
और कान में रुई
अंदर तक घुसाता है
उसका दिखाना दूर
आसमान में एक
चमकता तारा
गजब का माहौल
बनाता है
तालियों की
गड़गड़ाहट में
सारा आसमान
गुंजायमान
हो जाता है
‘उलूक’
आदतन अपनी
अपने अगल बगल
के दियों से चोरे गये
तेल के निशानों
के पीछे पीछे
इस गली से
उस गली में
चक्कर लगाता है
कुछ भी हाथ में
नहीं लगने के बाद
खीजता हुआ एक
लम्बे रास्ते का
नक्शा बना कर
यहाँ छाप जाता है
छोटे दिमाग की
छोटी सोच का
एक लम्बा उदाहरण
और तैयार हो जाता है ।

चित्र साभार: www.gograph.com

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

चाय की तलब और गलत समय का गलत खयाल

अपने सामने
मेज पर पड़े
खाली चाय
के एक कप
को देख
कर लगा
शायद चाय
पी ली है
फिर लगा
नहीं पी है
अब चाय
पी या नहीं
कैसे पता चले
थोड़ी देर सोचा
याद नहीं आया
फिर झक मार
कर रसोई की ओर
चल देने का
विचार एक बनाया
पत्नी दिखी
तैयारी में लगी हुई
शाम के भोजन की
काटती हुई कुछ
हरे पत्ते सब्जी
के लिये चाकू
हाथ में ली हुई
गैस के चूल्हे के
सारे चूल्हे दिखे
कुछ तेज और कुछ
धीमे जले हुऐ
हर चूल्हे के ऊपर
चढ़ा हुआ दिखा
एक बरतन
किसी से निकलती
हुई भाप दिखाई दी
और
किसी से आती
हुई कुछ कुछ
पकने उबलने की
आवाज सुनाई दी
बात अब एक कप
चाय की नहीं हो गई
लगा जैसे जनता के बीच
बिना कुछ किये कराये
एक मजबूत सरकार की
हाय हाय की हो गई
थोड़ी सी हिम्मत जुटा
पूछ बैठा कुछ याद है
कि मैंने चाय पी
या नहीं पी
पिये की याद
नहीं आ रही है
और दो आँखें
सामने से एक
खाली कप चाय
का दिखा रही हैं
श्रीमती जी ने
सिर घुमाया
ऊपर से नीचे
हमे पूरा देखकर
पहले टटोला
फिर अपनी नजरों
को हमारे चेहरे
पर टिकाया
और कहा
बस यही होना
सुनना देखना
बच गया है
इतने सालों में
समझ में कुछ कुछ
आ भी रहा है
पढ़ पढ़ कर तुम्हारा
लिखा लिखाया
इधर उधर कापियों में
किताबों में दीवालों में
सब नजर के सामने
घूम घूम कर आ रहा है
पर बस ये ही समझ में
नहीं आ पा रहा है
किसको कोसना पड़ेगा
हो रहे इन सब
बबालों के लिये
उनको जिनको
देख देख कर
तुम लिखने लिखाने
का रोग पाल बैठे हो
या उन दीवालों किताबों
और कापियों को
जिन पर लिखे हुऐ
अपने कबाड़ को
बहुत कीमती कपड़े
जैसा समझ कर
हैंगर में टाँक बैठे हो
कौन समझाये
किसे कुछ बताये
एक तरफ एक आदमी
डेढ़ सौ करोड़ को
पागल बना कर
चूना लगा रहा है
और एक तुम हो
जिसे आधा घंटा
पहले पी गई चाय
को भी पिये का
सपना जैसा
आ रहा है
जाओ जा कर
लिखना शुरु करो
फिर किसी की
कहानी का
कबाड़खाना
चाय अब दूसरी
नहीं मिलने वाली है
आधे घंटे बाद
खाना बन जायेगा
खाने की मेज
पर आ जाना ।

चित्र साभार: pngimg.com

रविवार, 21 दिसंबर 2014

खुद को ढूँढने के लिये खोना जरूरी है

एक नहीं
कई बार
होता है
आभास
भटकने का

समझ में
भी आता
है बहुत


साफ साफ
दिखता
भी है


जैसे

साफ
निर्मल
पानी में
अपना
अक्स ही
इनकार
करता हुआ
खुद ही का
प्रतिबिम्ब
होने से

बस
थोड़े से
लालच
के कारण
जिसे
स्वीकार
करना
मुश्किल
होता है
और
हमेशा
की तरह
कोशिश
व्यर्थ
चली
जाती है

बेचने की
एक
सत्य को
पता होने
के
बावजूद भी
कि
सत्य कभी
भी नहीं
बिका है

बिकता
हमेशा
झूठ ही
रहा है
और
वो भी
कम कम
नहीं
हमेशा ही
बहुत ऊँचे
दामों में
बिना किसी
बाजार
और
दुकान में
सजे हुऐ

जिसे खरीदते
समय किसी
को भी कभी
थोड़ी सी भी
झिझक
नहीं होती है

सोच और
कलम के
लिये कभी
कहीं कोई
बाजार
ना हुआ है
ना कभी होगा

फिर भी
गुजरते हुऐ
बाजारों के बीच
लटके हुऐ
झूठे इनामों
सम्मानों
दुकानों की
चकाचौंध

और

ठेकेदारों की
निविदाओं के
लिये लगाई
जा रही
बोलियों से
जब भी
कलम लेखन
और
लेखक का ध्यान
भटकता है

थोड़ी देर के
लिये ही सही
सत्य नंगा
हो जाता है

खुद का खुद
के लिये
खुद के ही
सामने

और

रास्ता
दिखना
शुरु हो
जाता है
तेज रोशनी
से चौधिया
के अंधी
हो गई
आँखो
को भी ।


चित्र साभार: www.gograph.com

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

पढ़ना जरूरी नहीं हर खत पढ़ दिया तो पढ़ कर मुँह नहीं बनाने का

ठहर जाना
कलम का
विश्राम
लेखन का
विचार शून्य
हो जाना
लेखक की खुद
की सोच का
संकेत नींद के
खुद ही
सो जाने का
ख्वाब देखने में
ऐसा भी कभी
किसी दिन
मौज में ही सही
कोई सौदा नहीं
नफा नुकासन
उठाने का
जैसे होते होते
किसी बात के
हो जाने का
खबर का
फैलने से पहले
सिकुड़ जाने का
वाकये का
अपनी नजर से
गुजरते गुजरते
आकाश
हो जाने का
कुछ भी किया
जा सकने की
ताकत पैदा
करने की
अपने अंदर
कोशिश करने
की एक पहल
कर लेने की
सोच बना
ले जाने का
मुद्दे खोजने
से अच्छा
मुद्दे पकड़ कर
जमीन पर
बैठ जाने का
पूरा अंगद
हो जाने से
पहले उसके
पैर का चित्र
बना बना कर
हर किसी के
दिमाग में
बैठाने का
हर किसी को
नहीं होता है
तजुर्बा
हर तरह का
‘उलूक’
समझने की
कोशिश में
अपने ही
आसपास की
हवा धूल
मिट्टी पानी
बहुत ही उम्दा
रास्ता है
बिना खबर
किये किसी को
दीवाना हो कर
किसी भी बात पर
बेखबर हो कर
खुद की दीवानगी का
झंडा खुद ही
लहराने का
और ढिंढोरा पीटते
चले जाने का
खाली पड़ी
सालों से
किसी गली में
जा कर
बिना आवाज
के सही
कुछ देर
अपने ही गाल
अपने ही हाथों
से बजाने का ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

