उलूक टाइम्स: पुराना
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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2019

पुरानी कुछ इमारतें कई बार पैदा की जाती है हर बार एक नया नाम देकर उन्हें फिर लावारिस छोड़ दिया जाता है


कुछ की
किस्मत में
नहीं होता है
खुद जन्म लेना

उन्हें पैदा
किया जाता है

नश्वर
नहीं होते हैं
पर
मरने का उनके
मौका भी
नहीं आता है

जरूरी नहीं है
जीवन होना
सब कुछ में

कुछ निर्जीव
चीजों को भी
आदत हो जाती है

झेलना
जीवन को

जिसका असर
समय समय पर
देखा भी जाता है

कुछ
इमारतों के
पत्थर

आईना
हो जाते हैं

समय
का चेहरा
उनमें
बहुत साफ
नजर आता है

इतिहास
लिख देना
किसी चीज का
अलग बात हो जाती है

लिखने वाला
सामान्य मनुष्य ही हो
जरूरी नहीं हो जाता है

पूर्वाहग्रह ग्रसित होना
किसी
मानसिक रोग
की
श्रेणी में

कहीं
 लिखा हुआ
नजर नहीं आता है

ना नया
गृह बनता है
ना गृह प्रवेश होता है

कुछ घरों का नाम
समय के साथ
बदल दिया जाता है

जन्मदिन
मनाया जाता है
नगाढ़े भी बजते हैं
ढोल भी पीटे जाते हैं
अखबार के पन्ने को भी
रंग दिया जाता है

‘उलूक’
कुछ लावारिस

ऐसी ही
किस्मत लेकर
पैदा होते हैं

हर बार
जन्म देने के बाद
एक लम्बे समय के लिये

फटे हाल
होने के लिये
उन्हें छोड़ दिया जाता है।

चित्र साभार: https://making-the-web.com/university-cliparts

रविवार, 17 जून 2018

‘उलूक’ तू दो हजार में उन्नीस जोड़ या इक्कीस घटा तेरी बकवास करने की आदत का सरकार पेटेंट कराने फिर भी नहीं जा रही है

झंडों को 
हो रही

इधर की
बैचेनी

कुछ कुछ
समझ में
आ रही है

शहर में
आज एक
नयी भीड़

एक नये
रंग के
एक नये
झंडे के नीचे

एक नया
झंडा गीत
गा रही है

पुराने
झंडों के
आशीर्वादों
से भर चुके

झंडा
बरदारों
को नींद से

लग रहा है
जैसे
नयी हवा
जगा रही है

कुछ उस
रंग के झंडे
के नीचे से
कुछ ला कर

कुछ इस
रंग के झंडे
के नीचे से
कुछ ला कर

कुछ बेरंगे
हो चुके रंगों
में नया रंग

भरने
जा रही है

एक नये रंग
के झंडे का
पुराने झंडों
में से ही

मिल जुल कर
पैदा हो जाने
की खबर

कल के
अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
सुबह सुबह
आने जा रही है

अवसरवादियों
की बाँछें
फिर से एक बार
और जोर लगा कर
मुस्कुरा रही हैं

इस झंडे को
उठाने वालों को
उस झंडे को
उठाने वालों से

मिलजुल कर
रहने का अभ्यास
नये झंडे तले
करा रही हैं

लाल गेरुआ
नीला पीला
हरा बैगनी
की बात
करने की
रुत जा रही है

मेला नजदीक है
सुनाई दे रहा है

झंडों की
नई दुकाने
सजाने के लिये

फड़ों
की लाईन
लगायी
जा रही है

झंडों के
ठेकेदारों की
नयी योजना से

बेपेंदे के लौटों
के लुढ़कने की
आदत सुना है
बदलने जा रही है

झंडे खुश हैं
झंडा बरदार
भी खुश हैं

धीरे धीरे
हौले हौले
टोपियाँ
इस सर से
उस सर
की ओर
खिसकायी
जा रही हैं

‘उलूक’
तू दो हजार
में उन्नीस
जोड़ या
इक्कीस घटा

तेरी
बकवास
करने की
आदत का
सरकार
पेटेंट कराने
फिर भी
नहीं जा
रही है।

 चित्र साभार: www.dreamstime.com

मंगलवार, 8 मई 2018

टिप्पणियों पर बिफरते नये शेर को देख कर पुराने हो चुके भेड़ को कुछ तो कह देना हो रहा है

