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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

अभी ये दिख रहा है आगे करो इंतजार क्या और नजर आता है



हमाम के चित्र
बाहर ही बाहर
तक दिखाना तो
समझ में आता है

पता नहीं
कैमरे वाला
क्यों
किसी दिन
अंदर तक
पहुँच जाता है
कब कौन
सी बात को
कितना काँट छाँट
कर दिखाता है

सामने बैठे
ईडियट बाक्स के
ईडियट ‘उलूक’ को
कहाँ कुछ समझ
में आता है

बहुत बार बहुत से
झाडुओं की कहानी
झाडू‌ लगाने वालों
के मुँह से सुन चुका
होना ही काफी
नहीं होता है

गजब की
बात होती है
जब झाड़ू लगाने वाला
झाड़ू लगाने से पहले
खुद ही कूड़ा फैलाता है

बहुत अच्छी तरह
से आती है कुछ बाते
कभी कभी समझ में
बेवकूफों को भी

पर क्या किया जाये
कुछ बेवकूफों के
कहने कहाने पर
बेवकूफ कह रहा है
क्यों सुनते हो
बात में दम नजर
नहीं आता है
जैसा ही कुछ कुछ
कह दिया जाता है

और कुछ लोग
कुछ भी नहीं
समझते हैं
या समझना ही
नहीं चाहते हैं

भेड़ के रेहड़ के
भेड़ हो लेते हैं
पता होता है
उनको बहुत ही
अच्छी तरह से
भीड़ की भगदड़
में मरने में भी
मजा आता है

कोई माने
या ना माने
बहुत बोलने से कुछ
नहीं भी होता है

फिर भी
बोलते बोलते
कलाकारी से
एक कलाकार
बहुत सफाई से
मुद्दे चोरों के भी
चुरा चुरा कर
चोरों को ही
बेच जाता है ।

चित्र साभार: imageenvision.com

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

जिसके लिये लिखा हो उस तक संदेश जरूर पहुँच जाता है !

पता नहीं क्या क्या और
कितना कितना बदला है
कितना और बदलेगा
और क्या फिर हो जायेगा
सुना था कभी राम थे
सीता जी थी
और रावण भी था
बंदर तब भी
हुआ करते थे
आज भी हैं
ऐसी बहुत से
वाकयों से
वाकिफ होते होते
कहां से कहां आ गये
बस कुछ ही
दिन हुऐ हों जैसे
छोटे शहर में
छोटी सी बाजार
चाय की
दुकानों में जुटना
और बांट लेना बहुत कुछ
यूं ही बातों ही बातों में
आज जैसे
वही सब कुछ
एक पर्दे पर आ गया हो
बहुत कुछ है
कहीं किसी के
पास आग है
किसी के
पास पानी है
कोई
आँसुओं के सैलाब में
भी मुस्कुरा रहा है
कोई
जादू दिखा रहा है
कहीं
झगड़ा है
कहीं
समझौता है
दर्द खुशी
प्यार इजहार
क्या नहीं है
दिखाना बहुत
आसान होता है
इच्छा होनी चाहिये
कुछ ना कुछ
लिखा ही जाता है
अब चाय की वो दुकान
शायद यहाँ आ गयी है
हर एक पात्र
किसी ना किसी में
कहीं ना कहीं
नजर आता है
हर पात्र के पास
है कुछ ना कुछ
कहीं कम
कहीं कहीं तो बहुत कुछ
चाय तो अब
कभी नहीं दिखती
पर सूत्रधार
जरूर दिख जाता है
कहानी कविता
यात्रा घटना दुर्घटना
और पता नहीं क्या क्या
सब कुछ
ऐसे बटोर के ले आता है
जैसे महीन
झाड़ू से एक सुनार
अपने छटके हुऐ
सोने के चूरे को
जमा कर ले जाता है
एक बात को लिखना जहां
बहुत मुश्किल हो जाता है
धन्य हैं आप
कैसे इतना कुछ
आपसे इतनी
आसानी से हो जाता है
आप ही के
लिये हैं ये उदगार
मुझे पता है
आप को सब कुछ
यहां पता चल जाता है ।

रविवार, 6 मई 2012

बैठे ठाले उलूक चिंतन

रविवार को
उलूक चिंतन
कुछ ढीला
पढ़ जाता है

लिखने के लिये
कुछ भी नया
आसपास जब
नहीं ढूँढा जाता है

घर पर बैठे ठाले
अगर कुछ
कोई लिखना
भी चाहता है

परिणाम के
रूप में झाड़ू
अपने सामने
से पाता है

अपनी
कमजोरियों
को दिखाना
भी कहाँ अच्छा
माना जाता है

हर कोई
अपनी छुरी को
तलवार ही
बताना चाहता है

दो काम हों
करने अगर
अच्छा काम
पहले करने को
हमेशा से
कहा जाता है

पर ऎसा
कहाँ किसी से
हर समय
हो पाता है

रावण भी
तो स्वर्ग तक
सीढ़ियाँ नहीं
बना पाता है

पहले सीता
मैया जी को
हरने के लिये
चला जाता है

पुरुस्कार
के रूप में
रामचन्द्र जी
के हाथों मार
दिया जाता है

उलूक भी
इसीलिये
सोच में कुछ
पड़ जाता है

सब्जी
बाजार से
लाने से पहले
चौका बरतन
झाड़ू पौछा
करने को चला
ही जाता है

कभी कभी
बुद्धिमानी कर
मार खाने से
बच जाता है ।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

दौरा

एक गड्ढा
जो बहुत
दिनो से
बहुत
लोगो को
गिरा रहा था

आज शाम
पी डबल्यू डी
की फौज द्वारा
भरा जा रहा था

सारे अफसरों के
हाथ में झाडू़
तक दिखाई
दे रहे थे

होट मिक्स
हो रहे थे
रोलर तक
चलाये दे
रहे थे

पब्लिक की
समझ में
कुछ नहीं
आ रहा था

जिसको देखो
वो कुछ ना कुछ
अंदाज लगा
रहा था

अरे कल
उत्तराखंड
का बर्थडे है
एक बता
रहा था

डी ऎम की
कार तक
बेटाईम
खड़ी थी
माल रोड पर

किसी से पूछा
तो पता चला
वो भी शहर में
चक्कर लगा
रहा था

इतने में
"मोतिया"
हंसता
हुवा आ
रहा था

बड़े जोर
जोर से
ठहाके लगा
रहा था

पूछा तो
बोलता जा
रहा था

पागल मत
हो जाओ
गड्ढा ही तो
भरा जा
रहा है

सालों को
पता भी नहीं
कल मुख्यमंत्री
बाय रोड
आ रहा है ।

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