मजाक है

उसके आते ही
सबको इतनी 
शरम आई 
कि सबने 
छोड़ दी 
सिगरेट दारू
गुटखा सुरती
मुझे विश्वास 
नहीं रह 
गया अब 
खुद पर 
मेरे झूठ 
मुझे कब से
लात मार
रहे हैं 
और हंस
रहे हैं 
चिल्ला रहे हैं 
बेवकूफ बेवकूफ
मुझे पता है
जो बात
उस पर
ध्यान देना 
अच्छी बात
नहीं है 
और आपको भी
इस बात  पर 
ज्यादा ध्यान 
नहीं देना चाहिये 
टिप्प्णी करने से 
भी परहेज करें ।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

क्या किया जाता है जब सत्य कथाओं की राम नाम हो रही होती है

ज्यादातर कही
जाने वाली
कथायें
सत्य कथायें
ही होती हैं
जिंदगी
पता नहीं
चल पाता है
कब एक बच्चे
से होते होते
जवाँ होती है
समझ में आने
के लिये
बहुत सी बातें
चलते चलते
सीखनी होती है
कुछ कथनी करनी
एक मजबूरी
होती है और
कुछ करनी कथनी
जरूरी होती है
रात किसी दिन
सोते समय
अचानक बाहर
आवाज होती है
जब कुछ
आसामाजिक
तत्वों की
अंधेरे में
खुद ही के
किसी साथी से
मुटभेड़ होती है
समझ में आती
है बात जब तक
शाँति हो
चुकी होती है
बाहर निकल कर
देखने पर
दिखता है
मार खाई हुई
खून से लथपथ
एक जान
आँगन में अपने
पड़ी होती है
कुछ समझ में
नहीं आता है
और फिर पास
के थाने के
थानेदार से
दूरभाष पर
बात होती है
थानेदार को
घटना से ज्यादा
अपने बारे में
बताने की
पड़ी होती है
साथ में
फँला फँला से
उसके बारे में
पूछ लेने की
राय भी होती है
मुँह पर हँसी और
समझ अपनी
रो रही होती है
अपनी पहचान
भी उसको
बताने की
बहुत ज्यादा
खुद को भी
पड़ी होती है
कैसे बताया
जाये उसको
बस उसकी
उधेड़बुन सोच
बुन रही होती है
देश के प्रधानमंत्री
की डेढ़ सौ करोड़
की सूची की तरफ
उसका ध्यान
खींचने के लिये
किसी एक
तरकीब की
जरूरत हो
रही होती है
एक बड़े बन
चुके आदमी
के सामने
एक छोटे आदमी
की छोटी सोच
बस अपने
ही घर में
डरी डरी सी
रो रही होती है ।

चित्र साभार: weeklyvillager.com

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

जमाने को सिखाने की हिम्मत गलती से भी मत कर जाना

ये अपना अपना
खुद का खुद क्या
लिखना लिखाना
कभी कुछ
ऐसा भी लिख
जिसका कहे
कोई जरा
इंपेक्ट फेक्टर
तो बताना
इधर से टीप
उधर से टीप
कभी छोटा सा
कभी लम्बा
सा बना ना
बिना डरे घबराये
दो चार संदर्भ
लिखे के नीचे
से छोटे छोटे
अक्षरों में कुछ
छपवा ले जाना
इधर उस पर
कुछ पैसा बनाना
उधर इस पर
इनाम कुछ
कह कहलवा
कर उठवाना
अपने आप खुद
अपनी सोच से
कुछ लिख लिखा
लेने वालों का
जनता के बीच
मजाक बनवाना
ऐसा भी क्या
एक झंडा उठाना
जिसे फहराने
के लिये
कहना पड़ जाये
हवा से भी
आ जा ना
आ जा ना
समझ नहीं सका
बेवकूफ तू
ना समझ
पायेगा कभी भी
ये जमाना भी है
उसी का जमाना
अपनी कहते
रहते हैं मूरख
‘उलूक’ जैसे
कुछ हमेशा ही
तू उसके नीम
कहे पर चाशनी
लगा कर
हमेशा मीठा
बना बना कर
वाह वाही पाना
हींग लगेगी
ना फिटकरी
ना तेरी जेब से
कभी भी इस में
कुछ है जाना
लगा रह इसका
उस से कहते हुऐ
उसका इस से
कहते चले जा ना ।

चित्र साभार: www.clker.com

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

कभी कर भी लेना चाहिये वो सब कुछ जो नहीं करना होता है अपने खुद के कानूनो में

कुछ देर के
लिये ही सही
अच्छा है
बहुत दूर को नहीं
अपने आस पास
को छोड़
अपने से थोड़ा
कुछ दूर को ही
देखने सुनने
की कोशिश करना
रोज देखते देखते
वही अपने या
कहीं से थोड़ा सा
भी अपने नहीं भी
कुछ गोल कुछ लम्बे
कुछ हसीन और
कुछ रोते चेहरे
यहाँ तक खुद को
भी टाल देना
हो सके तो खुद से
सुबह सवेरे देख लेना
दूर एक पहाड़ को
उस पर कहीं से
उठ रहे धुऐं को
या फिर पहाड़ की
घुमावदार सड़को
पर उतरती चढ़ती
चीटियों के आकार
की गाड़ियों
को ही सही
और दिन भर
खुश हो लेना
बंदरों के उछलने
कूदने में अपने
ही आस पास
नहीं टोकना
झुँझला कर उनको
उखाड़ने देना
खेत पर मेहनत से
अपनी लगाई हुई
फसल को
और शाम होते होते
ध्यान से सुनने
की कोशिश करना
झिंगुरों की तीखी
आवाज के साथ
जुड़े संगीत को
खोजना सियारों की
चिल्लाने में भी
कोई राग
मस्जिद से आ रही
अजान में खोजना
कोई मंत्र ध्वनी
नहीं खोलना रेडियो टी वी
समाचारों के लिये
मना कर देना फेकने को
हाँकर को कुछ दिन
शहर की खबरों से
पटे अखबारों को
अपने आस पास
बहुत अच्छा होता हुआ
या बहुत अच्छा करने वाले
बहुत दिनों तक
अच्छा अच्छा महसूस
कराते रहें और
वही सब अच्छा
अपने दिमाग में
भर भरा कर
धो धुला कर
सोच के नीरमा से
रोज लाकर रख देना
यहाँ सूखने के लिये
धूप में जैसे
भीगे हुऐ कपड़े
किसी दिन वो सब
भी करना या
कर लेने की
कोशिश कर लेना
जो नहीं करना चाहिये
जो नहीं होना चाहिये
और जो नहीं आता हो
कहीं से भी सोच में
किसी भी तरह से
अपने कानूनों को
तोड़ कर देखना
और भुगतना
सजा भी खुद से
खुद को दी गई
देख तो सही कर के
अच्छा होता है
बहुत कभी कभी ।