सब कुछ
एक साथ
नहीं दौड़ता है

टाँगें
कलम हो जायें
बहुत कम होता है

वजूका
खेत के बीच में
भी हो सकता है
कहीं किनारे पर
बस यूँ ही खड़ा
भी किया होता है

कहने लिखने को
रोज हर समय
कुछ ना कुछ
कहीं किसी
कोने में
जरूर होता है

लिखे हुऐ
सारे में से
जान बूझ कर
नहीं लिखा गया
कहीं ना कहीं
किसी पंक्ति
के बीच से
झाँक रहा होता है

समुन्दर
लिख लेने
के बाद
नदी लिखने
का मन
किसी का
होता होगा
पता कहाँ
चलता है

कलम की
पुरानी
स्याही को
नाले के पास
लोटे में धोना
और फिर
चटक धूप में
सुखा कर
नयी स्याही
भर लेना

एक पुराना
मुहावरा
हो चुका
होता है

नये मुल्ले
और
प्याज पर
लिखने से
दंगा भड़कने
का अंदेशा
हो रहा
होता है

रोज के
रोजनामचे
को लिखने
वाले ‘उलूक’
का दिल

साप्ताहिक
हो लेने
पर भी
बाग बाग
हो रहा
होता है

लिखना
लिखाना
और
उस पर
टिप्पणी
पाने की
लालसा पर

हमेशा
की तरह
नये सिपाही
का बंदूक
तानने पर

अपनी
पुरानी
जंक लगी
बन्दूक से
खुद का
फिर से
सामना
हो रहा
होता है

अपना लिखना
अपने लिखे को
अपना पढ़ लेना
समझ में आ जाना
सालों साल में

पुराने प्रश्न से
जैसे नया
सामना हो
रहा होता है ।

शनिवार, 17 जून 2017

अट्ठाईस लाख का घपला पुराना हो भी अगर घर का ‘उलूक’ किस लिये बिना सबूत नया नया रो रहा होता है

सोच कर
लिखे गये
कुछ को
पढ़ कर
कोई 
कुछ भी
सोच रहा
होता है

लिखे हुऐ पर
लिखने वाला
समय 
नहीं
लिख
 रहा
होता है 


किसे
पता होता है
सोचने से
लिखने तक
पहुँच लेने में
कितना समय
लग रहा होता है

होने का क्या है
हो चुका कुछ
आज ही नहीं
हो रहा होता है

पता हेी
नहीं होता है
बहुत बार
पहले भी
कुछ कुछ
ऐसा ही
कई बार
हो रहा
होता है

सोच कर
लिखना
कई बार
लगता है
सच में बहुत
बुरा हो
रहा होता है

अपने शहर
की बात
अपने शहर
के लोगों से
करना ठीक
नहीं हो
रहा होता है

खून हो
रहा होता है
किसी के
हाथों से
खुले आम
हो रहा
होता है
अपना ही
कोई कर
रहा होता है
कोई कुछ भी
नहीं कहीं
कह रहा
होता है

मरने वाले
शहर में
रोज ही मर
रहे होते हैं
एक दो
बाजार में
अगले दिन
दिखने वाला
उसके जैसे
कोई भी
भूत नहीं
हो रहा
होता है

लिखना बेवफाई
बेवफाओं के देश में

इस से बढ़ कर
बड़ा गुनाह
कोई नहीं
 हो रहा होता है

हिस्सेदारी में
नहीं लगे
लोगों को
कहने का
कोई
हक नहीं
हो रहा होता है

लुटेरे सफेदपोशों
की लूट का हिस्सा
उनके अपनों में
बट रहा होता है

रविश को भी
मिल रही
हैं गालियाँ
लोकतंत्र का
सबूत बन रही हैं
गाँधी भेी
गालियाँ
खा रहा है
इससे अच्छा
कुछ भी कहीं
नहीं हो
रहा होता है

 ‘उलूक’
बहुत ही गंदी
आदत होती है
तेरे जैसे
कहने वालों की
बहुत सा
बहुत अच्छा
रोज ही जब
अखबारों में
रोज ही हो
रहा होता है ।