चित्र साभार: socialtimes.com

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

कितने आसमान किसके आसमान

मेरे अपने
खुद के कुछ
खुले आसमान
खो गये
पता नहीं कहाँ
याद आया
अचानक आज
शाम के समय
डूबते सूरज
और नीड़ की
ओर लौटते
पक्षियों की
चहचहाट के बीच
सीमाओं से
बंधे हुऐ नहीं
लम्बे काले
गेसुओं के बीच
चमचमाते हुऐ
चाँद को उलझा
के रखे हुऐ हो
कोई छाया सी जैसे
माँ रखती हो
अपने बच्चे को
छुपा कर अपने
आँचल की छाँव में
किसे याद
नहीं आयेगी ऐसे
अद्भुत आसमानों की
बहुत उदास हो
उठी एक शाम
के समय
किसी दिन अचानक
जब कई दिन से
महसूस करता हुआ
गुजरता आसमान
के नीचे से एक राही
जिसे नजर आ रहा हो
हर किसी का नोचना
आसमान को
अपने पैने नाखूँनो से
खीचने के लिये
उसे बस अपने
और अपने लिये
आसमान के दर्द
और चीख
उसके विस्तार में
विलीन हो जाने
के लिये हों जैसे
पता नहीं कैसे कैसे
भ्रम जन्म लेते हैं
हर सुबह और
हर शाम
और कितने
आसमानों का
हो जाता है कत्ल
दर्द ना तारे
दिखाते हैं ना चाँद
ना ही सूरज
उनका आना जाना
बदस्तूर जारी
रहता है
बेबस आसमान बेचारा
एक ऐसी चादर
भी तो नहीं हो सकता
टुकड़ा टुकड़ा फटने
के लिये चाहते हुऐ भी
बट जाना हर किसी
की सोच के
अनुसार उसके लिये ।

चित्र साभार: vector-magz.com

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

रंग देखना रंग पढ़ना रंग लिखना रंग समझना या बस रंग से रंग देना कुछ तो कह दे ना

रंग दिखाये
माँ बाप ने
चलना शुरु
किया जब
पावों पर अपने
लड़खड़ाते हुऐ
सहारे से
उँगलियों के
उनकी ही
हाथों की

रंग कम
समझ में आये
उस समय पर
आई समझ में
तितलियाँ
उड़ती उड़ती
पेड़ पौंधे फूल
एक नहीं
बहुत सारे
कौआ काला
कबूतर सफेद

अच्छाई और बुराई
खुशी और दुख:
प्यार और दुलार
रंगीन तोते मोर
और होली में
उड़ते अबीर
और गुलाल

रंग बने इंद्र के
धनुष भी पर
युद्ध कभी भी नहीं
हमेशा उमड़े
भाव रंगीन

रंगों के साथ
रंगों को देखकर
छूकर या
आत्मसात कर
बिना भीगे भी
रंगों से रंगों के
रंगो का देवत्व
कृष्ण का हरा
या राम का हरा

कभी नहीं हरा सका
रंगो को रंगों
के साथ खेलते हुऐ
जैसे अठखेलियाँ
रंगों के ही
धनुष तीर और
तलवार होने
के बावजूद
लाल रंग देख
कर कभी
याद नहीं आया
खून का रंग तक

सालों गुजर गये
ना माँ रही
ना बाप रहे
पूछें किससे
सब बताते बताते
क्यों छिपा गये
रंगों के उस रंग को

जिसे देख कर
निकलने लगें
आँसू उठे दिल
में दर्द और
महसूस होने लगे
रंग का रंग से
अलग होना
समझ में आने लगे
काले का काला
और सफेद का
बस और बस
सफेद होना
रंग का टोपी
झंडा मफलर
और कपड़ा होना

एक नटखट
परी सोच का
बेकाबू बदरंग
जवान होना
रंग जीवन
के लिये
या जीवन
रंग के लिये
हो सके तो
तुम्हीं पूछ लेना
समझ में आ जाये
कभी कुछ इसी तरह
‘उलूक’

रंग को समझना
अगर कुछ भी
तो कुछ रंगों को
मुझे भी एक बार
फिर से समझा देना ।

चित्र साभार:
background-pictures.picphotos.net

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

किसी के दिल को कैसे टटोला जाता है कहीं भी तो नहीं बताया जाता है

बहुत कोशिश
और बहुत मेहनत
करनी पड़ती है
सामने वाले
के दिल को
टटोलने के लिये
पहले तो दिल
कहाँ पर है
यही अँदाज
नहीं हो पाता है
दूसरा अपना
नहीं किसी
और का
दिल टटोलना
होता है
इसलिये
उससे पूछा भी
नहीं जाता है
डाक्टर दिल का
साथ लेकर
खोजना शुरु
करने का भी
एक रास्ता
नजर आता है
लेकिन डाक्टर
तो उस दिल की
बात समझ ही
नहीं पाता है
जिसे पान के
पत्ते की शक्लों में
ज्यादातर फिल्मों
के पोस्टरों में
या फिर किसी
स्कूल के पास
के पेड़ो की
छालों में
ज्यादातर
कीलों से
खोद कर
उकेरा जाता है
इस सब के बीच में
कई कई जमाने
गुजर जाते हैं
और बेचारा
अपना खुद
का दिल
खुद से ही
भूला जाता है
अच्छा नहीं होता है
बहुत ज्यादा
उधेड़बुन में
उलझ कर रहना
और फिर क्यों
टटोलना किसी
और का दिल
होते हुऐ अपने
खुद के पास भी
अच्छा होता है
अपने ही दिल
से पूछ लेना
अपने ही दिल
का हाल भी
कभी कभी
वो बात अलग है
खाली दिल को
टटोलने में
मजा उतना
नहीं आता है
ना ही कुछ
मिलता है
खुद के दिल को
टटोलने के बाद
वैसे भी खाली
जगहों को आखिर
कितनी बार
किसी से
खाली खाली में
बस एक खालीपन
को ढूँढने के लिये
टटोला जाता है ।

चित्र साभार: www.freelargeimages.com

रविवार, 7 दिसंबर 2014

लिखे हुऐ को लिखे हुऐ से मिलाने से कुछ नहीं होता है

अंगूठे के निशान
की तरह किसी की भी
एक दिन की कहानी
किसी दूसरे की
उसी दिन की कहानी
जैसी नहीं हो पाती है
सब तो सब कुछ
बताते नहीं है
कुछ की आदत होती है
आदतन लिख दी जाती है
अब अपने रोज की
कथा रोज लिखकर
रामायण बनाने की
कोशिश सभी करते हैं
किसी को राम
नहीं मिलते हैं
किसी की सीता
खो जाती है
रोज लिखता हूँ
रोज पढ़ता हूँ
कभी अपने लिखे
को उसके लिखे के
ऊपर भी रखता हूँ
कभी अपना
लिखा लिखाया उसके
लिखे लिखाये से
बहुत लम्बा हो जाता है
कभी उसका
लिखा लिखाया
मेरे लिखे लिखाये की
मजाक उड़ाता है
जैसे छिपाते छिपाते भी
एक छोटी चादर से
 बिवाईयाँ पड़ा पैर
बाहर निकल आता है
फिर भी सबको
लिखना पड़ता ही है
किसी को दीवार
पर कोयले से
किसी को रेत
पर हथेलियों से
किसी को धुऐं
और धूल के ऊपर
उगलियों से
किसी को कागज
पर कलम से
कोई अपने मन में ही
मन ही मन लिख लेता है
रोज का लेखा जोखा
सबका सबके पास जरूर
कुछ ना कुछ होता है
बस इसका लिखा
उसके लिखे जैसा ही हो
ये जरूरी नहीं होता है
फिर भी लिखे को लिखे
से मिलाना भी
कभी कभी जरूरी होता है
निशान से कुछ
ना भी पता चले
पर उस पर अंगूठे का
पता जरूर पता होता है ।

चित्र साभार: raemegoneinsane.wordpress.com

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

कुछ भी यूँ ही

शब्द बीजों
से उपजी
शब्दों की
लहलहाती
फसल हो या
सूखे शब्दों से
सूख चुके
खेत में पढ़े हुऐ
कुछ सूखे शब्द
बस देखते रहिये
काटने की जरूरत
ना होती है
ना ही कोशिश
करनी चाहिये
काटने की
दोनों ही
स्थितियों में
हाथ में कुछ
नहीं आता है
खुशी हो या दुख:
शब्द बोना बहुत
आसान होता है
खाद पानी हवा
के बारे में नहीं
सोचना होता है
अंकुर फूटने का
भी किसी को
इंतजार नहीं
होता है ना ही
जरूरत होती है
सोच लेने में
कोई हर्ज नहीं है
रात के देखे
सुबह होने तक
याद से उतर जाते
सपनों की तरह
पौंधे उगते ही हैं
सभी नहीं तो कुछ
कुछ उगने
भी चाहिये
अगर बीज
बीज होते हैं
अंकुरित होते
जैसे तो हमेशा
ही महसूस
किये जाते हैं
 पर
अंकुरण होने
से लेकर
पनपने तक
के सफर में
खोते भी हैं और
सही एक रास्ते पर
होते होते मंजिल तक
पहुँच भी जाते हैं
कुछ भी हो
खेत बंजर होने से
अच्छा है बीज हों भी
और पड़े भी रहें
जमीन की ऊपरी
सतह पर ही सही
दिखते भी रहे
उगें नहीं भी
चाहे किसी को
भूख ना भी लगे
और भरे पेट कोई
देखना भी ना चाहे
ना खेतों की ओर
या बीजों को
कहीं भी
खेत में या
कहीं किसी
बीज की
दुकान पर
धूल पड़े कुछ
थैलों के अंदर
शब्दों के बीच
दबे हुऐ शब्द
कुचलते हुऐ
कुछ शब्दों को
यूँ ही ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

लेखक पाठक गिनता है पाठक लेखक की गिनती को गिनता है

लिखते लिखते
कभी अचानक
महसूस होता है
लिखा ही नहीं
जा रहा है
अब लिखा
नहीं जा रहा है
तो किया क्या
जा रहा है
अपने ही ऊपर
अपना ही शक
गजब की बात
नहीं है क्या
लेकिन कुछ सच
वाकई में
सच होते हैं
क्यों होते हैं
ये तो पता नहीं
पर होते है
लिखते लिखते
कब लेखक
और पाठक दोनो
शुरु हो चुके होते हैं
कुछ गिनना
क्या गिन रहे होते हैं
ये तो नहीं मालूम
पर दिखता
कुछ नहीं है
गिनने की आवाज
भी नहीं होती है
बस कुछ लगता है
एक दो तीन चार
सतरह अठारह
नवासी नब्बे सौ
अब लेखक
कौन सी
गिनती कर
रहा होता है
गिनतियाँ
लिख लिख कर
क्या गिन
रहा होता है
पाठक क्या
पढ़ रहा होता है
लेखक का सौ
पाठक का नब्बे
हो रहा होता है
लेकिन हो
रहा होता है
ये लेखक भी
जानता है
और लेखक
की गिनतियों
को पाठक भी
पहचानता है
बस मानता नहीं है
दोनों में से एक भी
गिनतियों
की बात को
बहस जारी
रहती है
गिनतियों में
ही होती है
गिनतियाँ
गड़बड़ाती है
सौ पूरा होने
के बावजूद
अठहत्तर पर
वापिस लौट आती है
लेखक और पाठक
दोनो झल्लाते है
मगर क्या करें
मजबूर होते हैं
अपनी अपनी
आदतों से
बाज नहीं आते हैं
फिर से गिनना
शुरु हो जाते हैं
स्वीकार फिर भी
दोनों ही
नहीं करते हैं
कि गिनती
करने के लिये
गिनते गिनते
इधर उधर
होते होते
बार बार एक
ही जगह पर
गिनती करने
पहुँच जाते हैं ।

चित्र साभार: vecto.rs

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

बिना नोक की कील जैसा लिखा नहीं ठोका जा सकता सोच में कितना भी बड़ा हो हथौड़ा

हो गये होते होते
आठ पूरे और
एक आधा सैकड़ा
कुछ नहीं किया
जा सका
कैकड़े में नहीं
दिखा चुल्लू भर
का भी परिवर्तन
दुनियाँ बदल गई
यहाँ से वहाँ
पहुँच गई
उसे कहाँ बदलना
क्यों बदलना
किसके लिये बदलना
वो नहीं बदलेगा
जिसको रहना
अच्छा लगता
रहा हो हमेशा
से ही एक कैकड़ा
खुद भी टेढ़ा मेढ़ा
सोच भी टेढ़ी मेढ़ी
लिखा लिखाया
कभी नहीं हो पाया
एक सवार
खड़ा रहा पूँछ हिलाता
हुआ सामने से
हमेशा तैयार एक
उसकी खुद की
लेखनी का लंगड़ा घोड़ा
रहा लकीर का फकीर
उस लोटे की माँनिंद
पैंदी उड़ गई हो जिसकी
किसी ने मार कर कोड़ा
उसे बहुत बेदर्दी से हो तोड़ा
बेपेंदी की सोच
कुछ लोटों की लोट पोट
मवाद बनता रहा
बड़ा होता चला गया
जैसे बिना हवा भरे ही
एक पुराना छोटा सा फोड़ा
सजा कर लपेट कर
एक शनील के कपड़े में
बना कर गुलाब
छिड़क कर इत्र
हवा में हवाई फायर कर
धमाके के साथ
एक नयी सोच की
नयी कविता ने
ठुमके लगा ध्यान
अपनी ओर
इस तरह से मोड़ा
उधर का उधर रह गया
इधर का इधर रह गया
जमाने ने मुँह काले
किये हुऐ को ही
ताजो तख्त
नवाज कर छोड़ा
शुक्रिया जनाब
यहाँ तक पहुँचने का
‘उलूक’ जानता है
पर्दे के पीछे से झाँकना
जो शुरु किया था
किसी जमाने में
किसी ने आज तक
उस सीखे सिखाये को
सिखाने के धंधे का
अभी भी बाँधा हुआ है
अपने दीवान खाने पर
अकबर के गधे को
उसकी पीठ पर
लिखकर घोड़ा ।

चित्र साभार: http://www.fotosearch.com/

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

जय हो आप की मालिक

ओये क्या है?
कोई मजमा
है क्या ?
नहीं है
तो बता
है तो
वही बता
कुछ कह
तो सही
मत कह
क्या फर्क
पढ़ना है
ये सरकस
उसके लिये
नहीं है
जो बंदर है
उसके लिये है
जो सिकंदर है
आम और खास
यहाँ और वहाँ
रामपाल और
यादव सिंह
वहाँ भी और
यहाँ भी
सब जगह
एक सा
इनाम चाहिये ?
नहीं चाहिये
तो यहाँ क्यों है ?
हूँ मेरी मरजी
मेरी मरजी
ब्लागर हूँ
मालिक
क्यों है ?
पता नहीं
मालिक
ऐलैक्सा रैंक
क्या है ?
पता कर लो
मालिक
कितने हिट
होते हैं पेज में ?
ये हिट
क्या होते हैं
मालिक?
कितने इनाम
मिले हैं ?
अभी तक तो
नहीं मिले
हैं मालिक
कितने लोग
पढ़ते हैं ?
दो मालिक
अबे मालिक
कौन है
आप हो मालिक
तू कौन है
आप बताओ
ना मालिक ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शनिवार, 29 नवंबर 2014