चित्रसा भार: Credit Union Times

सोमवार, 29 मई 2017

बहुत तेजी से बदल रहा है इसलिये कहीं नहीं मिल रहा है

सुना है
बहुत कुछ
बहुत तेजी से
बदल रहा है

पुराना
कुछ भी
कहीं भी
नहीं चल
रहा है

जितना भी है
जो कुछ भी है
सभी कुछ
खुद बा खुद
नया नया
निकल रहा है

लिखना नहीं
सीख पाया
है बेवकूफ
तब से अब तक

लिखते लिखते
अब तक
लिखता
चल रहा है

बेशरम है
फिर से
लिख रहा है

कब तक
लिखेगा
क्या क्या
लिखेगा
कितना
लिखेगा
कुछ भी
पता नहीं
चल रहा 
है

पुराना
लिखा सब
डायरी से
बिखर कर

इधर
और उधर
गिरता हुआ
सब मिल
रहा है

गली
मोहल्ले
शहर में
बदनाम
चल रहा है

बहुत दूर
कहीं बहुत
बड़ा मगर
नाम चल
रहा है

सीखना
जरूरी
हो रहा है

लिख कर
बहुत दूर
भेज देना

गली
में लिखा
गली में

शहर
में लिखा
शहर में

बिना मौत
बस कुछ
यूँ ही
मर रहा है

लत लग
चुकी है
‘उलूक’ को

बाल की खाल
निकालने की

बाल मिल
रहा है मगर

खाल
पहले से
खुद की
खुद ही
निकाला हुआ
मिल रहा है ।

चित्र साभार: Inspirations for Living - blogger

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

कोई समझे कोई ना समझे कह देना जरूरी होता है

जो भी हो रहा होता है
सब अच्छे के लिये
ही हो रहा होता है
फैशन बन चुका है
अब ऐसा ही कुछ
बस कह देना होता है
अगर कोई रो रहा होता है
बस आदतन रो रहा होता है
जो दिखता है तुझे सामने से
उसकी बात कोई भी कहीं
नहीं कर रहा होता है
इसका मतलब होता है
और बहुत ही साफ होता है
वहम हो रहा होता है
और बस तुझे ही
हो रहा होता है
सब ही जा रहे होते हैं
उस तरफ कहीं
किसी ओर खुशी से
बस तेरा ही मुँह
उतरा हुआ और
रास्ता किसी
दूसरी तरफ होता है
नये जमाने के नये
घर के बारे में सोचना
अच्छा नहीं होता है
पुराने खंडहर को
झाड़ पोछ कर चूना
लगाते रहने से ही
बस फायदा होता है
और बहुत हो रहा होता है
दो चार लोग
कर लेते हैं फैसला
कब्र खोदने की
पैदा होने वाले
किसी सवाल की
दफन करने के बाद
जिस पर मिट्टी डालने
का न्योता सभी के
पास दिख रहा होता है
समझने वाले सब
समझते हैं देखकर
वो सब जो उनके
आस पास हो रहा होता है
होता रहे कुछ भी
उल्टा पुल्टा गली में
किसी के भी सामने से
हर कोई होता है देशप्रेमी
आँखें बंद कर अपनी
पूरे देश के बारे में ही
सोच रहा होता है
सभी को देखनी होती है
भूख अपनी पेट अपना
अपने लिये ही ‘उलूक’
गया वो जमाना कभी का
किसी जमाने में
कहीं कुछ होता देख कर
कह देने वाला कोई
बेवकूफ ही होता है ।