अंधेरा बाहर का कभी भी अंदर का नहीं होता है

अचानक
किसी क्षण
आभास
होता है
और याद
आना शुरु
होता
है अंधेरा
जिसे बहुत
आसान है
देखना और
टटोलना
अपने ही अंदर
बस आँखें
बंद करिये
और शुरु
हो जाईये
बाहर उजाले
में फैले हुऐ
अंधेरे के
आक्टोपस की
भुजाओं से
घिरे घिरे
आखिर कब
तक इंतजार
किया जा
सकता है
घुटन होने
के लिये
जरूरी नहीं
है एक
बंद कमरा
धूल और धुऐं
से भरा हुआ
साँस बंद
होती हुई
सी महसूस
होना शुरु
होने लगती है
कभी किसी
साफ सुथरे
माहौल में भी
ऐसे ही समय
पर बहुत
काम आता है
अपने अंदर
का अंधेरा
जो दे सकता
है सुकून
बस जरूरत
होती है उसे
टटोलने की
हाथों की
उँगलियों से नहीं
आखों की बंद
पुतलियों से ही
बस शर्त है
आँख बंद होते ही
देखना शुरु
नहीं करना है
कोई एक सपना
अंधेरे में फैले हुऐ
सपने कभी
किसी के
अपने नहीं होते हैं
अपने ही अंदर
का अंधेरा जितना
अपना होता है
उतना बाहर
का उजाला
नहीं होता है
बस टटोलना
आना जरूरी
होता है
जिसे सीख
लेने के लिये
जरूरी होता है
कभी कुछ
देर आँखे
बंद करना
और इस
बंद करने
का मतलब
बंद करना
ही होता है ।

चित्र साभार: tessbalexander.wordpress.com

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

ब्लात्कार चीत्कार व्यभिचार पर स्मारक बनें खूब बने बनाने बनवाने में किसलिये करना है और क्यों करना है कुछ भी विचार

क्या किया जाये
बहुत बार होता है
लिखा जाये या
नहीं लिखा जाये
होता है होता है
एक पूरा आदमी
हो जाने से ही
सब कहाँ होता है
जैसे कि एक
कच्ची रह गई
सोच में हो
वही सब कुछ
जो किसी और की
सोच से बाहर
आता हुआ
तो दिखता है
पर अपनी ऊपर
की मंजिल में
ही बस उसका
पता  नहीं मिलता है
होता है होता है
जैसे कि
बहुत सी चीज
अजीब लगती होती हैं
होती हुई अपने
ही आस पास
पर बनती हैं इतिहास
बैचेनी होने लगती है
देख देख कर कभी
और कुछ कुछ होता है
इतिहास हो जाती हैं
आदत हो जाती है
फिर कुछ नहीं होता है
आदत हो गई होती है
सब कर रहे होते हैं
कुछ नहीं कह रहे होते हैं
एक सामान्य सी ही
बात हो जाती है
समझ में नहीं
भी आती है तब भी
बहुत अच्छी तरह
आ रही है देखी
और दिखाई जाती है
दिखाना पड़ता है
जैसे अपनी और
अपनों की ही
बात हो जा रही है
कहा नहीं भी जाता है
पर जमाना मान जाता है
शहीदों की चिताओं पर
लगने वाले मेलों की बात
एक इतिहास हो जाता है
जमाना बदलता है
बलात्कार व्यभिचार
अत्याचार और
ना जाने क्या क्या
सब पर ही
बनाया जाता है
स्मारक दर स्मारक
स्मारक के ऊपर
स्मारक चढ़ाया जाता है
कुछ समझ में
आता भी है
कुछ समझ में
नहीं भी आता है ।

चित्र साभार: www.clipartlogo.com

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

इंसानियत तो बस एक मुद्दा हो जाता सरे आम दिन दोपहर की रोशनी में उसे नंगा किया जाता है अंधा ‘उलूक’ देखने चला आता है

एक नहीं 
कई बार 
कहा है तुझसे 
दिन में मत 
निकला कर 
निकल भी 
जाता है अगर 
तो जो दिखता है 
मत देखा कर 
ऐसा देख कर आना 
फिर यहाँ आ 
कर बताना 
क्यों करता है 
रात का निशाचर है 
दिन वालों की 
खबर रखता है 
हर प्रहर के 
अपने नियम कानून 
बनाये जाते हैं 
दिन के दिन में 
रात के रात में 
चलाये जाते हैं 
उल्लुओं की दुनियाँ 
के कब्रिस्तान 
दिन की फिल्मों में 
ही दिखाये जाते हैं 
इंसान इंसान होता है 
इंसान ही उसे 
समझ पाते हैं 
बलात्कार होना 
लाश हो जाना 
कीड़े पड़ जाना 
लाश घर में रख कर 
आँदोलित हो जाना 
वाजिब है 
समझ में भी आता है
आक्रोश होना
अलग बात होती है
आक्रोश दिखाया जाता है
स्कूल बंद कराये जाते हैं
बाजार बंद कराये जाते हैं
बंद कराने वाले
अपने अपने रंग बिरंगे
झंडे जरूर साथ
ले कर आते हैं
अखबार वाले
समाचार बनाने आते हैं
टी वी वाले
वीडियो बनाने आते हैं
अगला चुनाव
दिमाग में होता है
राजनीतिज्ञ
वक्तव्य दे जाते हैं
सब कुछ साफ साफ
देख लेता है ‘उलूक’
दिन के उजाले में भी
घटना दुर्घटना
महज मुद्दे हो जाते हैं
सबके लिये काम होता है
मुद्दे भुनाने का
बस भोगने वाले
अपने आँसू खुद
ही पी जाते हैं
इंसान का हुआ होता
है बलात्कार और
बस इंसान ही खो जाते हैं
कहीं भी नजर नहीं आते हैं
सोच में आती है
कुछ देर के लिये एक बात
सभी अपने रंगीन
झंडों को भूलकर
किसी एक घड़ी के लिये
काले झंडे एक साथ
एक सुर में
क्यों नहीं उठा पाते हैं ।

चित्र साभर: gladlylistening.wordpress.com

बुधवार, 26 नवंबर 2014

हैवानियत है कि इंसानियत का दीमक हुई जा रही है

शर्म आती है
कहने में भी
शर्म आ रही है
सात साल की
 मासूम ‘कशिश’
जिस दरिंदगी
का हुई है शिकार
किसकी रही गलती
कहाँ हो गई कमी

इंसानियत
क्यों हैवानियत
होती जा रही है
दानवों की सी
नोच खसोट जारी है
कितनी द्रोपदी
पता नहीं कहाँ कहाँ
दुश्शाशन की
पकड़ में बस
कसमसा रही हैं
भगवान कृष्ण भी
कहाँ कहाँ पहुँचें
सारी घटनायें
सामने कहाँ
आ रही हैं
देवताओ
कुछ तो कहो
देव भूमि
पीड़ा से
छ्टपटा रही है
माँ की ममता
कितनी हो
चुकी है बेबस
गिद्धों की नोची
हुई लाश को
देख देख कर
बेहोश हुई
जा रही है
इंसान कलियुग़
में इंसानियत का
कितना करेगा
और कत्ल
सजा पता नहीं
कब और किसे
दी जा रही है
आँखें हैं नमी है
सिले हुऐ मुँह हैं
मोमबत्तियाँ
हाथों में ही
पिघलती
जा रही हैं
शर्म आ रही है
कहने में भी
शर्म आ रही है ।

चित्र साभार: imgarcade.com

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

हाथ की लकीरें माथे की लकीरें फकीरों को बता दें कि अब मिटा ली जायें

कुछ लगे
हल्की ही सही
हवा संभाली जाये
थोड़ा अपनी ओर से
फूँक मार कर
उछाली जाये
किस हाथ में
हैं लकीरें कुछ
तूफान उठाने वाली
उस हाथ वाले की
पूरी कुंडली बना
कर खंगाली जाये
फकीरों की भी
आदतें हो रही हैं
कुछ अमीरों सी
गरीबों की गलियों में
ऐशो आराम की सवारी
एक निकाली जाये
कर ले शौक से
अपने गली के
घोड़ों गधों 

और कुत्तों की
आदतों की बातें
अपनी आदतें
खुद तुझसे
कहाँ संभाली जायें
अच्छा नहीं है
बीच शहर में
बड़बड़ाना शरीफों का
निकल कर गाँवों
की तरफ कुछ
फुसफुसा के
पेड़ों से बातें
करने की आदतें
अब डाली जायें
 करने धरने में
कुछ रखा नहीं
इस जमाने में
किस्मत को
किस्मत से लड़ाने की
तरकीब सिखाने की
दुकानें हर कोने में
घर घर में बना ली जायें
लिख ही दे ‘उलूक’
तू भी दीवाने उलूक
खींच खाँच कर
छोटी बातों को कुछ
इसी तरह रोज का रोज
बात बात में बात की
टाँगे तोड़ देने की
नई नई तरकीबें
कुछ निकाली जायें ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

सोमवार, 24 नवंबर 2014

कुछ करने वाले खुद नहीं लिखते हैं अपने किये कराये पर किसी से लिखाते हैं

कुछ मत
कह ना
लिखने
दे ना

लिख ही तो
रहें हैं
कुछ
कर तो
नहीं रहे हैं

वैसे भी
जो करते हैं
वो
ना लिखते हैं
ना लिखे हुऐ
को पढ़ते हैं

गीता पर
दिये गये
कृष्ण भगवान
के कर्म
के संदेश
को अपने
दिल में
रखते है

बीच बीच
में लिखने
वाले को
याद दिलाते हैं
अपना खुद
काम पर
लग जाते हैं

करने के
साथ साथ
लिख लेने
वाले भी
कुछ हुआ
करते हैं

लिख लेने
के बाद
कर लेने
वाले कुछ
हुआ करते हैं

अब
अपवाद
तो हर
जगह ही
हुआ
करते हैं

करने वाले
को हम
कौन सा
रोक पाते हैं

करते हुऐ
देखते हैं
और
लिखने के
लिये आ
जाते हैं

लिख
लेने से
करने वालों
पर कोई
प्रभाव नहीं
पढ़ता है

उनके करने
कराने
पर कहानी
बनाने वाले
कुछ अलग
तरह के लोग
अलग जगह
पर पाये
जाते हैं

वो ही
करने वालों
के करने
पर लिखते
चले जाते हैं

जिसे
सारे लोग
पढ़ते भी हैं
और
पढ़ाते भी हैं
जिसे
सारे लोग
समझते भी हैं
और
साथ में
समझाते भी हैं

‘उलूक’ के
लिखे को
ना ये
पढ़ते हैं
ना वो
पढ़ते है

करने वालों
के करने
का लिखना
तू जा कर
पढ़ ना

कुछ नहीं
करने वाले से
तुझे क्या
लेना देना
उसे लिखने
ही दे ना ।

चित्र साभार: becuo.com

रविवार, 23 नवंबर 2014

कुछ नहीं किया जा सकता है उस बेवकूफ के लिये जो आधी सदी गुजार कर भी कुछ नहीं सीख पाता है

रोज की बात है
रोज चौंकता है
अखबार पर
छपी खबर
पढ़ कर के
फिर यहाँ आ आ
कर भौंकता है
बिना आवाज के
कुत्ते की तरह
ऐसा चौंकना
भी क्या और
ऐसा भौंकना
भी क्या
अरे क्या हुआ
अगर एक चोर
कहीं सम्मानित
किया जाता है
ये भी तो देखा कर
एक चोर ही
उसके गले में
माला पहनाता है
अब चोर चोर के
बीच की बात में
तू काहे अपनी
गोबर भरे
दिमाग की
बुद्धी लगाता है
क्या होता है
अगर किसी
बंदरिया को
अदरख़ बेचने
खरीदने का
ठेका दे भी
दिया जाता है
और क्या होता है
अगर किसी
जुगाड़ी का जुगाड़
किसी की भी
हो सरकार
सबसे बड़ा जुगाड़
माना जाता है
बहुत हो चुका
तेरा भौंकना
तेरा गला भी
लगता है
कुछ विशेष है
खराब भी
नहीं होता है
थोड़ा बहुत
कुछ भी
कहीं भी
होता है
खरखराना
शुरु हो
जाता है
समय के
साथ साथ
बदलना
क्यों नहीं
सीखना
चाहता है
खुद का समय
तो निकल गया
के भ्रम से भ्रमित
हो भी चुका है
तो भी अपनी
अगली पीढ़ी को
ये कलाबाजियाँ
क्यों नहीं
सिखाता है
जी नहीं पायेगी
मर जायेगी
तेरी ही आत्मा
गालियाँ खायेगी
तेरी समझ में
इतना भी
नहीं आता है
कौन कह रहा है
करने के लिये
सिखाना है
समझा कर
समझने के लिये
ही उकसाना है
समझने के लिये
ही बताना है
चोरी चकारी
बे‌ईमानी भ्रष्टाचारी
किसी जमाने में
गलत मानी
जाती होंगी
अब तो बस
ये सब नहीं
सीख पाया तो
गंवारों में
गिना जाता है
वैसे सच तो ये है
कि करने वालों
का ही कुछ
नहीं जाता है
नहीं करने वाला
कहीं ना कहीं
कभी ना कभी
स्टिंग आपरेशन
के कैमरे में
फंसा दिया जाता है
इसी लिये ही तो
कह रहा है ‘उलूक’
गाँठ बाँध ले
बच्चों को अपने ही
मूल्यों में ये सब
बताना जरूरी
हो जाता है
करना सीख
लेता है जो
वो तो वैसे भी
बच जाता है
नहीं सीख पाता है
लेकिन जानता है
कम से कम
अपने आप को
बचाने का रास्ता तो
खोज ही ले जाता है ।

चित्र साभार: poetsareangels.com

शनिवार, 22 नवंबर 2014

लिखता लिखता ही पढ़ना भी सीख लेगा

जिस दिन
सीख लेगा
लिखना
बता उस दिन
क्या लिखेगा
अभी बताने
में भी कोई
हर्ज नहीं है
कविता
लिखेगा
या फिर कोई
गजल
लिखेगा
तब तक
ऐसा वैसा
भी लिखेगा
वो भी चलेगा
लिखना सीखने
के लिये जो
भी लिखेगा
वही तो
एक दिन
लिखना
सिखाने
के लिये
भी लिखेगा
लिखना एक
अलग बात है
लिखने वाला
बस लिखेगा
पढ़ना एक
अलग बात है
पढ़ने वाला
बस पढ़ेगा
लिखना पढ़ना
साथ करने
की कोशिश
जो भी करेगा
ना लिख
पायेगा कुछ
ना ही पढ़ेगा
लिखना सीख
ले कुछ
लिख लिखा
कर कुछ
दिनों तक
लिखना
सीख लेगा
जब ‘उलूक’
पूरा का पूरा
आधा
कम से कम
पढ़ना भी
सीख लेगा ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