चित्र साभार: www.ihomedesign.info

शनिवार, 3 जनवरी 2015

नया साल नई दुल्हन चाँद और सूरज अपनी जगह पर वही पुराने

जुम्मा जुम्मा
ले दे के
खीँच खाँच के
हो गये
तीन दिन
नई दुल्हन के
नये नये
नखरे
जैसे मेंहदी
लगे पाँव
दूध से
धुले हुऐ
अब तेज भी
कैसे चलें
पीछे से
पुराने दिन
खींचते हुऐ
अपनी तरफ
जैसे कर रहे हों
चाल को
और भी धीमा
कोई क्या करे
जहाँ रास्ते को
चलना होता है
चलने वाले को
तो बस खड़े
होना होता है
वहम खुद के
चलने का
पालते हुऐ
तीन के तीस
होते होते
मेंहदी उतर
जाती है
कोई पीछे
खींचने वाला
नहीं होता है
चाल
अपने आप
ढीली
हो जाती है
तीन सौ पैंसठ
होते होते
आ गया
नया साल
जैसे नई दुल्हन
एक आने
को तैयार
हो जाती है
चलने वाले को
लगने लगता है
पहुँच गया
मंजिल पर
और
आँखे कुछ
खोजते हुऐ
आगे कहीं
दूर जा कर
ठहर जाती हैं
कम नहीं
लगता अपना
ही देखना
किसी चील
या
गिद्ध के
देखने से
वो बात
अलग है
धागा सूईं
में डालने
के लिये
पहनना
पड़ता हो
माँग कर
पड़ोसी से
आँख का चश्मा
कुछ भी हो
दुनियाँ चलती
रहनी है
पूर्वाग्रहों
से ग्रसित
‘उलूक’
तेरा कुछ
नहीं हो सकता
तेरे को शायद
सपने में भी
नहीं दिखे
कभी
कुछ अच्छा
दिनों की
बात रहने दे
सोचना छोड़
क्यों नहीं देता
अच्छा होता है
कभी चलते
रास्तों से
अलग होकर
ठहर
कर देखना
चलता हुआ
सब कुछ
साल गुजरते
चले जाते हैं
नये सालों
के बाद
एक नये
साल से
गुजरते
गुजरते ।

चित्र साभार: galleryhip.com

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

नया साल कुछ नये सवाल पुराने साल रखे अपने पास पुराने सवाल

शायद कोई
चमत्कार होगा
और जरूर होगा
पहले कभी
नहीं हुआ तो
क्या होता है
इस बार होगा
पक्का होगा
असरदार होगा
हो सकता है
दो या तीन
बार होगा
हमेशा होते
रहने की आशा
या सोच नहीं
पक रही है कहीं
खाली दिमाग
के किसी
बिना ईधन
के चूल्हे में
दो या तीन
नहीं भी सही
एक ही बार सही
क्या पता
वो इस बार होगा
हर साल आता है
नया साल
पुराने साल
के जाते ही
इस बार भी
आ गया है
आज ही आया है
पुराना हिसाब
वहीं पीछे
छोड़ के आया है
या बैंक के खाते
के हिसाब की तरह
कुछ कुछ काम
का आगे को भी
सरकाया है
पहला पहला
दिन है साल का
अभी हाथ में
ही दिख रही है धूनी
जमाने का मौका
ही नहीं मिल पाया है
पिछले साल भी
आया था एक साल
इसी जोशो और
खरोश के साथ
जानते थे जानने वाले
चलेगा तो चलेगा
आँखिर कितना
बस एक ही तो साल
जमे जमाये
इस से पहले
क्यों नहीं कर
दिये जायें खड़े कुछ
अनसुलझे सवाल
उलझा इतना
कि साफ साफ
महसूस हुआ साल भर
कि सँभलते संभलते
भी नहीं संभल पाया है
नये साल की हो चुकी है
आज से शुरुआत
बस यही पता नहीं
कुछ चल पाया है
कि समझदार है बहुत
और सवाल अनसुलझे
पिछले साल के
अपने साथ में
ले कर आया है
या बेवकूफ है
‘उलूक’ तेरी
तरह का ही एक
खुद उलझने के
लिये सवालों से
नये सवालों
का न्योता
सवाल खड़े
करने वालों को
पिछले साल से ही
दे कर आया है ।

चित्र साभार: www.happynewyear2015clipart.in
   







रविवार, 28 दिसंबर 2014

फिसलते हुऐ पुराने साल का हाथ छोड़ा जाता नहीं है

शुरु के सालों में
होश ही नहीं था

बीच के सालों में
कभी पुराने साल
को जाते देख
अफसोस करते
और
नये साल को
आते देख
मदहोश होकर
होश खोते खोते
पता ही नहीं चला
कि
बहुत कुछ खो गया

रुपिये पैसे की
बात नहीं है
पर बहुत कुछ
से कुछ भी
नहीं होते होते
आदमी
दीवालिया हो गया

पता नहीं
समझ नहीं पाया
उस समय समझ थी
या
अब समझ खुद
नासमझ हो गई

साल के
बारहवें महीने
की अंतिम तारीख
आते समय
कुछ अजीब अजीब
सी सोच
सबकी होने लगी है
या
मेरे ही दिमाग
की हालत
कुछ ऐसी
या वैसी
हो गई है