आज तो बस चिंगारी आग और राख की बात करनी है

चिंगारियाँ
उठने की बात
आग़ लगने
की बात
बात बात में
ही करनी है
इससे भी
पूछना है
उससे भी
पूछना है
आग से भी
पूछ कर ही
कुछ सुलगने
सुलगाने की
बात करनी है
जलाना कितना भी है
जलाना कुछ भी है
बस जलाने की
बात करनी है
आग लगनी है
ना लगानी है
बस आग दिखने
और दिखाने की
बात करनी है
धुँआ दिखना नहीं है
राख बचनी नहीं है
दिल को
जलना नहीं है
तूफान आने की
बात करनी है
कत्ल होना नहीं है
खून बहना नहीं है
क्राँतिकारियों की
बात करनी है
बहुत हो चुकी
इंसानों की बातें
पामेरियन ऐप्सो
एल्शेशियन की
बात करनी है
बहुत बेच दिये
आदमी ने आदमी
अब लाशें दफना कर
उनकी मूर्तियाँ
लगवाकर
कमीशन बनाने
की बात करनी है
सालों हो गये तुझको
बातें बनाते ‘उलूक’
सबको पता है
तुझे तो बस
माचिस की
बात करनी है
आग होती भी है
आग लगती भी है
मत करो जुल्म
उसपर बड़ा
उसे भी कभी
थोड़ा सा कुछ
सोने जाने की
बात करनी है ।


चित्र साभार: www.dreamstime.com

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

जानवर पढ़ के इस लिखे लिखाये को कपड़ा माँगने शायद चला आयेगा

नंगों के लिये
कपड़े लिख देने
से ढका कुछ भी
नहीं जायेगा
कुछ नहीं किया
जा सकता है
कुछ बेशर्मियों
के लिये जिन्हें
ढकने के लिये
पता होता है
कपड़ा ही छोटा
पड़ जायेगा
आँखों को ढकना
सीखना सिखाना
चल रहा होता है
सब जगह जहाँ
मालूम होता है
अच्छी तरह
एक छोटे से
कपड़े के टुकड़े
से भी काम
चल जायेगा
दिखता है सबको
सब कुछ
दिख गया लेकिन
किसी से नहीं
कहा जायेगा
ऐसे देखने वालों की
आँखों का देखना
देखने का चश्मा
कहाँ मिल पायेगा
दिखने को लिखना
बहुत ही आसान है
मगर यहीं पर हर कोई
गंवार और अनपढ़
बन जायेगा
लिखता रहेगा
रात भर अंधेरे को
‘उलूक’ हमेशा ही
सवेरे के आने तक
सवेरा निकलेगा
उजाले के साथ
आँखों में धूप का
चश्मा बहुत काला
मगर लगायेगा
जल्दी नहीं आयेगा
समझ में कुछ
कुछ समय खुद ही
समय के साथ
सिखायेगा
नंगेपन को
ढकना नहीं है
लिखना सीखना
है ज्यादा जरूरी
लिखते लिखते
नंगापन ही एक
फैशन भी हो जायेगा
कपड़ा सोचना
कपड़ा लिखना
कपड़े का इतिहास
बने या ना बने
बंद कुछ पढ़ने से
खुला सब पढ़ना
हमेशा ही अच्छा
कहा जायेगा ।

चित्र साभार: www.picsgag.com

बहुत कुछ हो रहा होता है पर क्या ? यही बस पता नहीं चल रहा होता है

बहते हुऐ पानी
को देखती हुई
दो आँखें इधर से
गिन रही होती हैं
पानी के अंदर
तैरती मछलियाँ
और उधर से
दो और आँखें
बहते हुऐ पानी
को गिन रही होती हैं
मछलियाँ
गिनना कहना
तो समझ में
आ रहा होता है
उसे भी जो पानी में
देख रहा होता है
और उसे भी जो
गिनती नहीं
जानता है पर
मछलियाँ
मछलियाँ होती हैं
अच्छी तरह
पहचानता है
पानी को गिनने
की बात करना
पानी को कोई
गिन रहा है जैसा
किसी को कहते
हुऐ सुनना और
पानी गिनने की
बात पर कुछ सोचना
किसी को भी
अजीब लग सकता है
लेकिन ऐसी ही
अजीब सी बातें
एक नहीं कई कई
रोज की जिंदगी
में आने लगी हैं
सामने से
इस तरह की बातों को
कोई किस से कहे
कौन सिद्ध करे
अपने दिमाग का
दिवालियापन
बहुत से लोग अब
यही सब करते हैं
समझते हैं और
बहुत आसान होता है
ऐसा महसूस होता है
क्योंकि ऐसा एक नहीं
कर रहा होता है
बल्कि एक दो को
छोड़ कर हर कोई
इसी चीज को लेकर
एक दूसरे को समझ
और समझा रहा होता है
‘उलूक’ परेशान होकर
पानी के सामने
अपने कैल्कुलेटर की
पुरानी बैटरी को
नई बैटरी से
बदल रहा होता है
सारा का सारा पानी
बह कर उसके ही
सामने से निकल
रहा होता है
क्या किया
जा सकता है
कुछ लोगों की
फितरत ऐसी
ही होती है
वो कुछ नहीं
कर सकते हैं
और उनसे
कभी भी
कुछ भी
नहीं होता है ।

चित्र साभार: cwanews.com

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

कहने को कुछ नहीं है ऐसे हालातों में कैसे कोई कुछ कहेगा

दिख तो रहा है
अब मत कह देना
नहीं दिख रहा है
क्यों दिख रहा है
दिखना तो
नहीं चाहिये था
क्या हुआ ऐसा
दिखाई दे गया
और जो दिखा
वही सच है
ऐसे कई सच
हर जगह
सीँच रहे हैं
खून से
जिंदा लाशों को
और बेशरम लाशें
खुश हैं व्यस्त हैं
बंद आँखों से
मरोड़ते हुऐ
सपने अपने भी
और सपनों के भी
ये दिखना दिखेगा
कोई कुछ कहेगा
कोई कुछ कहेगा
मकान चार खंभों पे
टिका ही रहेगा
खंभा खंभे
को नोचेगा
एक गिरेगा
तीन पर हिलेगा
दो गिरेंगे
दो पर चलेगा
लंगड़ायेगा
कोई नहीं देखेगा
लंगड़ा होकर भी
गिरा हुआ खंभा
मरेगा नहीं
खड़ा हो जायेगा
फिर से मकान
की खातिर नहीं
खंभे की खातिरदारी
के लिये
ऐसे ही चलेगा
कल मकान में
जलसा मिलेगा
दावत होगी
लाशें होंगी
मरी हुई नहीं
जिंदा होंगी
तालियाँ बजेंगी
एक लाल गुलाब
कहीं खिलेगा
आँसू रंगहीन
नहीं होंगे
हर जगह रंग
लाल ही होगा
पर लाली नहीं होगी
खून पीला हो चुकेगा
कोई नहीं कुछ कहेगा
कुछ दिन चलेगा
फिर कहीं कोई
किसी और रंग का
झंडा लिये खड़ा
झंडे की जगह ले लेगा
खंबा हिलेगा
हिलते खंबे को देख
खंबा हिलेगा
मकान में जलसा
फिर भी चलेगा।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

सोमवार, 17 नवंबर 2014

खुद का आईना है खुद ही देख रहा हूँ

अपने आईने
को अपने
हाथ में लेकर
घूम रहा हूँ
परेशान होने
की जरूरत
नहीं है
खुद अपना
ही चेहरा
ढूँढ रहा हूँ
तुम्हारे पास होगा
तुम्हारा आईना
तुमसे अपने
आईने में कुछ
ढूँढने के लिये
नहीं बोल रहा हूँ
कौन क्या
देखता है जब
अपने आईने में
अपने को देखता है
मैंने कब कहा
मैं भी झूठ
नहीं बोल रहा हूँ
खयाल में नहीं
आ रहा है
अक्स अपना ही
जब से बैठा हूँ
लिखने की
सोचकर
उसके आईने में
खुद को देखकर
उसके बारे में
ही सोच रहा हूँ
सब अपने
आईने में
अपने को
देखते हैं
मैं अपने आईने
को देख रहा हूँ
उसने देखा हो
शायद मेरे
आईने में कुछ
मैं उसपर पड़ी
हुई धूल में
जब से
देख रहा हूँ
कुछ ऐसा
और
कुछ वैसा
जैसा ही
देख रहा हूँ ।

चित्र साभार: vgmirrors.blogspot.com

जरूरी है याद कर लेना कभी कभी रहीम तुलसी या कबीर को भी



बहुत सारी तालियाँ
बजती हैं हमेशा ही
अच्छे पर अच्छा
बोलने के लिये
इधर भी और
उधर भी
 नीचे नजर
आ जाती हैं
दिखती हैं
दूरदर्शन में
सुनाई देती हैं
रेडियो में
छपती हैं
अखबार में
या जीवित
प्रसारण में भी
सामने से खुद
के अपने ही
शायद बजती
भी हों क्या पता
उसी समय
कहीं ऊपर भी
अच्छा बोलने
के लिये अच्छा
होना नहीं होता
बहुत ही जरूरी भी
बुरे को अच्छा
बोलने पर नहीं
कहीं कोई पाबंदी भी
अच्छे होते हैं
अच्छा ही देखते हैं
अच्छा ही बोलते हैं
ज्यादातर होते ही हैं
खुद अपने आप में
लोग अच्छे भी
बुरी कुछ बातें
देखने की उस पर
फिर कुछ कह देने की
उसी पर कुछ कुछ
लिख देने की
होती है कुछ बुरे
लोगों की आदत भी
अच्छा अच्छा होता है
अच्छे के लिये
कह लेना भी
और जरूरी भी है
बुरे को देखते
बुरा कुछ कहते
रहना भी
करते हुऐ याद
दोहा कबीर का
बुरा जो देखन मैं चला
हर सुबह उठने
के बाद और
रात में सोने से
पहले भी ।

 चित्र साभार:
funny-pictures.picphotos.net

शनिवार, 15 नवंबर 2014

कोई नई बात नहीं है बात बात में उठती ही है बात

बड़ी असमंजस है
मुँह से निकली
नहीं बात
बात उठना
शुरु हो जाती है
मायने निकलने की
और मायने
निकालने की
बात की तह में
पहुँचने की
बात को बात की
जगह पर पहुँचाने
की छिड़ ही
जाती है बहस भी
खुद की खुद से ही
नहीं तो सामने
आने वाले किसी
भी शख्स से
अब ढपली
जब सबकी अपनी
अपनी अपनी
जगह पर ही
होती है बजनी
तो राग किसी का
कौन काहे लेना
चाहेगा उधार
नकद में
बिना सूद का
जब पड़ा हुआ हो
सबके पास अपना
अपना कारोबार
कल मित्र के
समझने समझाने
पर कह बैठा
घर पर जब
यूँ ही एक बात
चढ़ बैठे
समझाने वाले
बातों का हंटर
उठाये अपने
अपने हाथ
काहे समझाना
चाहते हो
सब कुछ सब को
जितना ना आये
समझ में उतना
रहता है चैन
क्यों सब को
बनाना चाहते हो
अपना जैसा
समझदार और बैचेन
बात को उठा देने
के बाद बात को
उठने क्यों नहीं देते
जन धन योजना
की तरह
बिना पैसे के खाते
और उसपर मिलने
वाले एक लाख
रुपिये के
दुर्घटना बीमा से
अपनी और अपनी
सात पुश्तों का
भविष्य सुरक्षित
क्यों नहीं कर लेते
अब बात उठी है
समझी किसने है
सब खुश है
और हैं खुशहाल
और आप लगे हुऐ हैं
समझाने में
क्यों करना चाहते है
सबको बस एक बात
के लिये बेहाल
खुश रहने का मंत्र
गाँठ बांध लीजिये
जनाब
बात सुनिये
बात करिये
बात लिख
भी लिजिये
कोई नहीं
रोक रहा है
बात समझने
समझाने की
बात मत करिये
बस इसी बात
से ही होना शुरु
होता है बबाल ।

चित्र साभार: teacherzilla.wordpress.com

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

मित्रों का वार्तालाप


भाई
आपका लिखा
पढ़ता हूँ पर
समझ में ही
नहीं आता है
समझ में नहीं
आने के बावजूद
भी रोज पढ़ने
चला आता हूँ
सोचता हूँ शायद
किसी दिन कुछ
समझ में
आ ही जाये
लेकिन कुछ भी
अपने हाथ में
आया हुआ
नहीं पाता हूँ
जब यहाँ से
पढ़ पढ़ा कर
हमेशा कि तरह
खाली हाथ
खाली दिमाग
लौट जाता हूँ
ऐसा कुछ लिखना
जरूरी है क्या
जो पचाना तो दूर
खाया भी
नहीं जाता है ?

जरूरी नहीं है
भाई जी
मजबूरी है
समझ में मेरे भी
बहुत कुछ
नहीं आता है
कोशिश करता हूँ
समझने की बहुत
जितना कुछ है
सोचने समझने का
जुगाड़ पूरा ही
लगाता हूँ
जब क्यों हो रहा है
होता हुआ
अपने सामने से
होते हुऐ को
देखता चला जाता हूँ
जो नहीं होना चाहिये
उस होने के लिये
हर किसी को
उस ओर खड़ा
नहीं होने के
साथ पाता हूँ
तो अंत में
थक हार कर
नहीं समझे हुऐ को
लिख लिखा कर
जमा करने
यहाँ चला आता हूँ
सोचता हूँ
आज नहीं समझ में
आने वाली कच्ची बात
किसी दिन शायद
पक कर पूरी आ जायेगी
हो जायेगी खाने लायक
और होगी अपने ही हाथ
सोच सोच कर
बस इसी तरह का
एक खाता यहाँ
बनाये चला जाता हूँ
पर ये ही समझ
नहीं पाता हूँ
समझ में ना आने
के बाद भी कुछ भी
तुमको रोज
यहाँ आकर
लिखे को पढ़ चुके
लोगों की सूची में
क्यों और
किसलिये पाता हूँ ?


अरे कुछ नहीं
ऐसे ही मित्र ‘उलूक’
मैं भी कौन सा
तुम को उलझाना
चाहता हूँ
कुछ हो गया होता है
जब पता चलता है
तुमने कुछ लिखा होगा
उसपर जरूर
सोच कर बस यही
पता करने को
चला आता हूँ
पर तुम्हारे लिखने
में कुछ भी नहीं मिलता
क्यों लिखते हो
इस तरह का जो
ना आये किसी की
समझ में कभी भी
यहाँ से जाने के बाद
बस सोचता और
सोचता ही
रह जाता हूँ
जब नहीं सुलझती
है उलझन तो
पूछने चला आता हूँ ।

चित्र साभार: www.gograph.com

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