पुराने साल
को हाथ से
फिसलते देख
अब रोना
नहीं आता है

नये साल के
आने की
कोई खुशी
नहीं होती है

हाथ में
आता हुआ
एक नया हाथ
जैसे पकड़ा
जाता नहीं है

पता होता है
तीन सौ
पैंसठ दिन
पीछे के
जाने ही थे
चले गये हैं

तीन सौ पैंसठ
आगे के आने है
आयेंगे ही शायद
आना शुरु हो गये हैं

खड़ा भी
रहना चाहो
बीच में
सालों के
बिना
इधर हुऐ
या बिना
उधर हुऐ ही
ऐसा किसी
से किया
जाता नहीं है

इक्तीस की रात
कही जा रही है
कई जमानों से
कत्ल की रात
यही राज तो
किसी के
समझ में
आता नहीं है
जिसके आ
जाता है
वो भी
समझाता नहीं है ।

चित्र साभार: community.prometheanplanet.com

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

जब नहीं दिखता है एक ‘ब्लागर’ कभी दूसरे ‘ब्लागर’ को बहुत दिनों तक

होता कुछ नहीं है वैसे
जब नहीं दिखता है
एक ब्लागर को
एक दूसरा ब्लागर यहाँ
जो दिखा करता था
कभी रोज ही
आता और जाता हुआ
यहाँ से वहाँ
और वहाँ से यहाँ
आना और जाना
तो चलता रहता है
इसका और उसके
शब्दों का वहाँ से यहाँ
और यहाँ से वहाँ
एक रोज आता जाता है
एक कभी आता है
एक कभी जाता है
रोज आने जाने
वाले को रोज
आने जाने वालों से
कोई परेशानी
नहीं होती है
परेशानी तब होती है
जब एक रोज
आने जाने वाला
अपने अगल बगल से
रोज आते जाते हुऐ को
बहुत दिनों से
आता हुआ नहीं
देख पाता है
दिन गुजरते हैं
रास्ते में कहीं पर
एक पुराना दिखता है
कहीं एक पुराने
के साथ एक
नया बिकता है
कहीं दो नयों के संग
एक पुराना दिखता है
ढूँढना चाहने वाले
ढूँढते भी हैं
एक का निशान
दूसरे के घर मिलता है
दूसरा किसी तीसरे
के घर कुछ ना कुछ
छोड़ कर चलता बनता है
अब लिखने लिखाने
की दुनियाँ है
यहाँ रोज एक नया
रिवाज कोई ना कोई
कहीं ना कहीं सिलता है
बहुत से नये दरवाजे
बंद होने से शुरु होते हैं
कहीं बहुत पुराना
दरवाजा भी
बहुत दिनों के
बाद खुलता है
याद आती है कभी
किसी की
दिखा करता था
अपने ही आस पास
रोज ही कहीं ना कहीं
बहुत दिनों से
कोई खबर ना कोई
पता मिलता है
देखिये और
ढूँढिये तो कहीं
कहाँ हैं जनाब
आजकल आप
आप ही को
ढूँढने के लिये
‘उलूक’ संदेश
एक लेकर कुछ यूँ
शब्दों के बियाबान
में निकलता है
होता कुछ नहीं है
वैसे जब कई कई
दिनों तक भी
एक ब्लागर को
एक दूसरे ब्लागर
का पता नहीं
भी चलता है ।

चित्र साभार: http://dlisted.com/

बुधवार, 18 जून 2014

पुरानी किताब का पन्ना सूखे हुऐ फूल से चिपक कर सो रहा था


वो गुलाब
पौंधे पर खिला हुआ नहीं था

पुरानी
एक 
किताब के
किसी फटे हुऐ अपने ही एक
पुराने पेज पर चिपका हुआ पड़ा था

खुश्बू वैसे भी
पुराने 
फूलों से आती है कुछ
कहीं भी किसी फूल वाले से नहीं सुना था

कुछ कुछ बेरंंगा कुछ दाग दाग
कुछ किताबी कीड़ोंं का नोचा खाया हुआ
बहुत कुछ
ऐसे ही 
कह दे रहा था

फूल के पीछे
कागज 
में कुछ भी
लिखा हुआ 
नहीं दिख रहा था 
ना जाने फिर भी
सब कुछ एक आइने में जैसा ही हो रहा था

बहुत सी
आड़ी तिरछी 
शक्लों से भरा पड़ा था

खुद को भी
पहचानना 
उन सब के बीच में कहीं
बहुत मुश्किल हो रहा था

कारवाँ चला था 
दिख भी रहा था कुछ धुंंधला सा 
रास्ते में ही कहीं बहुत शोर हो रहा था

बहुत कुछ था 
इतना कुछ कि पन्ना अपने ही बोझ से
जैसे
बहुत बोझिल हो रहा था

कहाँ से चलकर 
कहाँ पहुंंच गया था ‘उलूक’
बिना पंखों के धीरे धीरे

पुराने एक सूखे हुऐ
गुलाब के काँटो को चुभोने से भी
दर्द 
थोड़ा सा भी नहीं हो रहा था

कारवाँ भी पहुँचा होगा
कहीं और
किसी 
दूसरे पन्ने में किताब के

कहाँ तक पहुँचा
कहाँ
जा कर रुक गया
बस इतना ही पता नहीं हो रहा था ।

चित्र साभार: https://in.pinterest.com/

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

कोई नया नहीं है बहुत पुराना है फिर से आ रहा है वही दिन




अब दिन तो 
आते ही हैं 
किसी दिन 
किसी का दिन 
किसी दिन 
किसी का दिन 
एक दिन 
उसका दिन 
एक दिन 
इसका दिन 
एक दिन एक 
मरे हुऐ को 
याद करने 
का दिन 
एक दिन एक 
जिंदा को 
सलाम करने 
का दिन 
ग्लोबलाईजेशन 
के जमाने का 
असर झेलता 
रहा इसी तरह 
अगर दिन 
तो दिखेगा 
एक दिन में 
एक नहीं कई 
कई दिनों 
का दिन 
असल जिंदगी 
के टेढ़े मेढ़े 
दिनो को सीधा 
करता हुआ 
एक दिन 
रोज के आटे 
दाल सब्जी 
रोटी से जूझते 
रहने वाली की 
भी कुछ कुछ 
याद आ ही 
जाने का दिन 
इसका उसका 
नहीं हमारा दिन 
बस एक दिन 
जता लेने के 
लिये बहुत ही 
है प्यारा दिन 
कभी किसी दिन 
रहा होगा यही 
एक कुँवारा दिन 
अब आ ही 
जाता है हर साल 
बताने के लिये 
कहीं किसी ओर 
की तरफ भूल 
कर तो नहीं 
चला जा 
रहा है दिन 
साल के सारे 
दिनों का निचोड़ 
सारे के सारे 
तरह तरह के 
दिनों के ऊपर 
एक दिन के 
लिये ही सही 
मुस्कुराने की 
कोशिश करता 
हुआ बहुत भारी 
होने जा रहा दिन 
एक दो नहीं 
बाईस साला हो 
जा रहा एक दिन 
इतने मजबूत दिन 
के लिये मत
कह देना
 
किस तरह के 
दिन की बात 
बताने जा रहा है 
आज का वाला ये 
तुम्हारा दिन ।

बुधवार, 7 मार्च 2012

पुराना

सत्य अहिंंसा
की बात
गांधी तू क्यों
अब भी
आता है याद

मान जा
अब छोड़ दे
याद आना
और दिलाना
अगली बार
अगर आया
तुझे प्रमाण
पत्र होगा
हमको
दिखलाना

पुराना हो
चुका है
स्वतंत्रता संग्राम
की है आँधी
कि तू वाकई
में है गांंधी

गांधी
समझा
कर भाई

तेरे जमाने
में होता होगा
जो होता होगा

अब वो होता है 
जो वैसे
नहीं  होता है

बनाया जाता है 
मसाले डाल कर
पकाया  जाता है

पांच चोर
अगर कहेंगे
तेरे को सच्चा
तभी कुछ
हो पायेगा
तेरा कुछ अच्छा

इसलिये
थोड़ा
शर्माया कर
सच झूठ
की बात
हो रही हो
कहीं अगर
तो कूद कर
खाली भी
मत आ
जाया कर

उस
जमाने में
तू बन सका
महात्मा

इस जमाने में
अब कोशिश
भी मत करना

तू तो तू तेरी
बेच है सकता
कोइ भी आत्मा

इसलिये अब
भी मान जा
ले जा अपनी
धोती चश्मा
लाठी किताबे

दिखना
भी नहीं
कहीं फोटो
में भी

हमें सीखने
सिखाने
दे बाजीगरी

जब तक
तू बैठा रहेगा
हमारे नोटों में

कैसे
सीखेंगे हम
नये जमाने की
नयी नयी
कारीगरी।